करेंट इशू : राहुल कुमार
भारत में मोदी युग के आगमन से पहले तक भारत का धर्म निरपेक्ष स्वरूप, शब्द मात्र में सिमटा रहा है। कई पहलुओं को गौर से देखने और समझने के बाद वास्तव में सब यही कहेंगे भारत अब तक अर्द्ध इस्लामिक राष्ट्र रहा है। अर्द्ध इसलिए कि इस्लामिक कानून ‘शरीयत’ को यहां अपनी जरूरत के हिसाब से एडजस्ट किया गया है। इसमें मुस्लिम पुरुष प्रधानता चरम पर है और मुस्लिम महिलाएं अधिकार विहीन! भारतीय संविधान की ‘आत्मा’ समानता और न्याय का सरेआम माखौल उड़ता रहा है। लेकिन शरीयत से अपराध की कठोर सजा को नहीं अपनाया गया। इससे बचने के लिए अपेक्षाकृत भारतीय कानून की लोचदार सजा के लिए पूर्णतः और एकमत से सब राज़ी रहे।
यहां के कई मुस्लिम कानून सुप्रीम कोर्ट से बढ़कर रहे हैं, बढ़कर हैं, ऐसी अवस्था में भारत अब तक भला कहां धर्मनिरपेक्ष रहा होगा।
वोट बैंक की राजनीति, आंबेडकर के बनाए भारतीय संविधान के मूल (समानता और न्याय) पे हमला करती रही। चाहे वो वक्फ बोर्ड को असीम शक्तियों से परिपूर्ण करने की राजनीति रही हो या फिर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के समानता और न्याय को दरकिनार करने से रहीं हों। या फिर बात-बात में मौलवियों द्वारा फतवा जारी करने की बात रही हो! या इसी तरह के अन्य और कई कानून रहे हों या पूर्व की सरकारों द्वारा माफियाओं को संरक्षित करने का कार्य रहा हो! या फिर उपासना स्थल कानून 1991 की धारा 3 और 4 रही हो। जो एक समुदाय के द्वारा पूर्व में किए गए अत्याचार, बर्बरता और कब्जेदारी को वैध बनाता है तथा हिंदुओं, जैन, और बौद्ध जैसे शांतिप्रिय लोगों के पवित्र धर्म स्थलों को पुनः प्राप्त करने और बहाल करने के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। यह एक्ट न्यायिक समीक्षा को भी रोकता है, जो संविधान के मूलभूत पहलुओं में से एक है। यह अधिनियम हिंदू, बौद्ध, जैन इनके धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों में अतिक्रमण करता है। जबकि मुख्य रूप से मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति के चलते ही यह उपासना स्थल एक्ट अपने वजूद में आया।

ये सारी चीजें भारत के उच्चतम न्यायालय को और भारतीय संविधान की आत्मा और उसके मूल को गौड़ साबित करती आईं हैं। ऐसे में हम कैसे कह सकते थे कि भारत पूर्व की सरकारों में धर्म निरपेक्ष देश था! धर्म निरपेक्षता को जब अब अमल में लाया जा रहा, समानता को जब अब अमल में लाया जा रहा, न्याय को जब अब अमल में लाया जा रहा तो मुस्लिम ही नहीं हिंदुओं में भी बहुत से लोगों को तकलीफें हों रही हैं। क्योंकि ऐसे हिंदुओं की राजनीतिक विरासत छिनने का खतरा मंडराता रहता है। मुस्लिमों में तकलीफ केवल कट्टरपंथी जमात को है सभी मुस्लिमों को नहीं।
उनको लग रहा है कि भारत के संसाधनों और उसके कानूनों की दरियादिली पर उनका पहला हक है, वो सरकारों से खुद को ऊपर रखना चाहते हैं। अब जब अचानक से भारतीय संविधान की आत्मा और उसके मूल को अमल पे लाया जा रहा है तो स्वाभाविक है कि कुछ लोगों में तकलीफें उठना लाजिमी है। लेकिन मोदी सरकार के ये सभी कार्य वास्तव में भारतीय संस्कृति और समाज में समानता के लिए किये जा रहे हैं। पूर्व की सरकारों में जो असामनताएं वोट बैंक के लिए दिखाई गईं उन्हें समानता की राह पे लाने के प्रयास में ही बहुत से लोगों को सरकार में खामियाँ दिखाई दे रहीं हैं। वस्तुतः सरकार देश के संविधान के हिसाब से चल रही है। देश, देश के संविधान से ही चलते हैं। तभी उसमें एकरूपता और सुदृढ़ता नजर आती है।
जब से सरकार ने वक्फ बोर्ड में सुधार के लिए कदम उठाया है तब से समाचारों और सोशल मीडिया में वक्फ बोर्ड के बारे में ही तरह-तरह के विचार सुनने और देखने में आ रहे हैं।
