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    Home»लघुकथा

    सोने का पंख!

    By November 14, 2017 लघुकथा No Comments2 Mins Read
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    वाराणसी के एक ब्राह्मण परिवार में एक मेधावी पुत्र पैदा हुआ। उसके बड़े होने पर उसके समान जाति कुल से उसे एक भार्या ला दी गई। उससे उसे तीन पुत्रियां हुईं। कुछ दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसकी तीनों पुत्रियां अभी कुंवारी ही थीं। मृत्यु से पूर्व वह उनके विवाह नहीं कर पाया था।

    मृत्यु पश्चात उसने हंस के रूप में जन्म लिया। उसे अपने पिछले जन्म की याद थी। बड़े होने पर उसने देखा कि उसके पंख सोने के हैं। वह दूसरे हंसों की तरह सामान्य नहीं है। फिर उसे अपने घर की याद आई। पता चला कि उसकी पत्नी और पुत्रियां मजदूरी करके बड़े कष्ट से जीवन बिता रही हैं। उसने सोचा, अगर वह उन्हें एक-एक पंख देता रहे तो इससे वे सभी गुजारा कर सकेंगी। यह सोच वह उनके दरवाजे की दीवार पर जा बैठा।

    ब्राह्मणी और लड़कियों ने जब उस स्वर्ण हंस को देखा तो पूछा, महाराज आप कहां से आए हैं? उसने कहा, मैं तुम्हारा पिता हूं। मरकर स्वर्ण हंस होकर पैदा हुआ हूं। अब तुम्हें दूसरे के यहां मजदूरी करने की जरूरत नहीं। इतना कहकर वह एक पंख देकर उड़ गया। बीच-बीच में भी वह आकर अपना पंख दिया करता तो वे सब धनी हो गईं।

    एक दिन ब्राह्मणी के मन में लालच पैदा हुआ। उसने अपनी तीनों पुत्रियों को कहा कि क्यों न हम स्वर्ण हंस के सभी सोने के पंख उखाड़ लें। पुत्रियां इस बात से सहमत नहीं हुईं लेकिन लालची ब्राह्मणी ने उनकी एक न सुनी। जब स्वर्ण हंस आया तो ब्राह्मणी ने उसके सारे पंख नोच लिए। इच्छा के बगैर पंख नोचे जाने पर स्वर्ण हंस बाकी के हंसों की तरह ही हो गया और पंख न होने से उड़ भी न सका।

    कुछ दिन बाद जब उसके पंख उगे तो वह भी सामान्य हंसों की ही तरह थे। फिर कुछ दिन बाद वह अपने निवास स्थान पर लौट गया और वापस कभी नहीं आया। कहते हैं, जो मिले, उससे संतुष्ट रहना चाहिए। अतिलोभ पाप है।

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