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    Home»ज़रा हटके

    कालू और भुलई की दोस्ती

    ShagunBy ShagunDecember 6, 2025 ज़रा हटके No Comments3 Mins Read
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    Friendship of Kalu and Bhulai
    बाहर से मुस्कुराना और अंदर ही अंदर खुद को समझाना हर किसी के बस की बात नहीं!
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    किस्सा अनुराग प्रकाश का

    दुधवा टाइगर रिजर्व के जंगलों के ठीक किनारे बंसीनगर गांव है। हमारे घर के पीछे रेल की पतली लाइन है। उस लाइन को पार करो तो शुरू हो जाते हैं लंबे-लम्बे गन्ने के खेत। उन खेतों के बीच में एक अकेला आदमी रहता था – नाम था भुलई।

    भुलई ने खेत के ठीक बीचों-बीच पंद्रह फुट ऊँची मचान बनाई थी। बांस और लकड़ी का मजबूत ढांचा, ऊपर छोटी-सी झोपड़ी। दिन में नीचे खाना बनाता, रात होते ही सीढ़ी चढ़कर ऊपर सोने चला जाता। उसके साथ था उसका काला कुत्ता – कालू। कालू दिन-रात मचान के नीचे घूमता, जैसे कोई चौकीदार।

    भुलई ने मचान पर तीन पुराने टीन के ड्रम लटकाए थे। जब भी कोई जंगली सूअर, नीलगाय या हिरण खेत की तरफ आता, कालू पहले भौंकता, फिर भुलई ऊपर से ड्रम पीटता – ढम-ढम-ढम! आवाज सुनकर जानवर भाग जाते। दोनों मिलकर पूरे खेत की रखवाली करते।

    हम बच्चे जब कभी उससे मिलने जाते, कालू हम पर भी गुर्राता। ऊपर से भुलई की आवाज आती – “चुप कालू!” बस, कालू पूँछ हिलाता हुआ चुपचाप बैठ जाता। फिर भुलई नीचे उतरता, हम सब मचान के नीचे बैठते और घंटों बातें करते। एक रात की बात है। आधी रात बीत चुकी थी। चाँद भी बादलों में छिपा था। अचानक कालू जोर-जोर से भौंकने लगा। भुलई जागा। सोचा शायद बाघ आया होगा। उसने ऊपर से दो-एक ड्रम पीटा। आवाज गूँजी, पर जो सायबान साया धीरे-धीरे मचान की तरफ बढ़ता ही आ रहा था, वो रुका नहीं।

    भुलई ने फिर पीटा। कोई असर नहीं।

    तब कालू ने कुछ ऐसा किया जो आज भी याद करो तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वो सीधा उस विशाल नर हाथी की तरफ दौड़ा। छोटा-सा काला कुत्ता और सामने पूरा पहाड़ जैसा हाथी। कालू पास पहुँचा तो हाथी ने सूंड उठाकर चिंघाड़ मारी। उस चिंघाड़ से भुलई समझ गया – ये बाघ नहीं, हाथी है!

    वो फटाक से सीढ़ी से उतरा। पहले से रखी लकड़ियों पर फूस डाला और माचिस जलाई। लपटें उठीं तो हाथी रुक गया। फिर धीरे-धीरे मुड़ा और जंगल की तरफ चला गया। खतरा टला। लेकिन… कालू की आवाज नहीं आ रही थी।भुलई ने रात भर पुकारा – “कालू… कालू…” कोई जवाब नहीं।

    सुबह उजाला हुआ तो भुलई खेत में दौड़ा। गन्नों के बीच एक जगह मिट्टी दबी हुई थी। वहाँ कालू पड़ा था उसका कालू – एक पैर के नीचे पूरी तरह कुचला हुआ। आँखें अभी भी खुली थीं, जैसे कह रहा हो, “मालिक, तू बच गया न?”

    भुलई उसके पास बैठ गया। उस दिन उसने किसी से एक शब्द नहीं बोला। बस कालू को गोद में उठाया और खेत के कोने में एक नीम के नीचे दफना दिया।

    आज भी जब कभी मैं उस रेलवे लाइन के पास से गुजरता हूँ, हवा में एक हलौती आवाज सुनाई देती है – जैसे दूर कहीं कोई काला कुत्ता अभी भी अपने मालिक के लिए भौंक रहा हो।

    कालू चला गया, पर उसने अपनी जान देकर साबित कर दिया कि सच्ची दोस्ती ऊँचाई नहीं, दिल से दिल तक जाती है।

    Shagun

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