ओम माथुर
हमारा मुख्यमंत्री कैसा हो वसुंधरा राजे जैसा हो या हमारा मुख्यमंत्री कैसा हो अशोक गहलोत जैसा हो। पिछले दिनों राजस्थान में यह दोनों नेता जहां भी गए, वहां कुछ स्थानों पर उनके समर्थकों ने ये नारे लगाए। विधानसभा चुनाव हुए अभी सिर्फ डेढ़ साल बीता है। लेकिन सीएम भजनलाल शर्मा को लेकर मानो दोनों दलों में बेचैनी है। गहलोत ने पहले जोधपुर में कहा था कि शर्मा को हटाने की साजिश चल रही है। उनकी पार्टी के लोग ही दिल्ली और जयपुर में लग चुके हैं। फिर मंगलवार को जयपुर में कहा कि हमें भजनलाल शर्मा सूट करते हैं। हम क्यों उनकी खिलाफत करेंगे। इनको बने हुए डेढ़ साल हुआ है। पांच साल राज करो भाई, कौन रोक रहा है आपको। उनके प्रति मेरी हमदर्दी है। वो जाने उनका काम जाने। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने भी पिछले दिनों कहां कि भजनलाल 5 साल मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। भाजपा की सरकार 5 साल चलेगी।
जितने कमजोर किए जाएंगे, उतने मजबूत होंगे भजनलाल
उधर, पिछले कुछ दिनों से मीडिया में ऐसा माहौल बन रहा है या बनाया जा रहा है, जैसे भजनलाल को हटाकर राजस्थान में नए सीएम की तलाश चल रही है। विकल्प के रूप में बाकायदा वसुंधरा राजे, किरोड़ी लाल मीणा, दिया कुमारी, राज्यवर्धन सिंह राठौड़ आदि नेताओं के नाम भी चलाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की पर्चीरूपी आशीर्वाद से सीएम बने शर्मा को हटाया जाएगा? कभी नहीं। राजनीतिक सचाई ये है कि भजनलाल जितना कमजोर होंगे या किए जाएंगे, वो कुर्सी पर उतने ही मजबूत होंगे। गहलोत तथा कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा के उनके खिलाफ बयान उन्हें लाभ ही पहुंचाएंगे।
भजनलाल, नायब सिंह सैनी, मोहन यादव, रेखा गुप्ता, विष्णु साय जैसे भाजपा नेता कोई अपनी योग्यता या जनाधार के कारण विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री नहीं बनाए गए। ये सभी नियुक्तियां विशुद्ध रूप से पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पार्टी पर अपनी पकड़ बनाने और राज्यों के क्षत्रपों को हाशिए पर लाने के अभियान का हिस्सा थी। ताकि अपनी पंसद और विश्वस्त अधिकारियों के मार्फत राज्यों पर सीधा दिल्ली का नियंत्रण रहे। पहली बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को करीब आधा दर्जन दावेदारों पर इसीलिए वरीयता मिली थी कि वो दिल्ली के इशारों पर नतमस्तक रहेंगे। ब्यूरोक्रेसी में सुधांशु पंत और शिखर अग्रवाल की धमक मंत्रियों से ज्यादा इसीलिए है कि दिल्ली उनसे ही राज्य की सत्ता और प्रशासन चलवाना चाहती है। इसी कारण भाजपा विधायक और मंत्रियों की अफसरशाही उपेक्षा करती है। उनके काम नहीं होते। पंसद के अफसरों की तैनाती नहीं होती।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इसमें कोई अडंगा नहीं डालते। सीएमआर और सीएमओ में भी कोई हस्तक्षेप नहीं। कोई उन्हें भले ही पर्यटन मंत्री कहे,लेकिन सक्रिय रहने के लिए शायद दिल्ली ने उन्हें राज्यभर में घूमने और बैठकें करने का ही काम दे रखा है। भाजपा के नेता भी मानते हैं जनता की उम्मीदों पर सरकार खरा नहीं उतर रही है। अपराधी और बजरी माफिया बेकाबू हैं। भ्रष्टाचार पर भी लगाम नहीं लग पा रही। लेकिन वो भी जानते हैं, हालात कैसे भी हो, भजनलाल को हटाने की बात करना बेमानी हैं। वसुंधरा राजे को तो छोडिए, वो तो मोदी-शाह विरोधी रहने के कारण बाहर है। राजेंद्र राठौड़, सतीश पूनिया सहित कई बड़े नेता भी अपने पुर्नवास को तरस रहे ह़ै। ना मंत्रिमंडल विस्तार, ना राजनीतिक नियुक्तियां, ना संगठन का विस्तार। नेता घुट रहे। लेकिन करें क्या। अब तो राजनीतिक क्षेत्रों में ये भी चर्चा है कि गहलोत के बार बार के बयान कहीं किसी रणनीति या परदे के पीछे के गठबंधन का हिस्सा तो नहीं है। यानि भजनलाल शर्मा की राजनीतिक कमजोरी ही दिल्ली में उन्हें और मजबूत मिलेगी। आज्ञाकारी शिष्य को भला कौन नेता हटाता है।







