‘पहल’, ‘तद्भव’, ‘वसुधा’, ‘अकार’, ‘कथाक्रम’ आदि पत्रिकाएं कितनों के यहां आती हैं और कितने लोग इन्हें पढ़ते हैं। कम शायद बहुत ही कम। कुछ ही लोगों तक पहुंच है इन साहित्यिक पत्रिकाओं की। अभी ये, कैसे भी करके, चल रही हैं। मगर कब तक। जब तक इनके संपादक हैं। उनके बाद इन पत्रिकाओं का क्या होगा, अंजाम हमें मालूम है। साहित्य में युवा पीढ़ी की रुचि कितनी है, अपवाद छोड़कर, ये हमें मोबाइल पर उनकी गर्दनें झुकी देखकर पता चल ही जाता है।
60 और 70 के बाद की पीढ़ी फिर भी कुछ पुरानी चीजों को संभाले व संजोए हुए है। 2000 के बाद की पीढ़ी कभी पुराना कुछ संभाल पाएगी, मुझे शक है। दुनिया और जमाना जितनी तेजी से बदलकर डिजिटल होता जा रहा है, ऐसे में साहित्यिक पत्रिकाओं का वर्तमान और भविष्य ‘शून्य’-सा हो गया है। नई पीढ़ी के पास समय नहीं। समय है फिर भी नहीं।
कादम्बिनी का बंद होना मेरे जैसे लोगों के लिए किसी ‘बुरी खबर’ या ‘सदमे’ से कम नहीं। यह वह पत्रिका है, जिसे पढ़कर हमने साहित्य, समाज और संस्कृति के प्रति अपनी सोच विकसित की। दुखद है कि अब यह हमारे बीच न रहेगी। पर इसके न रहने पर कितने लोग ‘अफसोस’ जताएंगे? बहुत कम। क्योंकि उनके लिए किसी भी पत्रिका का बंद होना कोई खबर नहीं होता। उनकी जिंदगी जैसी है, वैसी ही चलती रहेगी।
अभी ‘हंस’ और ‘कथादेश’ जैसी बड़ी पत्रिकाएं हमारे बीच हैं लेकिन कब तक! जब हम ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘दिनमान’ जैसी पत्रिकाओं के बंद होने पर चुप बैठे रहे, कोई आश्चर्य नहीं कि कल को ‘हंस’ और ‘कथादेश’ के बंद होने पर भी कुछ न बोलें। आर्थिक पक्ष इतने कमजोर हैं कि पत्रिकाएं निकलें भी तो कैसे।
सुधीर विद्यार्थी को अपनी पत्रिका ‘संदर्श’ को निकालना इसलिए स्थगित करना पड़ा क्योंकि उनके पास संसाधन नहीं। हसन जमाल की ‘शेष’ का भी कुछ पता नहीं कि वो निकल भी रही है या बंद हो गई। – अंशुमाली रस्तोगी