वक्फ संशोधन विधेयक 2024 के पक्ष में कुछ लोगों का मानना है कि तुर्की, लीबिया, मिस्र, सूडान, लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, ट्यूनीशिया और इराक जैसे कई इस्लामिक देशों में वक्फ़ संपत्ति या वक्फ़ बोर्ड नहीं हैं। तो फिर में भारत में वक्फ बोर्ड को लेकर इतना विवाद क्यों? संसद और सुप्रीम कोर्ट से भी अधिक शक्तियां कांग्रेस सरकार मुस्लिम वोट बैंक के चलते वक्फ बोर्ड को देती आई हैं। भारत को कथन रूप में धर्मनिरपेक्ष और व्यावहारिक रूप में अर्द्ध इस्लामिक देश बनाने में पूर्व की सरकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। यद्यपि वक्फ के संबंध में कुरान में कोई प्रत्यक्ष आदेश नहीं है। तो यह धर्म के मौलिक अधिकार का भी मामला नहीं बनता। सूरह अल-इ-इमरान (3:92) से दान के बारे में बताया गया है न कि स्पष्ट रूप से वक्फ बोर्ड के बारे में! जब तक आप अपनी प्रिय चीजों में से कुछ दान नहीं करते, तब तक आप धार्मिकता प्राप्त नहीं कर सकते।
कुछ लोगों का मानना है कि देश की आजादी के वक्त तमाम स्टेट के राजाओं की जमीनें सरकार ने जबरन ली, जमींदारों की जमीनें जबरन ली, जबकि मालिकाना हक तो सरकारी कागजों में इन्हीं का था। जबकि वक्फ में कई जमीनें ऐसी भी हैं जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। कई ऐसी हैं जो सल्तनत काल और मुगल काल में हिंदुओं के ऊपर थोपे गए तमाम टैक्सों से बनी है, और कई ऐसी जमीनें हैं जो हिंदुओं की ही थीं या तो उनकी निजी संपत्तियां थीं या उनके धार्मिक स्थल थे जिन्हें तोड़कर आक्रांताओं ने अपने स्थल बनवाए। केवल वोट बैंक के चलते कांग्रेसी सरकारों ने वक्फ बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट से भी अधिक शक्तिशाली बना दिया। आज जब न्याय और समानता की बात हो रही तब राष्ट्रहित के लिए इन सब पर सबको अमल करना जरूरी हो जाता है।
वक्फ एक्ट में संशोधन भी उसी तरह का लोगों में भय फैला रहा है जैसे जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को निष्प्रभावी करने के दौरान रहा हो या सीएए के लिए रहा हो। लेकिन वास्तव में ये भी विपक्ष और सोशल मीडिया द्वारा फैलाया जा रहा कथित भय ही है। वस्तुतः यह संशोधन विधेयक भी मुस्लिमों की एक बड़ी आबादी को लाभ दिलाने और समानता के लाने के हक में है। यह संशोधन वक्फ के सही मकसद का प्रयोग कर लाभ दिलाने के लिए ही है।
केंद्र सरकार ने वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन के लिए अगस्त 2024 में लोक सभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक-2024 प्रस्तुत किया गया था। जिसमें विपक्ष द्वारा काफी विरोध के बाद इसे संसद की संयुक्त संसदीय समिति को प्रेषित कर दिया गया है। जिसका फैसला संभवतः इस बार के संसद बजट सत्र में ही दे दिया जाये।
अरबी शब्द से बना है ‘वक्फ’
‘वक्फ’ अरबी भाषा के वकूफा शब्द से बना है, जिसका अर्थ बाँधना या रोकना होता है। इस्लामी मान्यता में धर्म के आधार पर दान की गई चल या अचल संपत्ति वक्फ कहलाती है। दान देने वाले व्यक्ति को वकीफा/वकीफ कहा जाता है। इस संपत्ति से गरीब व जरूरतमंदों की मदद करना, मस्जिद या अन्य धार्मिक संस्थान रखरखाव, शिक्षा की व्यवस्था करना और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए धन देने संबंधी कार्य किए जा सकते हैं। लेकिन असीमित शक्तियाँ मिलने के बाद वक्फ बोर्ड इन कार्यों को छोड़कर अपने लाभ के अन्य कार्यों से जुड़ गया।
भारत में आजादी के बाद वक्फ की पूरे देश में लगभग 52000 संपत्तियाँ थीं, जो वर्ष 2009 में बढ़कर 3 लाख तक हो गई। क्षेत्रफल में लगभग 4 लाख एकड़ तक हो गई। जो कि वर्तमान 8 लाख एकड़ भूमि में अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई। जिससे अचल संपत्तियों के क्षेत्रफल में 13 वर्षों में दो गुनी वृद्धि हुई है। सेना और रेलवे के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूस्वामित्व वक्फ बोर्ड के पास हो गया।
