बंटवारे के ज़ख़्म और लखनऊ की मिटती सूरतें: शुएब निज़ाम की दो नई किताबों पर चर्चा
लखनऊ : “बंटवारे के जख्मों को खोलता उपन्यास और लखनऊ की मिटती तहजीब को बचाता रेखाचित्र-संग्रह” उसलूब आर्गनाइजेशन की ओर से हिन्दी संस्थान के प्रेमचंद सभागार में शुएब निजाम की दो नई किताबों – उपन्यास ‘गर्द-ए-सफर’ और रेखाचित्र-संकलन ‘सर-ए-सय्यारगान-ए-सुख़न’ पर विचार गोष्ठी हुई।
मुख्य अतिथि पूर्व आईएएस डॉ. अनीस अंसारी ने कहा, “यह उपन्यास बंटवारे के दौर की त्रासदी को बारीकी से दर्ज करता है और नई पीढ़ी को संदेश देता है कि अब अपनी राजनीतिक भागीदारी बढ़ाओ। 2022 के सर्वे के मुताबिक पसमांदा मुसलमान आज भी सबसे पीछे हैं – राजनीतिक चेतना जगाने की सख्त जरूरत है।”

अध्यक्षता कर रहे लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. अनीस अशफ़ाक़ ने किताब को “गाँव की ज़िंदगी और बदलते वक्त के खौफ के बीच उम्मीद की किरण” बताया।
कानपुर की डॉ. गुलरेज़ा अदीबा ने मंज़रकशी की तारीफ की तो डॉ. आयशा सिद्दीकी ने महिला चरित्रों की मज़बूती के साथ उनकी सदियों की दबी हुई स्थिति पर रोशनी डाली। शकील सिद्दीकी ने शुएब को “अल्फ़ाज़ का जादूगर” करार दिया।
रेखाचित्र-संकलन पर डॉ. उमैर मंज़र बोले, “इन 24 खाकों में मिट चुका पुराना लखनऊ दोबारा ज़िंदा हो उठता है।”
डॉ. हारून रशीद के संचालन में चले इस गरमागरम कार्यक्रम में साहित्य प्रेमियों, शोधार्थियों और अध्यापकों की भारी भीड़ जुटी। सभी ने इसे समकालीन उर्दू कथा-साहित्य की दिशा में एक अहम कदम बताया।






