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    भारत के लिए अनशन पर लद्दाख का ऋषि !

    ShagunBy ShagunJuly 15, 2026Updated:July 15, 2026 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    Ladakh's 'Rishi' on a hunger strike for India!
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    राहुल कुमार गुप्ता

    हिमालय की सफेद बर्फीली चोटियों के बीच से बहती सिंधु नदी की लहरें आज एक अजीब सी खामोशी और टीस से भरी हुई हैं। यह टीस भारत के उस आधुनिक ऋषि के लिए है, जिसने अपनी पूरी जिंदगी इस देश की मिट्टी, इसके सैनिकों और इसकी आने वाली पीढ़ियों को संवारने में लगा दी। आज जब वही लद्दाख के ऋषि सोनम वांगचुक हाड़ कपाने वाली ठंड और विपरीत परिस्थितियों में जेल की सलाखों से गुजरकर अब आमरण अनशन की भट्टी में खुद को झोंक रहे हैं, तब देश के एक बड़े हिस्से में छाई खामोशी झकझोरने वाली है। लद्दाख की 95 प्रतिशत से अधिक जनजातीय आबादी, वहां के नाजुक ग्लेशियरों और देश की लोकतांत्रिक अस्मिता की रक्षा के लिए तिनका-तिनका जोड़ने वाले इस इंसान का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनके समर्थन में ट्वीट कर उनके गिरते स्वास्थ्य पर गहरी चिंता जताई और उनसे अनशन छोड़ने की भावुक अपील की। विपक्ष के इस कदम ने जहां इस आंदोलन को राष्ट्रीय पटल पर एक नई संवेदनशीलता दी, वहीं यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा कर दिया कि आखिर एक सच्चे राष्ट्रभक्त को अपने ही देश में अपनी बात सुनाने के लिए इस हद तक आत्मोत्सर्ग क्यों करना पड़ रहा है?

    सोनम वांगचुक का देश के प्रति योगदान किसी कागजी देशभक्ति या नारों का मोहताज नहीं है। उन्होंने तब लद्दाख की सुध ली जब वहां की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह दम तोड़ चुकी थी और 95 प्रतिशत बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में फेल हो जाया करते थे। उन्होंने तार्किक रूप से यह बात समझाई कि बच्चों पर थोपी गई शिक्षा नहीं, बल्कि उनकी अपनी भाषा और परिवेश से उपजा ज्ञान ही उन्हें सशक्त बना सकता है। उन्होंने सेकमोल और ऑपरेशन न्यू होप जैसे अभिनव प्रयोगों से लद्दाख का पास प्रतिशत 5 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत के पार पहुंचा दिया। इतना ही नहीं, जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण लद्दाख के गांवों में पानी का अकाल पड़ा, तो उन्होंने प्रकृति के भौतिक नियमों का सहारा लेकर आइस स्तूपा यानी कृत्रिम बर्फ के स्तूपों का आविष्कार कर दिखाया। यह तकनीक सर्दियों के व्यर्थ बहते पानी को शंकु के आकार में जमाकर गर्मियों में किसानों के खेतों तक लाखों लीटर पानी पहुंचाती है। इस स्वदेशी विज्ञान के लिए उन्हें दुनिया का प्रतिष्ठित रोलेक्स अवॉर्ड मिला, जिसे उन्होंने देश के नाम समर्पित कर दिया। जब देश की सीमाओं पर तैनात हमारे जवान शून्य से भी चालीस डिग्री नीचे के तापमान में खुद को गर्म रखने के लिए लाखों लीटर प्रदूषणकारी केरोसिन जलाने को मजबूर थे, तब वांगचुक ने पूरी तरह सौर ऊर्जा से संचालित सोलर-कॉम्बैट टेंट बनाकर सेना को तोहफा दिया, जो बिना किसी ईंधन के अंदर का तापमान सुखद बनाए रखता है।Give up the insistence on a hunger strike; instead, wage a long-term struggle to change the system.

    जिस व्यक्ति ने हमेशा देश को जोड़ने और उसकी सुरक्षा को मजबूत करने का काम किया, उसे लद्दाख की स्वायत्तता और पर्यावरण की सुरक्षा की मांग करने पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसी गंभीर धाराओं के तहत महीनों जोधपुर जेल में बंद रहना पड़ा। लद्दाख में प्रशासन द्वारा औद्योगिक भूमि आवंटन नीति के तहत बाहरी और बड़ी विनिर्माण कंपनियों के लिए दरवाजे खोले जा रहे हैं। पैंग और देबरिंग जैसे इलाकों में विशाल सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर हजारों एकड़ जमीन दी जा रही है। लद्दाख के लोगों और वांगचुक का डर यह है कि इस पारदर्शी सुरक्षा कवच के बिना यदि भविष्य में इन संवेदनशील पहाड़ों में लिथियम, क्रोमियम या ग्रेनाइट जैसे रणनीतिक खनिजों के लिए अनियंत्रित खनन शुरू हो गया, तो उत्तर भारत की नदियों को जीवन देने वाले ये ग्लेशियर हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे। इसी विनाश को रोकने के लिए वे संविधान की छठी अनुसूची और पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग कर रहे हैं, ताकि स्थानीय लोगों को अपनी जमीन के संरक्षण का अधिकार मिल सके।


    जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन का आज 18वां दिन है। 18 दिन से देश सुन रहा है, लेकिन सत्ता खामोश है। अगर सरकार छात्रों और जनता की आवाज़ का जवाब नहीं दे सकती, तो ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए और संबंधित मंत्री को अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं बचता। इस्तीफ़ा देना चाहिए। – समां परवीन, ट्विटर एक्टिविस्ट ( https://x.com/ShamaParveen70/status/2077246760934908114/video/1)


    आज जब वांगचुक का शरीर अन्न के एक-एक दाने के लिए तरस रहा है, तब भारतीय लोकतंत्र के बदलते मिजाज पर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो ब्रितानी हुकूमत के दौर में भी महात्मा गांधी के अनशन और सत्याग्रह के सामने साम्राज्यवादी ताकतों को झुकना पड़ता था। आजादी के बाद कांग्रेसी शासन के दौरान भी जब पोटी श्रीरामुलु या सुंदरलाल बहुगुणा जैसे पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी आवाज उठाई, तो सत्ता गलियारों में उनकी सुनवाई होती थी, संवाद के रास्ते खुलते थे और समझौतों की गुंजाइश बनती थी। परंतु आज के दौर में ऐसा क्यों संभव नहीं लग रहा? इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति का अत्यधिक ध्रुवीकरण और संवादहीनता की संस्कृति का हावी होना है। आज किसी भी प्रकार के शांतिपूर्ण जन-आंदोलन या असहमति को सीधे राष्ट्र की संप्रभुता या विकास विरोधी नैरेटिव के चश्मे से देखा जाने लगा है। जब लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र से उठने वाली पर्यावरण की पुकार को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर वांगचुक को जेल भेजा गया तब जनता में भी विरोध के सुर देखे गए। लगता है अब सरकारें मानवीय संवेदनाओं और स्थानीय अधिकारों से कहीं अधिक महत्व बड़े कॉर्पोरेट हितों और केंद्रीकृत नियंत्रण को दे रही हैं, हो सकता है सरकार का देश हित के लिए कोई बड़ा लक्ष्य हो! मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी इन बुनियादी मुद्दों को छोड़कर गैर-जरूरी बहसों में उलझा रहता है, जिससे देश की जनता तक सीमांत क्षेत्रों की यह कराह पहुंच ही नहीं पाती और पूरा समाज एक आत्मघाती मौन धारण कर लेता है।

    इस गहरे लोकतांत्रिक संकट का समाधान किसी टकराव में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा को पुनर्जीवित करने में है। सबसे पहला और तात्कालिक समाधान यह है कि केंद्र सरकार बिना किसी अहंकार के सोनम वांगचुक और लद्दाख के जन-प्रतिनिधियों के साथ एक उच्च-स्तरीय, पारदर्शी और सौहार्दपूर्ण संवाद की शुरुआत करे। लोकतंत्र की ताकत लाठी या जेल में नहीं, बल्कि सुनने और समझने की क्षमता में होती है। लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची का सुरक्षा कवच देना किसी भी तरह देश की सुरक्षा के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश के सबसे वफादार नागरिकों को यह भरोसा दिलाना है कि उनकी संस्कृति और पर्यावरण सुरक्षित हैं। दूसरा समाधान यह है कि हमें विकास की अपनी परिभाषा को बदलना होगा। जो विकास हमारे देश के पर्यावरण, हमारे जल-स्रोतों और भावी पीढ़ियों की सांसों की कीमत पर आता हो, वह विकास नहीं बल्कि एक सामूहिक विनाश का निमंत्रण है। देश के नागरिकों को भी अपने इस आत्मघाती मौन को तोड़ना होगा, क्योंकि आज अगर लद्दाख के ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उसका सीधा असर गंगा, यमुना और सिंधु के मैदानों में रहने वाले करोड़ों भारतीयों के जीवन पर पड़ेगा। सोनम वांगचुक का यह त्याग केवल लद्दाख के चंद पहाड़ों के लिए नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष के भविष्य को सुरक्षित रखने का एक महान अनुष्ठान है।

    Shagun

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