वक्फ को विनियमित करने का भारत में पहला प्रयास वर्ष 1923 में मुस्लिम वक्फ अधिनियम के माध्यम से किया गया है। आजाद भारत में, संसद ने पहली बार वर्ष 1954 में वक्फ एक्ट पारित किया गया। इस अधिनियम को 1995 में एक नए वक्फ एक्ट से प्रतिस्थापित किया गया, जिसने वक्फ बोर्ड्स को अधिक शक्तियाँ प्रदान कर दी गईं। इस नए कानून से अतिक्रमण में वृद्धि के साथ-साथ वक्फ संपत्तियों के अवैध पट्टे एवं बिक्री की शिकायतों में वृद्धि हुई। इन शिकायतों को दूर करने के लिए वर्ष 2013 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। इसमें वक्फ बोर्ड्स को मुस्लिम दान के नाम पर संपत्तियों का दावा करने के लिए इन बोर्ड्स को असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए और न्यायालय का हस्तक्षेप समाप्त कर दिया गया। वक्फ बोर्ड के पास निर्णयन संबंधी असीमित अधिकार होने का मामला उत्तरोत्तर गंभीर होता गया।
वक्फ अधिनियम 1995 में 40 से अधिक संशोधनों की स्वीकृति कैबिनेट में पास होने के पश्चात 8 अगस्त 2024 को वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन एवं प्रबंधन की दक्षता बढ़ाना है। इस संशोधन के प्रमुख लक्ष्य है वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन का आधुनिकीकरण करना, महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना, केंद्रीय वक्फ परिषद् और वक्फ बोर्ड्स में सभी समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना, मुकदमेबाजी को कम करना, राजस्व विभाग के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित करना, न्यायाधिकरण के निर्णयों पर न्यायिक निगरानी करना आदि। विपक्ष के हंगामे के बाद इस संशोधन विधेयक को जेपीसी को सौंप दिया गया था। जेपीसी ने देशभर में लोगों की राय जान ली है और 27 जनवरी 2025 को अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी है।
- यह संशोधन विधेयक पारित होने के बाद वक्फ अधिनियम 1995 का नाम संयुक्त वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता एवं विकास अधिनियम, 1995 हो जायेगा।
- किसी भूमि को वक्फ घोषित करने की अनुमति निम्नलिखित तरीकों से दी जाती है।
- घोषणा द्वारा (वक्फ बोर्ड द्वारा निर्धारित करना), उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ की घोषणा और उत्तराधिकार का वंश समाप्त होने पर बंदोबस्ती (वक्फ-अलल-औलाद)।
वर्तमान स्थिति के अनुसार वक्फ के रूप में पहचान की गई कोई भी संपत्ति ( सरकारी व गैर-सरकारी) वक्फ मानी जा सकती है। अधिनियम की धारा 40 के अनुसार, वक्फ बोर्ड को यह जाँच करने और निर्धारित करने का अधिकार है कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं।
संशोधन के बाद वक्फ के रूप में पहचान की गई कोई भी सरकारी संपत्ति वक्फ नहीं मानी जाएगी। अनिश्चितता की स्थिति में उस क्षेत्र का कलेक्टर स्वामित्व का निर्धारण करेगा और राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपेगा। संशोधन के द्वारा वक्फ अधिनियम की धारा 40( वक्फ बोर्ड की वक्फ संपत्ति की निर्धारित करने की शक्ति) के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। वर्तमान स्थिति में वक्फ के सर्वेक्षण करने के लिए सर्वेक्षण आयुक्त एवं अतिरिक्त आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान है। संशोधन के बाद सर्वेक्षण करने का अधिकार कलेक्टरों को दिया गया है। लंबित सर्वेक्षण राज्य के राजस्व कानूनों के अनुसार किए जाएंगे।
अब संशोधन के बाद विधेयक में केंद्रीय वक्फ परिषद् में दो सदस्य गैर-मुस्लिमों के लिए भी जगह दी गई है। सदस्यों में दो मुस्लिम महिलाओं की भी अनिवार्यता कर दी गई है। शिया, बोहरा एवं आगाखानी आदि मुस्लिम संप्रदायों के लिए भी अलग-अलग वक्फ बोर्ड बनाने की दिशा भी सुझाई गई है।
वक्फ की संपत्ति वक्फ की ही रहती है!
