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    Home»ब्लॉग

    छोटा हूं ज़िंदगी से, पर मौत से बड़ा हूं

    By October 7, 2017 ब्लॉग No Comments22 Mins Read
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    प्रभाष जोशी के अर्जुन और एकलव्‍य दोनों थे आलोक तोमर

    दयानंद पांडेय  

    छोटा हूं ज़िंदगी से पर मौत से बड़ा हूं. आलोक तोमर के निधन की खबर जब होली के दिन मिली तो सोम ठाकुर के एक गीत की यही पंक्तियां याद आ गईं. सचमुच मौत आलोक तोमर से बहुत छोटी साबित हुई. लेकिन अपना अपराधबोध भी अब साल रहा है. माफ़ करना आलोक, मैं तुम्हें देखने, मिलने नहीं आ सका. चाह कर भी.

    माफ़ करना यार मैं इतना कायर हो जाऊंगा यह मैंने कभी नहीं सोचा था. यह भी नहीं सोचा था कि तुम इतनी जल्दी सिधार जाओगे. यशवंत सिंह ने अभी हफ़्ता-दस दिन पहले ही एक रात फ़ोन किया कि एक बार आ कर आलोक जी से मिल लीजिए. वह अस्पताल से घर आ गए हैं. वह बता रहे थे कि अब पता चला है कि उनको कैंसर है ही नहीं सारी किमियोथिरेपी गलत हो गई. उनको तो ट्यूमर है. ऐसे ही और तमाम बातें अपनी रौ में बोलते जा रहे थे. [रात में वह ऐसे ही विह्वल हो कर बोलते हैं.] और बीच-बीच में संपुट सा जोड़ते जाते थे कि आप एक बार आलोक जी से आ कर मिल ज़रूर लें. उन्हें अच्छा लगेगा. इसके पहले भी दो बार यशवंत ऐसा ही कह चुके थे. और मैं चाह कर भी नहीं जा पाया.

    सच बताऊं एक लड़ते हुए आदमी को मरते हुए देखने की हिम्मत मुझमें नहीं थी. हालांकि मैंने तब यशवंत सिंह से कहा कि ज़रूर. ज़रूर आऊंगा. इसलिए भी आऊंगा कि जब वह लखनऊ आता था तो मुझसे मिलता ज़रूर था. यहां तक कि एक बार मैं मर रहा था तब वह मुझे दिल्ली से चल कर देखने आया था. अटल बिहारी वाजपेयी को साथ ले कर आया था. ऐसा उसने ही बताया था. एक बार. वह तब भी अटल बिहारी वाजपेयी के साथ ही लखनऊ आया था. पायनियर हिंदी साप्ताहिक के विमोचन के मौके पर. गनीमत कि उसने तब यह नहीं कहा कि वाजपेयी जी मेरे साथ आए हैं. हालांकि जैसी कि बड़बोलेपन की उसकी आदत थी, वह यह भी कह सकता था. पर उस बार सुप्रिया जी और बेटी भी साथ में थी इसलिए वह थोड़ा बच रहा था.

    खैर वह जब मिला तब आदत के मुताबिक तपाक से बोला, ‘बोलो हम लोग पिछली बार कब मिले थे?’मेरे लिए यह सवाल अप्रत्याशित था. मैं याद करने की कोशिश करने लगा. वह फिर तपाक से बोला, ‘तुम को याद भी कैसे होगा भला? तुम तो तब अस्पताल में थे. मैं अटल जी को साथ ले कर आया था.’ यह 1998 की बात है. तब संसदीय चुनाव हो रहे थे. मुलायम सिंह यादव संभल से चुनाव लड़ रहे थे. हमलोग संभल कवरेज के लिए जा रहे थे. अंबेसडर से थे. सीतापुर के पहले खैराबाद में हमारी अंबेसडर एक ट्रक से लड़ गई. जय प्रकाश शाही और हम अगल- बगल ही बैठे थे. शाही जी और ड्राइवर मौके पर ही दिवंगत हो गए. मैं और गोपेश पांडेय बच गए थे. गोपेश जी आगे की सीट पर थे. उन्हें और मुझे भी बहुत चोट आई थी. मेरा तो जबडा, हाथ, पसलियां सब टूट गई थीं. सिर फूल कर इतना बड़ा हो गया था कि कंधा दिखाई नहीं देता था. छह महीने बिना खाए रहना पड़ा था. लिक्विड पर.

