हम भी अगर बच्चे होते, नाम…!

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बाल दिवस विशेष: जी.के.चक्रवर्ती

आज 14 नवंबर का दिन है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर देश से निकलने वाले अनेको पत्र पत्रिकाओं में विशेषतः हिंदी के समाचार पत्रों में देखने के बाद पाया कि इक्का – दुक्का समाचार पत्रों को छोड़ के अधिकतर प्रमुख  समाचार पत्रों में कही भी हमारे देश के नौनिहालों के बीच या नौनिहाल पर मनाया जाने वाला children’s day पर हम बड़ों की नजरें ही नहीं पड़ी और उन्हें हमने हासिये पर ही रखा उसके बाद मन में यह विचार आया कि हमारे बच्चों पर भी कुछ अवश्य लिखा जाना चाहिए ऐसा सोचते हुए बच्चों और अपने बचपन की यादें ताजा हो आई । आज ही के दिन जब हम हाथों में झंडे लेकर सुबह सुबह स्कूल से रैली निकालते थे। हम सभी लोगों ने अपने अपने बचपन के अनुभव को महसूस अवश्य किया हैं।

हम सभी लोग यह जानते हैं कि नेहरू जी जिन्हें हमारे देश के बच्चे चाचा नेहरू के नाम से जानते उनके जन्म दिन को को हम बाल दिवस के रूप में मनाते चले आ रहे हैं इस दिन इन स्कूलो से निकलने वाली रैलियों में चाचा नेहरू के नारे शामिल तो होते ही थे इसके अलावा सभी बच्चों को टीचर्स एवं अन्य लोग बाल दिवस की शुभकामनाएं देते हैं कभी कभी तो बच्चों को बाल दिवस के मौके पर चॉकलेट्स से लेकर अनेकों रंग विरंगी पेन्सिल, चित्रकारी के रंगों के डिब्बे गिफ्ट में मिल जाते थे लेकिन आज वर्त्तमान समय के आधुनिक भारत के अधिकतर लोग शादी, पार्टी या जन्म दिन से लेकर ऐसे ही मौको पर मोबाइल पर या सोशल मीडिया जैसे माध्यमों से एक दूसरे को शुभ कामनाएं और मुबारकबाद। देकर ही इसकी इतिश्री कर ली जाती है।

किसी भी तरह के खास दिन लोग एक दूसरे को इसी इसी माध्यम से विश कर अपने आप को धन्य मान लेते है इस दिन को अनेको आयेजानो के द्वारा मनाएं और अपने मित्रों के साथ ही साथ बच्चों में अपने आलावा देश समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के निभाने का संदेश देकर इस दिन को पूर्ण सार्थक बनाने का प्रयास करे अपनी बचपन की यादों को ताजा करते हुए,
हम भी अगर बच्चे होते नाम हमारा होता झबल्लु डबल्लु खाने को मिलते लडडू और दुनिया कहती….।

तितर के दो आगे तितर तितर के दो पीछे तितर आगे तितर पीछे तितर……
इचक दाना -पिचक दाना, दाने उपर दाना………
कितना प्यारा निर्विकार छल कपट राग द्वेष से मुक्त निश्चंद था वह प्यारा सा बचपन।
आज का दिन है बच्चों के बचप्पन की
कोमल तन मन का और पुष्पों के कलियों के कोमल पंखुड़ीयों जैसा चलो आज फिर से खेलें कोई खेलें बचपन का खेल अटपटा सा।

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