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    जब विश्वविद्यालयों में आवाजें दबाई जा रही हैं, तब कला चीख रही है – ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’

    ShagunBy ShagunMarch 25, 2026 Education No Comments3 Mins Read
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    When voices are being stifled in universities, art screams—"Speak, for your lips are free."
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    लखनऊ विश्वविद्यालय में कलरव छात्र समूह की सशक्त कला प्रदर्शनी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नया मंच बनाया

    लखनऊ : आज जब यूनिवर्सिटी परिसरों में छात्रों की आवाज़ों पर नोटिस, प्रतिबंध और दबाव बढ़ रहे हैं, ठीक उसी वक्त लखनऊ विश्वविद्यालय के टैगोर लाइब्रेरी परिसर में गांधी प्रतिमा के सामने कला ने जवाब दिया। कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स के छात्रों के समूह ‘कलरव’ ने “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” शीर्षक से एक अनोखी कला प्रदर्शनी आयोजित की।

    यह सिर्फ पेंटिंग्स और हैंडक्राफ्ट की प्रदर्शनी नहीं थी, बल्कि एक साहसिक सांस्कृतिक हस्तक्षेप था – जहाँ कला ने सार्वजनिक जगह को वैकल्पिक लोकतांत्रिक स्पेस में बदल दिया।When voices are being stifled in universities, art screams—"Speak, for your lips are free."

    कला ने बनाया संवाद का नया मंच

    हैंडक्राफ्ट में आन्या चौधरी और श्वेता यादव ने अपनी रचनाओं के जरिए हस्तकला की संवेदनशीलता और सामाजिक अनुभवों को उकेरा।

    पेंटिंग सेक्शन में नीरज वर्मा, पूर्वी, निखिल, अवंतिका, दिव्यांशी चौधरी, गोल्डी, पूर्णिमा पाठक, स्रस्ती, रुख्मिनी निषाद, नितिन, जान्हवी, संतोष वर्मा, अतुल वर्मा, रितेश कपूर, कृष्णा यादव, अनुज चौबे, रुद्र प्रताप सिंह और शनि जैसे छात्र-छात्राओं ने अपने समय, समाज और निजी संघर्षों को रंगों में ढाला।

    छात्रों ने क्या कहा?

    • नितिन (तृतीय वर्ष): “जब संस्थान सवालों से असहज होने लगते हैं, तब कला उन सवालों को और तीखा बना देती है। हम कला के जरिए संवाद और असहमति की जगह को मजबूत करना चाहते हैं।”
    • नीरज (तृतीय वर्ष): “यह प्रदर्शनी शुरुआत है। हम कला को दीवारों तक कैद नहीं होने देंगे, उसे जनसरोकारों से जोड़ेंगे।”
    • जान्हवी शर्मा (तृतीय वर्ष): “अभिव्यक्ति का अधिकार किताबों में नहीं, जीना पड़ता है। यह प्रदर्शनी उसी अधिकार को ज़मीन पर उतारने की कोशिश है।”
    • अतुल वर्मा (तृतीय वर्ष): “कला अगर समाज से कट जाए तो सिर्फ सजावट रह जाती है। हम उसे विचार और हस्तक्षेप का हथियार बनाना चाहते हैं।”
    • अवंतिका (प्रथम वर्ष): “पहले साल के होने के बावजूद यहां हमें बराबरी का मंच मिला। हमारी आवाज़ मायने रखती है, यह भरोसा मिला।”
    • रितेश कपूर (द्वितीय वर्ष): “आज बोलना ही राजनीतिक क्रिया बन चुका है। कला के जरिए बोलना, अपनी मौजूदगी दर्ज कराना है।”

    क्यों खास है यह प्रदर्शनी?

    कलरव के छात्रों का यह सामूहिक प्रयास साफ संकेत देता है कि कला के युवा अब अपने समय के सवालों से मुंह नहीं मोड़ रहे, बल्कि उन्हें समझकर उन पर हस्तक्षेप कर रहे हैं। गांधी प्रतिमा के सामने आयोजित यह आयोजन विश्वविद्यालय परिसर में वैकल्पिक, जीवंत और लोकतांत्रिक सांस्कृतिक जगह बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

    जब आवाजें दबाई जा रही हों, तब कला सबसे तेज़ बोलती है।
    बता दें कि कलरव ने यही साबित कर दिया।

    Shagun

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