जब कोई संपत्ति एक बार वक्फ घोषित हो जाती है, तो वह हमेशा के लिए वक्फ ही रहती है। जिसने हजारों विवादों और दावों को जन्म दिया है। वक्फ बोर्ड द्वारा अतिक्रमण भी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर सामने आयी है। उदाहरण के लिए सितंबर 2022 में तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने ऐसी भूमि पर दावा कर दिया जहाँ कोई मुस्लिम थे ही नहीं और न ही उस स्थान पर कोई इतिहास रहा। उस स्थान को मात्र हिंदुओं ने बसाया, वो गाँव था थिरुचेंदुरई गाँव। ऐसा वक्फ एक्ट 1995 को 2013 में असीमित शक्तियों से नवजाने के बाद हुआ। ऐसे बहुत से मामले देखने और सुनने में आये हैं।
वक्फ नौकरशाही की अकुशलता के कारण अतिक्रमण, स्वामित्व विवाद एवं पंजीकरण व सर्वेक्षण में देरी जैसी समस्याएँ सामने आई हैं। जैसे लखनऊ में जिस भूखंड पर फॉरेंसिक विज्ञान संस्थान की स्थापना की गई है उसे पूर्व में में फर्जी तरीके से वक्फ संपत्ति घोषित करके निजी स्वामित्व धारक को बेच दिया गया था। ऐसे बहुत से मामले देखने में आये हैं।
वक्फ न्यायधिकरणों के निर्णयों पर न्यायिक निगरानी की अनुपस्थिति से समस्या और भी जटिल हो गई है। वक्फ न्यायधिकरणों में लगभग 41000 मामले लंबित हैं।
मीडिया में छपी प्रमाणित ख़बरों के मुताबिक अब कानून बनने पर होंगे ये बदलाव….
■ वक्फ को अब किसी भी धर्म को मानने वाले संपत्ति नहीं दे सकेंगे, बल्कि वही दान कर सकेगा, जो कम से कम पांच साल से इस्लाम का पालन कर रहा हो।
■ नए बिल में कहा गया है कि महिलाओं के उत्तराधिकार के अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता है।
■ वक्फ बोर्ड के पास वक्फ की स्थिति निर्धारित करने का अधिकार भी खत्म कर दिया गया है। 1995 के कानून में वक्फ बोर्ड के पास वक्फ भूमि की घोषणा और प्रबंधन करने का अधिकार था, लेकिन नए बिल में यह जिम्मेदारी राज्य द्वारा नियुक्त अधिकारियों को सौंप दी गई है।
■ बिल में आदिवासियों की संपत्तियों को वक्फ के भीतर आने से बचाने के लिए भी प्रावधान किया गया है, जिसमें कहा गया कि शिड्यूल – 5 और शिड्यूल-6 में आने वाली संपत्तियों को वक्फ नहीं किया जा सकता है।
■ एक ‘उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ’ को हटाना है, जिसका अर्थ है कि किसी जमीन को केवल इसलिए वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है, क्योंकि इसका उपयोग समय के साथ किया गया है। इसके बजाय, केवल आधिकारिक तौर पर वक्फ के रूप में घोषित या दान की गई भूमि को ही मान्यता दी जाएगी।
असीमित शक्तियों ने भटकाया :
सच्चर कमेटी की वर्ष 2006 की रिपोर्ट में अन्य बातों के अलावा विनियमन, अभिलेखों के कुशल प्रबंधन, वक्फ प्रबंधन में गैर-मुस्लिम तकनीकी विशेषज्ञता को शामिल करने और वक्फ को वित्तीय लेखा परीक्षण के तहत लाने की भी सिफारिश भी की गई थी।
