राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर विशेष : अनिल सक्सेना ‘ललकार’
देश के मीडिया पर आज सबसे बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या हम सच की पत्रकारिता कर रहे हैं या सिर्फ सनसनी की होड़ में खड़े हैं? बीते कुछ वर्षों की घटनाओं ने यह भयावह सच उजागर कर दिया है कि भारतीय न्यूज़ चैनलों में सत्यापन, जिम्मेदारी और संपादकीय नैतिकता जैसी मूलभूत मान्यताएँ गहरी चोट खा रही हैं। रायटर्स इंस्टीटूट की डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट 2024 में साफ कहा गया है कि भारत में समाचारों पर भरोसा लगातार गिर रहा है, और दर्शक सोशल मीडिया पर अधिक निर्भर हो रहे हैं जिससे फर्जी खबरों का खतरा कई गुना बढ़ गया है।
धर्मेंद्र की ‘मृत्यु’ की झूठी खबर शर्मनाक और चिंताजनक
बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन कुछ टीवी चैनलों ने बिना किसी पुष्टि सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर उन्हें “स्वर्गवासी” घोषित कर दिया। बाद में ईशा देओल, सनी देओल और हेमा मालिनी के आधिकारिक बयान आए कि यह खबर पूरी तरह झूठी थी।यह सिर्फ एक गलती नहीं बल्कि यह पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सीधा और गंभीर प्रहार था। क्या यह जल्दबाज़ी सिर्फ टीआरपी की भूख थी? यदि हाँ, तो यह पत्रकारिता नहीं वरन पत्रकारिता की विफलता है।

लाहौर तक भारतीय सेना के ‘घुसने’ की खबर
मई-2025 में भारत-पाक तनाव के दौरान, कुछ चैनलों ने दावा किया कि “भारतीय सेना लाहौर तक घुस गई , इस्लामाबाद पर कब्जा कर लिया गया, पाकिस्तान ने सरेंडर कर दिया।” फैक्ट-चेक संस्थाओं ने बाद में साबित किया कि ये वीडियो या तो पुराने थे, या दूसरे देशों के थे, या पूरी तरह संदर्भहीन। राष्ट्र की सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर इस स्तर की लापरवाही खतरनाक है। मीडिया अगर युद्ध जैसी परिस्थिति में भी सनसनी फैला दे तो वह सूचना का माध्यम नहीं, भय और भ्रम का औज़ार बन जाता है।
पुराने वीडियो, वीडियो गेम फुटेज और विदेशी युद्ध-फुटेज को ‘ताज़ा हमला’ बताने की प्रवृत्ति
कई चैनलों ने इस्राएल के आयरन डोम के वीडियो, पुरानी बमबारी के फुटेज, यहाँ तक कि वीडियो गेम ग्राफिक्स तक को भारत-पाक तनाव का “लाइव” दृश्य बताकर प्रसारित किया। यही नहीं,रायटर्स इंस्टीटूट के अनुसार भारतीय दर्शकों में से 49% लोग सोशल मीडिया को खबर का मुख्य स्रोत मानते हैं, और चैनल भी अब उन्हीं वायरल वीडियो पर निर्भर होने लगे हैं। फर्जी वीडियो जितनी आसानी से फैलते हैं, उतनी ही तेजी से दर्शक भ्रमित होते हैं और इसके लिए मीडिया जिम्मेदार भी है और दोषी भी।

