संतवाणी : अजीत कुमार सिंह
एक समय शिव जी और माता पार्वती कैलाश पर विराजमान थे कि तभी कहीं से कुछ जल के कुछ छीटे दोनों के ऊपर पड़े, माँ पार्वती ने भगवान शिव से पूछा यहाँ कैलाश पर ये जल के छीटे कहाँ से आये शिव जी ने कहा,दूर कहीं महासागर में किसी बड़ी मछली की पूंछ पटकने से ये छींटे आये हैं इस पर माता पार्वती बोलीं ‘क्या वो मछली इतनी शक्तिशाली है मैं उसे ही अपना गुरु बनाना पसंद करुँगी।’
तब भगवान शिव जी ने कहा स्त्री का गुरु तो उसके आराध्य ही होते हैं। अतः मैं ही तुम्हारा गुरु हूँ माता पार्वती नहीं मानीं और हठ करके उस मछली के पास पहुंची मछली से माता बोलीं तुम अत्यंत ही बलशाली हो अतः मैं तुम्हे अपने गुरु के रूप में धारण करना चाहती हूँ कृपया मुझे अपनी शिष्या स्वीकार करें इस पर मछली ने नम्रतापूर्वक कहा मुझ जैसी अनगिनत मछलियाँ इस सागर में समाहित हैं।
अगर गुरु बनाना है तो इस सागर को बनाइए माता सागर के पास पहुंची और गुरु बनाने की मंशा प्रकट कीं ये सुनकर सागर ने क्षमा मांगते हुए कहा ‘हे देवी अगर गुरु बनाना है तो इस धरती को बनायें जिसमे मुझ जैसे सात सात महासागर हैं’ अब माता ने धरती माँ से निवेदन किया, सुनते ही धरती माँ ने कहा ‘मेरा बोझ तो स्वयं शेषनाग ने अपने ऊपर उठा रखा है यदि गुरु बनाना है तो उन्हें बनाइये’ अब वे शेषनाग के पास पहुँच कर माता ने उनसे गुरु बन जाने का आग्रह किया तो शेषनाग ने कहा हे माते गुरु बनने योग्य तो भगवान शिव ही हैं क्योंकि उन्होंने ही मुझे अपने कंठ प्रदेश में धारण कर रखा है।