मार्च 2008 में राज्य सभा में प्रस्तुत वक्फ पर संयुक्त संसदीय कमेटी की रिपोर्ट में वक्फ बोर्ड्स की संरचना में सुधार करने, वक्फ संपत्तियों के अनधिकृत हस्तांतरण के लिए सख्त कार्रवाई करने, भ्रष्ट मुतवल्लियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करने, कुछ मामलों में उच्च न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप की गुंजाइश बनाने, वक्फ बोर्ड्स का कंप्यूटरीकरण करने और केंद्रीय वक्फ परिषद् में शिया समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की सिफारिश की गई थी। पर यह सिफारिश अमल पर न आ सकी। कुछ समय पूर्व आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अहमदिया मुस्लिम को मुसलमान मानने से इनकार कर दिया था। अतः वक्फ बोर्ड्स में सुधार की आवश्यकता जरूर समझ में आती है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस नये संशोधन विधेयक को मुस्लिमों के पर्सनल लॉ पर हस्तक्षेप बताया। लेकिन पूर्व की सरकारों द्वारा वोट बैंक के चलते बोर्ड के असीमित शक्तियों से नवाजते रहे तब हस्तक्षेप नजर नहीं आया। शिया, बोहरा, आगाखानी, अहमदिया व अन्य मुस्लिम संप्रदायों को गौड़ रखने वाले वक्फ बोर्ड में जब नये संशोधन के तहत सबको बराबर का हक देने की बात कही जा रही है तो बराबरी के इस हक को भी कुछ लोग स्वीकार करने को तैयार नहीं है। हालाँकि, सूफी दरगाहों का प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वोच्च संस्था ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल ने संशोधन विधेयक का स्वागत किया है।
कई लोगों का मानना है कि वक्फ का जो मकसद था वो असीमित शक्तियाँ पा अपने मकसद से भटक गई और अवैध कब्जेदारी, भूमाफिया के काम में लग गई। गरीब मुस्लिमों की सेवा तो दूर उनका हक भी मारा जाने लगा। इसी के सुधार में वक्फ के सही मकसद को पुनः लागू करने के लिए यह वक्फ एक्ट में संशोधन अति आवश्यक है।
वक्फ एक्ट पर संशोधन धर्म के मूल अधिकार पर कतई चोट नहीं है क्योंकि कांग्रेस द्वारा अनियमित रूप से असीमित शक्तियों से जो नवाजा गया है उस अनियमितता और उन असीमित शक्तियों को ही सुधारा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में एक लाख अट्ठाईस हजार संपत्तियां का दावा :
वक्फ बोर्ड ने उत्तर प्रदेश में लगभग एक लाख अट्ठाईस हजार संपत्तियां होने का दावा किया है लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में 3000 संपत्तियां ही दर्ज हैं। अब वक्फ बोर्ड से साक्ष्य मांगे जा रहे हैं तो आपत्तियाँ क्यों? वक्फ एक्ट की धारा-37 के तहत वक्फ में दर्ज संपत्ति की एक प्रति संबंधित तहसील को भेजना अनिवार्य है। जब बोर्ड किसी संपत्ति को वक्फ के रूप में दर्ज करके नोटिफिकेशन जारी करता है, तो उसकी एक प्रति संबंधित तहसील को भेजनी होती है। ताकि तहसील प्रशासन उस संपत्ति का वक्फ के पक्ष में नामांतरण कर सके या असहमत होने पर कारण सहित वापस कर दे। यह प्रक्रिया नोटिफिकेशन जारी होने के छह माह के भीतर पूरी करना अनिवार्य है। वक्फ (संशोधन) विधेयक-2024 पर संसद द्वारा जेपीसी ने देशभर में राय ले ली है। जेपीसी की रिपोर्ट के अनुसार संभावित है संसद के बजट सत्र में वक्फ संशोधन विधेयक के लिए कार्यवाही हो।
मोदी सरकार में मुस्लिमों की शिक्षा के प्रति सुधार:
