लिखूंगा.., मिटाऊंगा..
फिर लिखूंगा बार-बार
जब तक अपने लिखे पर
रो न पड़ू या फिर
मुस्कराने न लगूं
तब तक लिखूंगा
लिखूंगा, ताकि जब कमरे से निकलूं
नयी आंख मिले, नयी दुनिया और
सब पुराने को मिले नया अर्थ
मैं लिखूंगा खुद को
बार-बार
बिना खुद को पहचाने..
बिना खुद को जाने..
संसार को खुद की शिनाख्त
कैसे करा पाऊंगा
लिखना ही तो
मेरे होने का मतलब है
मैं होऊंगा तभी तो
दुनिया में
किसी के काम आऊंगा.
– आनंद अभिषेक
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