मैं परीक्षित
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रोशनी करती नहीं
अब प्रतीक्षा
उगा लिए चेहरे पर
अनेक चेहरे
पैठा दीं
संवेदनाएं कहीं
बहुत गहरे
मैं परीक्षित खुद की
करता समीक्षा
सन्नाटा चीखता
शोर तो मौन है
ऊबा-ऊबा खालीपन लिए
चढ़ता-उतरता
कौन है
सुधियां भी देती नहीं
अब भिक्षा
– आनंद अभिषेक