आज सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में, जहां दुनिया एक मुट्ठी में है, गलत व्याख्याओं और विचारों को फैला कर नफरत परोसा जा रहा है। मोदी सरकार में मुस्लिमों की शिक्षा के प्रति सुधार हो रहा है। आजादी के 70 सालों बाद भारत की बड़ी-बड़ी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में मुस्लिम अभ्यर्थियों के पास होने का अनुपात बहुत तेजी से बढ़ा है। आजादी के 70 सालों में कुल मिलाकर जितने आईएएस मुस्लिम अभ्यर्थी बने उससे कहीं बहुत अधिक मोदी सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल में बन गए और यह क्रम लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यही नहीं राज्य की सिविल परीक्षाओं में भी तीव्रतर अनुपात बढ़ा है, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बढ़ रहा है। अगर वास्तव में मोदी सरकार भेदभाव करती तो ऐसे परिणामों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। मोदी सरकार का ये प्रोत्साहन कट्टरपंथ को कभी समझ नहीं आएगा, लेकिन इस्लाम के राष्ट्र दर्शन और इंसानियत दर्शन को मानने वाले तथा शिक्षित और जागरूक मुसलमान इन बातों के मूल को समझ रहा है।
भड़काऊ पोस्टों पर बैन लगाने की जरूरत :
सरकार तो हर योजनाओं और हर सरकारी नौकरियों में सभी मुस्लिमों को बराबर सम्मान दे रही है। हाँ! अपराधों में जरूर पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा ढाल के रूप में काम नहीं आ रही। अब भारतीय संविधान के समता और न्याय के सिद्धांत के तहत ही देश को बढ़ाया जा रहा है तो इसमें सबका सहयोग होना जरुरी है। जिससे भारत विश्व में शांति, न्याय और समता का सूरज बनकर सदैव चमकता रहे। वैसे भारत में आज भी अन्य मुस्लिम देशों से ज्यादा यहां के मुस्लिमों को सम्मान और आजादी है, अन्य देशों जैसे भय का वातावरण नहीं है। हां! ये कथित भय, समाज में विपक्षी पार्टियों द्वारा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में जरूर बनाकर पेश किया जा रहा है। सोशल मीडिया की ऐसी पोस्टों पर बैन लगाने की भी जरूरत है। जिससे ये कथित और काल्पनिक भय लोगों के दिमाग से उतरे। संसद के बजट सत्र में में वक्फ एक्ट में संशोधन को लेकर भी तेजी आई है , इस संशोधन में पक्ष जहां मजबूत नजर आ रहा है वहीं विपक्ष कमजोर पड़ रहा है। इस विषय को लेकर देश में माहौल गर्म है लेकिन जैसे ही इस संशोधन की जमीनी हकीकत लोगों के बीच आएगी और जरूरतमंद मुस्लिमों के हितों को साधेगी तो इस संशोधन को लेकर बना भय भी धीरे धीरे स्वतः ही कम होता जाएगा और सरकार पर लोगों का भरोसा और कायम होता जाएगा।
‘संविधान की मूल भावना पर चोट’
कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा कि ये संविधान की मूल भावना पर आक्रमण करने वाला बिल है। मंत्री ने 2013 में यूपीए सरकार के विषय में जो कहा वह मिसलीड करने वाला बयान है, झूठ है। इन्होंने जो आरोप लगाए हैं और भ्रम फैलाया है, वो बेबुनियाद है। उन्होंने कहा कि इस सरकार के चार मकसद हैं। संविधान को कमजोर करना, भ्रम फैलाना और अल्पसंख्यकों को बदनाम करना, भारतीय समाज को बांटना ।
अब राज्यसभा मे क्या है बीजेपी का गणित?
वक्फ संशोधन विधेयक लोकसभा से पास होने के बाद जब राज्यसभा में पेश होगा तो सरकार को ज्यादा मुश्किल नहीं होने वाली है। बीजेपी के लिए राहत की बात यह है कि एनडीए में शामिल जेडीयू, टीडीपी, शिवसेना, एनसीपी जैसे सदस्यों का समर्थन मिलेगा।
- 236 सदस्य राज्यसभा में इस समय
- 119 समर्थन की जरूरत बहुमत के लिए
- 98 सांसद है बीजेपी के पास अपने
- मनोनीत सदस्य 6 हैं। माना जाता है, ये सरकार के पक्ष में ही वोट करते हैं।
- अब देखें तो एनडीए के पास 121 सांसदों से ज्यादा का समर्थन नजर आ रहा है।