    मेरी उस तकलीफ में आलोक तोमर आया था. और बता रहा था कि अटल विहारी वाजपेयी को ले कर आया था. फिर मैं ने कहा, ‘ओह, अच्छा-अच्छा!’ तो उसे यह खराब लगा. बोला, ‘अच्छा-अच्छा क्या, आया था भाई. तुम्हें दिल्ली ले चलने तक की बात की थी. अटल जी ने. पर डाक्टरों ने कहा कि ले जाने की स्थिति नहीं है. और कि बचना होगा तो यहीं के इलाज से बच जाओगे.फिर वह कई पुरानी यादों में उलझ गया. इनकी- उनकी यादों में उलझ गया. जनसत्ता की यादों में उलझ गया. इतना कि सुप्रिया जी को बीच में आना पड़ा. कहने लगीं, ‘ये तो ऐसे ही हैं. पुरानी यादों मे उलझते हैं तो उलझते ही जाते हैं. इनको कोई रोक नहीं सकता. फिर वह ज़रा तफ़सील में आ गईं. बताने लगीं कि शादी के बाद एक बार ये मुझे अपने गांव ले गए. अपने बचपन के दिनों में चले गए. ले गए एक झरना दिखाने कि यहां मैं ऐसे नहाता था. पर जब मौके पर पहुंचे तो झरना नदारद. अब ये परेशान. ऐसे ही गांव की जो चीज़ दिखाना चाहें, वह नदारद. लोग नदारद. पर इनकी ज़िद कि नहीं यहीं कहीं होगा. फिर मैंने इनसे पूछा कि गांव कितने सालों बाद आए हैं? तो यह बोले, ‘सालों बाद!’ फिर मैंने कहा, ‘इतने कई सालों में जब आप बदल गए, शादीशुदा हो गए तो क्यों चाहते हैं कि आप का गांव न बदले? यहां की चीज़ें न बदलें? अरे बदलना तो है. प्रकृति भी बदलेगी. बड़ी मुश्किल से यह माने. यह जल्दी कोई बात मानते ही नहीं. ‘बात सही थी. ऐसी कई बातों का मैं भुक्तभोगी भी था और साक्षी भी. फिर वह नवभारत टाइम्स में सुप्रिया जी को कैसे तंग किया गया. उन व्यौरे पर उतर आया. फिर सुप्रिया जी ने अनेक अप्रिय प्रसंग सुनाए नवभारत टाइम्स के और बताया कि अंतत: उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया. फिर हम लोग अपनी मुफ़लिसी के दिनों की याद में लौटे.

    शायद 1981 की गर्मियों की दोपहर थी. शायद मई का महीना था. ठीक-ठीक याद नहीं. आलोक और मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में डीटीसी की एक बस में हुई थी, यह याद है. झंडेवालान से दिल्ली प्रेस से निकल कर मैंने बस पकड़ी. बस में भीड़ बहुत थी. थोड़ी देर खडे़ रहने के बाद बैठने की जगह मिली. ज्यों बैठा त्यों आलोक भी बगल में आ कर बैठा. बैठते ही पूछा, ‘आप दयानंद पांडेय हैं?’ मैं चौंका. बोला, ‘हां.’ वह हाथ मिलाते हुए बोला, ‘मैं आलोक तोमर..’ मैंने कहा, ‘वो तो ठीक है. पर आप मुझे कैसे जानते हैं?’ वह बोला, ‘अभी दिल्ली प्रेस में. आप फलां से मिलते हुए अपना नाम बता रहे थे, तब मैंने सुना. आप के लेख भी पढे़ हैं मैंने.’ उसने जोड़ा, ‘मैं भी लिखता हूं.’ फिर हम लोग कहीं न कहीं ऐसे ही मिलते रहे. वह हम लोगों के संघर्ष के दिन थे. नौकरी खोजने के दिन थे. यहां-वहां लिखने के दिन थे. फ़्रीलांसिग करते थे हम लोग तब. बाइज़्ज़त बेरोजगारी के लिए फ़्रीलांसिंग शब्द ज़्यादा मुफ़ीद पड़ता था. फिर जुलाई, 1983 में जनसत्ता में आए. वह जल्दी ही स्टार रिपोर्टर हो गया. फिर दुनिया जानने लगी उसे. क्राइम रिपोर्टिंग में वह मानक बन कर उभरा. प्रभाष जोशी उसके अनन्य प्रशंसक थे. बल्कि कुछ समय पहले एक फ़िल्म आई थी, दुल्हन वही जो पिया मन भाए. मैं इसी तर्ज़ पर उससे कहता- रिपोर्टर वही जो एडिटर मन भाए. तो वह गुस्साता नहीं, मुस्कुराता और कहता, ‘ये बात इन साले डेस्क के लोगों को भी बताओ न! ये तो जब देखो खबर की ऐसी तैसी करते रहते हैं.

