बीस साल पहले हुए दिल्ली के दर्दनाक उपहार सिनेमा अग्निकांड को देश भर के लिए नज़ीर बनना चाहिए था लेकिन इतना बड़ा हादसा देश की राजधानी में जमी संवेदनहीन सियासी जमात और भ्रष्ट अफ़सरशाही का रवैया भी न सुधार सका, दूसरे शहरों की कौन कहे। मुंबई में हुई चौदह मौतों की कहानी का अंजाम भी वही होना है। यह हमारे देश में न पहली बार हुआ है न आख़िरी बार होगा। कोई दूसरा देश होता तो इतनी मौतों के लिए सरकार और स्थानीय निकाय पर आपराधिक मुक़दमा हो गया होता, करोड़ों का हर्ज़ाना-जुर्माना अलग। यहाँ सब बयान देकर बरी हो जाते हैं।

उपहार कांड के बाद हर साल अख़बारों में, न्यूज़ चैनलों पर दिल्ली की बहुमंज़िला इमारतों में आग से निपटने के उपायों में लापरवाही पर लंबी लंबी रिपोर्ट छपीं, दिन दिन भर के प्रोग्राम हुए , लेकिन किसी सरकारी विभाग के रवैये में कोई फ़र्क़ नहीं नज़र आया। उपहार सिनेमा के मालिक अंसल बंधु सुप्रीम कोर्ट तक जाकर राहत ले आए और हादसे में अपने दोनों बच्चे खो चुकीं नीलम कृष्णमूर्ति के हिस्से में लंबी लड़ाई हार जाने का दर्द ही बचा है। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता सिवाय उन लोगों के , जिनकी दुनिया हमेशा के लिए वीरान हो जाती है। सरकारें नागरिकों से तगड़ा टैक्स लेती हैं, एमसीडी, बीएमसी की अरबों की आमदनी है लेकिन आम शहरी की जान बचाने की ज़िम्मेदारी किसी की नहीं।
दिल्ली में शीला दीक्षित ने भी बढ़ते अपराधों के पीछे बाहर से आकर यहाँ बसने वालों पर भी उँगली उठाई थी। तब दिल्ली और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। आज हेमा मालिनी ने कमोबेश वैसी ही बात कही है कि मुंबई में बाहर से आकर बसने वाली आबादी के चलते यहां संसाधनों और व्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है। हेमा मालिनी ने कुछ restriction लगाने की बात कही है जो शिवसेना और उससे अलग हुए राज ठाकरे की पार्टी कहती रही है। मुंबई और केंद्र में अब बीजेपी की सरकार है।
मीडिया और आम लोग पूछते रहें ये आग कब बुझेगी, लेकिन आग को न बुझना है न बुझेगी। नये जलने वाले बहुत हैं यहाँ।
अमिताभ श्रीवास्तव







