बहुत समय पहले की बात है। घने जंगल में दो अजीब दोस्त रहते थे – एक लंबा-चौड़ा, भोला-भाला ऊँट और दूसरा चतुर-चालाक सियार। दोनों की दोस्ती ऐसी थी कि शाम ढलते ही नदी किनारे बैठकर घंटों बातें करते, अपने दिल की बातें साझा करते। दिन बीतते गए और उनकी मित्रता और गहरी होती चली गई।
एक दिन सियार को पता चला कि नदी के पार वाले खेत में बड़े-बड़े, रस भरे तरबूज पक चुके हैं। उसके मुँह में पानी आ गया, लेकिन नदी पार करना उसके लिए नामुमकिन था। वह कोई उपाय सोचने लगा। अंत में वह सीधे ऊँट के पास पहुँचा।

ऊँट ने उसे दिन में देखकर हैरानी से पूछा, “अरे मित्र, आज इतनी जल्दी? हम तो शाम को मिलने वाले थे न?”
सियार ने बड़ी मासूमियत से कहा, “दोस्त, मैं तो तुम्हारे लिए ही अच्छी खबर लाया हूँ। नदी पार के खेत में तरबूजों का ढेर लगा है – लाल-लाल, मीठे-मीठे! तुम्हें तो तरबूज बहुत पसंद हैं न? सोचा, तुम्हें बता दूँ ताकि तुम खूब मजा लो।”
ऊँट के कान खड़े हो गए। वह बोला, “सच में? चलो, अभी चलते हैं! बहुत दिन हो गए तरबूज खाए।”
वह नदी पार करने को तैयार होने लगा। तभी सियार ने उदास स्वर में कहा, “मित्र, मुझे भी तरबूज बेहद पसंद हैं, लेकिन तैरना तो आता ही नहीं। तुम अकेले खाओगे तो मुझे बहुत बुरा लगेगा।”
ऊँट ने हँसते हुए कहा, “चिंता मत करो! तुम मेरी पीठ पर बैठ जाओ, मैं तुम्हें आराम से पार ले चलूँगा। फिर दोनों मिलकर खूब तरबूज खाएँगे।”
ऊँट ने ठीक वैसा ही किया। नदी पार करके दोनों खेत में पहुँचे। सियार ने जी भरकर तरबूज खाए और पेट भर गया। खुशी के मारे वह जोर-जोर से भौंकने और चिल्लाने लगा।

ऊँट ने डरते हुए कहा, “चुप रहो यार, किसान जाग जाएँगे!”
लेकिन सियार कहाँ मानने वाला था। उसकी तेज आवाज सुनकर खेत के मालिक डंडे लेकर दौड़े आए। सियार तो फुर्तीला था, झट से झाड़ियों में छुप गया। ऊँट का विशाल शरीर कहाँ छुपता! किसानों ने गुस्से में आकर उसे खूब पीटा। किसी तरह जान बचाकर ऊँट खेत से बाहर निकला।
झाड़ियों से निकलकर सियार हँसता हुआ सामने आया। ऊँट ने क्रोध भरी नजरों से पूछा, “तू जान-बूझकर इतना शोर मचा रहा था न?”
सियार ने बेखटके कहा, “अरे मित्र, यह तो मेरी पुरानी आदत है। पेट भर जाए तो गाना-बजाना शुरू हो जाता है, तभी खाना अच्छे से पचता है!”
ऊँट मन-ही-मन जल-भुन गया, लेकिन चुपचाप नदी की ओर चल पड़ा। नदी में पहुँचकर उसने सियार को फिर अपनी पीठ पर बिठाया। सियार सोच रहा था कि ऊँट को मार पड़ी, अब तो मजा आ गया।
लेकिन जैसे ही नदी बीच में पहुँचे, ऊँट ने जोर-जोर से डुबकियाँ लगानी शुरू कर दीं। सियार घबरा गया और चिल्लाने लगा, “अरे, यह क्या कर रहे हो? मैं डूब जाऊँगा!”
ऊँट ने शांत स्वर में कहा, “मित्र, मुझे भी तो खाना हजम करने की आदत है। तरबूज खाए हैं न, इसलिए थोड़ी डुबकियाँ लगानी पड़ती हैं, तभी पेट साफ होता है।”
सियार को तुरंत समझ आ गया कि ऊँट उसकी चालाकी का बदला ले रहा है। किसी तरह तड़पड़ाते हुए वह किनारे पर पहुँचा, पूरी तरह भीग चुका था और डर से काँप रहा था।
उस दिन के बाद सियार ने कभी ऊँट से छल करने की हिम्मत नहीं की। दोनों फिर से दोस्त बने रहे, लेकिन अब सियार जान गया था कि चालाकी की भी एक सीमा होती है।
क्या सीखा हमने : जैसा करोगे, वैसा भरोगे। दूसरों के साथ छल करोगे तो एक दिन खुद उसकी मार झेलनी पड़ेगी। सच्ची दोस्ती में विश्वास और ईमानदारी ही सबसे बड़ा बल होती है।