    डेस्क वालों से अक्‍सर रिपोर्टरों की ठनती रहती है. पर आलोक की तो जैसे हरदम. वह अक्‍सर उलझ पड़ता और डेस्क वाले मानते नहीं थे. जोशी जी को इंटर्विन करना पड़ता. बार-बार. वह कई बार एक साथ एक ही दिन दो-दो खबरों पर बाइलाइन मांगता. डेस्क के लोग नहीं देते. वह उनकी ऐसी तैसी करता और जोशी जी के पास दौड़ लगाता. कई बार वह रूटीन खबरों पर भी बाइलाइन मांगता. अंतत: जोशी जी को कहना पड़ गया कि अगर रूटीन खबर भी रिपोर्टर ने ट्रीट की है तो बाइलाइन जाएगी. यहां तक कि प्रेस कान्फ्रेंस तक में. अगर ट्रीट की गई है तो. और जो खबर एक्‍सक्‍लूसिव है तो एक नहीं दस खबरों पर भी बाइलाइन दी जा सकती है. आलोक तोमर की ज़िद पर यह फ़ैसला जोशी जी ने डेस्क को दिया. और आलोक तोमर ने बार-बार एक ही दिन के अखबार में डबल बाइलाइन ली. प्रेस कांफ्रेंस तक में बाइलाइन ली. कोई कुछ कहता तो जोशी जी डेस्क के लोगों को जैसे नसीहत देते और कहते, ‘रिपोर्टर अखबार की भुजा है. भुजा मज़बूत होगी तो अखबार भी मज़बूत होगा.’ [पर अफ़सोस कि डेस्क के लोगों को यह बात अभी तक समझ में नहीं आई. आगे भी अब खैर क्या आएगी?] और देखिए यह चिनगारी नवभारत टाइम्स तक पहुंची. राजेंद्र माथुर ने भी ऐसा ही करना शुरू कर दिया. आलोक की फिर भी डेस्क से ठनी ही रहती. कई बार क्राइम की खबरें देर रात तक मेच्योर होतीं और जोशी जी रात के आठ बजते न बजते दफ़्तर छोड़ देते. अब आलोक की खबर पर डेस्क की खुन्नस और उतरती. डेस्क के लोग कई बार पर्सनल हो जाते आलोक की खबर पर, और जहां-तहां काट पीट कर देते. फिर वह जूझ जाता.

    एक शिफ़्ट इंचार्ज़ थे. कहते थे, ‘यह साला गप्प बहुत लिखता है. कोई भी मर जाता है तो यह ठीक उसकी मौत के पहले उससे मिल लेता है और उसकी आंखों में मौत की परछाईं देख लेता है. और दूसरे दिन उसकी मौत पर यह लिख देता है.’ वह ऐतराज़ जताते हुए उसकी खबर किचकिचा कर काट देते. दूसरे दिन वह फिर उलझ जाता. वाद-प्रतिवाद होता. वह पूछता, ‘मेरी खबर पर आज तक कोई खंडन आया?’ तो शिफ़्ट इंचार्ज़ भी तरेरते हुए कहते, ‘मरे हुए लोग खंडन नहीं भेज सकते, नहीं तो ज़रूर आता.’ वह भनभना कर रह जाता. कहता, ‘ये डेस्क वाले खुद चोर हैं और दूसरों को भी ऐसा ही समझते हैं.’ पर यह सब शुरुआती दिनों की बात है. बाद में तो उसकी खबरों को छूने की हिम्मत किसी की नहीं होती. वह फिर मनमानी का भी शिकार हुआ. क्राइम की खबरों में थोड़ा बहुत झूठ और अटकल मिलाने की छूट और गुंजाइश हमेशा होती है. पर आलोक कई बार थोड़ी अति कर देता था. पर खबरों का वह बादशाह था. सो उसके सौ खून माफ़ थे. और फिर सौ बात की एक बात कि दुलहन वही जो पिया मन भाए. तो जोशी जी जैसा कडि़यल संपादक भी उसको मानता था महत्वपूर्ण यह भी था. फिर बाद में तो वह जोशी जी का मानस पुत्र माना जाने लगा. कुछ डेस्क के लोग तंज में दत्तक पुत्र भी कहते. और जब उसकी शादी के लिए नारियल लेकर जोशी जी सुप्रिया रॉय जी के घर गए तब तक तो वह उनका मानस पुत्र, दत्तक पुत्र जो कहिए स्थापित हो गया था. अब उसके दिन सोने के, रात चांदी की हो गई थी.

