आज उत्तराखंड के जंगलों से उठती आग की लपटें देखकर मन में दुख के साथ गहरा गुस्सा उबल रहा है। अभी अप्रैल का महीना भी पूरा नहीं हुआ है, और पहाड़ों का दम घुटने लगा है। नैनीताल, कुमाऊं, पौड़ी-श्रीनगर रोड, चमोली… हर तरफ धू-धूकर जल रहे जंगल। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 से अब तक 160 से ज्यादा आग की घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें करीब 100 हेक्टेयर जंगल राख हो गया। सिर्फ पिछले दो दिनों में 60 से ज्यादा फायर अलर्ट आए, और अब वन कर्मचारियों की छुट्टियां तक रद्द कर दी गई हैं। लेकिन यह कोई नई कहानी नहीं है।
जनवरी-फरवरी 2026 में, जब पूरे हिमालय में बर्फ गिरनी चाहिए थी, तब भी जंगल जल रहे थे। वैली ऑफ फ्लावर्स और नंदा देवी बायोस्फियर रिजर्व तक आग की लपटें पहुंच गईं। उस समय भी भारतीय वायुसेना को बुलाना पड़ा। एक साल पहले जनवरी के तीसरे हफ्ते में जहां सिर्फ 45 आग की घटनाएं हुई थीं, वहीं 2026 में वही अवधि में 440 घटनाएं दर्ज की गईं। यानी दस गुना बढ़ोतरी! अब अप्रैल आते-आते आग ने फिर से अपना रंग दिखा दिया। क्या हमें हर साल इसी तबाही का इंतजार करना है? क्या जंगलों को राख होते देखना उत्तराखंडवासियों की नियति बन चुकी है?

यह सब होते देख अब सरकार और प्रशासन से कुछ कड़े सवाल पूछना जरूरी हो गया है:
- हर साल जंगल जलते हैं, फिर भी ‘प्रॉपर प्लानिंग’ सिर्फ फाइलों और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन तक क्यों सिमट जाती है?
- करोड़ों का बजट कहां खर्च होता है? सिर्फ बैठकें करने और रिपोर्ट तैयार करने में?
- अर्ली वार्निंग सिस्टम कहां हैं? सैटेलाइट अलर्ट तो आ जाते हैं, लेकिन ग्राउंड पर एक्शन क्यों नहीं?
- वन कर्मचारी, जो आग बुझाने के लिए जान हथेली पर लेकर निकलते हैं, उन्हें आधुनिक उपकरण, पर्याप्त पानी टैंकर, ड्रोन, फायर लाइन और बीमा जैसी बुनियादी सुविधाएं क्यों नहीं दी जातीं?
- क्या पूरा शासन-प्रशासन अभी भी सिर्फ बारिश के भरोसे बैठा है? अगर इस बार भी कुदरत ने साथ न दिया, तो हम क्या सिर्फ तमाशा देखते रहेंगे?

यह आग सिर्फ पेड़ नहीं जला रही।
यह हमारे पर्यावरण, वन्यजीव, पानी के स्रोत और पहाड़ों के भविष्य को जला रही है। चीड़ के जंगलों में आग लगना आम हो गया है, लेकिन अब यह ऊंचाई पर भी पहुंच रही है – जहां पहले बर्फ और परमानेंट फ्रॉस्ट आग को रोकते थे। पर्यटन, कृषि, पानी और ऑक्सीजन… सब कुछ खतरे में है। पहाड़ की जवानी और पानी के बाद अब जंगल भी स्वाहा हो रहे हैं।
सरकार, जागिए!
यह सिर्फ ‘वनाग्नि’ नहीं, सिस्टम की नाकामी का सुलगता हुआ सबूत है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, ठोस कदम उठाइए – फायर ब्रेक बनाइए, स्थानीय समुदायों को ट्रेन कीजिए, आग लगाने वालों पर सख्त सजा का प्रावधान लागू कीजिए, और क्लाइमेट चेंज के इस नए पैटर्न को समझकर लंबी अवधि की रणनीति बनाइए।
उत्तराखंड सिर्फ ‘देवभूमि’ नहीं, हमारी प्रकृति की सुरक्षा कवच भी है।
इसे राख में बदलने की इजाजत हम अब नहीं दे सकते। जागो उत्तराखंड… जागो सरकार!







