दूसरों के विचारों को अवश्य सुनें, हो सकता है उसके विचार अच्छे हों बात ऊँचे स्तर का हो नयी बात हो तभी तो नया सीखेंगे तभी तो एक दूसरे से बोलना सीखेंगें किसी के विचारों से सहमत होना एक बात है और किसी के विचारों को सुनना दूसरी बात विचार किसके हैं से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि विचार कैसे हैं ?
मित्र भी अगर बुरे विचारों को रखकर गलत यानीतर्कहीन सलाह देता हो तो उस सलाह को त्यागदेना ही हितकर है और शत्रु भी यदि अच्छी सलाह देता है तो वो भीश्रेयस्कर है विचार का सही गलत का आंकलन मित्र या शत्रु से न करके विवेक या तर्क से करना ही उचित है इस का प्रमाण यह नीति श्लोक भी है….
युक्तियुक्तं वचो ग्राह्यं बालादपि शुकादपि ।
अयुक्तमपि न ग्राह्यं साक्षादपि बृहस्पतेः ॥
तर्कयुक्त वचन बालक या तोते से भी ग्राह्य है किन्तु तर्कहीन वचन यदि साक्षात बृहस्पति भी कहें तो नहीं मानना चाहिए यदि लोगों के बीच आप ही बात करते रहोगे तो आप केवल वही दुहरायेंगे जो आप जानते हैं परन्तु दूसरों को सुनोगे तो जरूर कुछ नया सीखने को मिलेगा आप भले ही दूसरों के विचारों से सहमत न हों कोई बात नहीं, लेकिन एक बार दूसरों के विचारों को सुन अवश्य लेना चाहिए… जिन्दगी की आधी शिकायतें ऐसे ही दूर हो जाएँ अगर लोग एक दूसरे के बारे में बोलने के वजाय एक दूसरे से बोलना सीख जाएँ दूसरों के विचारों को प्रगट करने की अभिव्यक्ति का जरूर सम्मान करें….