चुनावी झूठ, डीपफेक और मनगढ़ंत बयान
चुनावों के दौरान अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, आमिर खान और रणवीर सिंह जैसे बड़े कलाकारों के डीपफेक वीडियो वायरल हुए, जिनमें उन्हें राजनीतिक बयान देते दिखाया गया। कई चैनलों ने न केवल इन्हें रोका नहीं, बल्कि “बहस” का मुद्दा बनाकर उन्हें और ज्यादा फैलाया।
सीएसडीएस-केएएस के राष्ट्रीय मीडिया सर्वेक्षण (2022) में यह पाया गया कि बड़ी संख्या में भारतीय यह महसूस करते हैं कि मीडिया अब पहले जितनी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रही।
https://x.com/i/status/1921114445121552385
विश्व स्तर पर भारतीय मीडिया किस पायदान पर?
आरएसएफ ने 2023 प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को 180 देशों में से 161वां स्थान दिया। यह स्थिति बताती है कि भारत का मीडिया विश्व मंच पर विश्वसनीयता और स्वतंत्रता दोनों में गंभीर गिरावट का सामना कर रहा है। डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट 2024 में भी यह निष्कर्ष दर्ज है कि भारत में समाचारों पर भरोसा घटा है, दर्शक अत्यधिक ध्रुवीकृत हो चुके हैं, और मीडिया में राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है । ये सभी बातें प्रमाणित करती हैं कि समस्या “एक-दो चैनलों” तक सीमित नहीं, बल्कि सिस्टम-व्यापी है।
प्रिंट मीडिया में विज्ञापनों की पकड़ और बढ़ती चुनौतियाँ
प्रिंट मीडिया, जिसे अब भी इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की तुलना में विश्वसनीय माना जाता है, आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रहा है। हर दूसरे दिन व्यवसायियों,स्कूल संचालकों, अस्पताल संचालकों, निजी संस्थानों यहाँ तक कि समाजसेवा करने वालों तक सबके पास अखबारों के विज्ञापन प्रतिनिधियों का कॉल पहुँचता है, “विज्ञापन दीजिए।” स्थिति यह हो गई है कि समाचार-चयन भी कई जगह विज्ञापनदाता की पसंद पर निर्भर होने लगा है। साहित्य, संस्कृति, सामाजिक कार्य और जनहित के विषय अब वही प्रकाशित होते हैं जो विज्ञापन देता है।
अभी भी प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता जनता के मन में बाकी है, लेकिन यदि यह विज्ञापन-प्रधान मॉडल नियंत्रण से बाहर होता गया, तो प्रिंट मीडिया भी वही हाल देखेगा जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हो चुका है।
आख़िर गलती कहाँ हो रही है?
अब न्यूज़ रूम में मंत्र यह नहीं “पहले जांच, फिर प्रसारण”
बल्कि “पहले प्रसारण, बाद में जो होगा देखा जाएगा।” वहीं ‘सबसे पहले’ दिखाने की होड़ ने गुणवत्ता को निगल लिया है। ट्विटर , व्हाट्सअप और वायरल वीडियो अब कई चैनलों के लिए “स्रोत” बन गए हैं। जीवित व्यक्ति को मृत बताना, युद्ध-खबरों में बढ़ा-चढ़ाकर भ्रम फैलाना, यह सिर्फ गलती नहीं बल्कि नैतिक अपराध है।
अब भी समय है ..मीडिया अपनी साख बचा सकता है
मीडिया संस्थानों को समझना होगा कि उनका काम सिर्फ “खबर देना” नहीं, बल्कि सत्य, सटीकता, संवेदना और जवाबदेही के साथ खबर देना है। हर संवेदनशील खबर को दो आधिकारिक स्रोतों से सत्यापित किया जाए। गलतियों पर ऑन-एयर माफी और सुधार अनिवार्य हों। युद्ध, आतंक, सेना, मृत्यु, राजनीति इन सभी में विशेष सावधानी रखी जाए। टीआरपी और विज्ञापन को नैतिकता से ऊपर न रखा जाए।
भारतीय मीडिया आज चौराहे पर खड़ा है। धर्मेंद्र की झूठी मृत्यु-खबर, लाहौर की सैन्य अफवाहें, डीपफेक वीडियो, और विज्ञापन-प्रधान प्रिंट मीडिया इन सारी घटनाओं से स्पष्ट है कि संकट व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है। अगर मीडिया जनता का भरोसा खो देगा तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं शेष बचे तीनों स्तंभ भी कमजोर हो जाएंगे।
आज आवश्यकता है साहस की, नैतिकता की और सटीकता की। झूठ की भीड़ में भी सच बोलने का साहस ही असली पत्रकारिता है और यही साहस लौटाने का समय अब आ चुका है।








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बहुत ही बेहतरीन आर्टिकल लिखा है इस तरह के और आर्टिकल आने चाहिए जो सच्चाई के सामने ला सके