    तो अलोक ने भी एक से एक नायाब खबरें ब्रेक कीं. मैंने देखा कि एक खबर और दूसरे प्रभाष्‍ा जोशी के लिए वह कुछ भी कर सकता था. करता ही था. वह कई बार सचमुच रूटीन खबरों में से भी इक्सक्‍लूसिव खींच लाता था. भाषा तो जैसे उसकी गुलाम थी. कहूं कि वह राणा प्रताप था और भाषा उसकी चेतक. सो अब यह कहना मेरे लिए कठिन ही है कि वह भाषा को जैसे चाहता था वैसे ही घुमाता था या कि श्याम नारायन पांडेय को याद करूं तो कहूं कि राणा की पुतली फिरी नहीं कि चेतक तुरंत मुड़ जाता था. सचमुच सच-सच जान पाना मेरे लिए आज भी कठिन है. पर यह सच तो बतला ही सकता हूं कि उसके उस भाषा के बीच राणा और चेतक का ही रिश्ता था. अटूट रिश्ता. शायद यही उसकी ताकत थी. नहीं यह बात तो आप भी जानते हैं कि खबर तो ज़्यादातर लोगों के पास होती है पर उसे परोसने का सलीका किसी-किसी ही के पास होता है. आलोक तोमर उनमें विरल था. और सोने पर सुहागा यह कि उसके पास प्रभाष जोशी नाम का एक संपादक भी था. खैर, मैं बात तब के दिनों की कर रहा था. नहीं खबर आप जैसी भी लिखें, डेस्क और संपादक मिल कर उसका क्या गुड़ गोबर कर दें यह कोई नहीं जानता. मेरे जैसे बहुतेरे रिपोर्टर इस पीड़ा के अनेक दृष्‍टांत समेटे बैठे हैं. आलोक के पास भी बावजूद प्रभाष जोशी के इस पीड़ा की एक बड़ी गठरी थी. जिसे शायद वह यहीं छोड़ गया होगा साक्षर किस्म के डेस्क वालों की फ़ौज़ के लिए.

    खैर तो बात मैं कर रहा था कि रूटीन खबरों में भी भाषा के बूते क्या तो वह कमाल करता था! कुछेक खबरों की याद दिलाता चलता हूं. जैसे कि उत्तर प्रदेश में तब वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री बने थे. आलोक ने खबर लिखी, ‘का हो वीर बहादुर बन गए मुख्यमंत्री!’ वीर बहादुर गोरखपुर के थे. भोजपुरी वाले थे. भोजपुरी वाले अकसर दुख में हों, सुख में हों यह ‘का हो!’ का संबोधन जब-तब उच्चारते ही रहते हैं. आलोक मध्य प्रदेश का रहने वाला था. चंबल के बीहड़ का. वह बार- बार यह जताता भी रहता था. और मज़ाक-मज़ाक में कहता था, ‘हां, मैं खबर लूटता हूं.’ उत्तर प्रदेश उसकी बीट भी नहीं थी. पर हमारे जैसे भोजपुरियों की सोहबत में वह ‘का हो!’ का मर्म पकड़ बैठा और वीर बहादुर से कुछ मुलाकातों का व्यौरा बटोर कर और उसमें उनकी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का पहाड़ा जोड़ कर लिख दिया, ‘का हो वीर बहादुर बन गए मुख्यमंत्री!’ एक खबर देखिए और याद आ गई. सारे अखबारों में उस दिन आम बजट की खबर छाई हुई थी. पर उस बजट की बयार में भी आलोक की एक दूसरी खबर जनसत्ता में टाप बाक्स बन कर छाई हुई थी- ‘इस बजट की बहस में यह चेहरा भी देख सकेंगे आप!’ एक नन्हीं सी, फूल सी लड़की पर तेज़ाब फेंक दिया गया था. उस का चेहरा झुलस गया था. ज़ाहिर है उस दिन बजट से ज़्यादा वह खबर पढ़ी गई. फिर बाद में बजट चर्चा के पहले उस खबर की चर्चा भी सदन में हुई. गो कि वह खबर मध्य प्रदेश की थी. ऐसी जाने कितनी खबरें आलोक के खाते में दर्ज़ हैं.

    अभी नीरा राडिया प्रसंग को ही लें. भले ही नेट पर ही सही जितनी मारक और धारदार और कि सबसे पहले कोई खबर लिख रहा था तो वह आलोक तोमर ही था. क्या-क्या रिश्ते खोजे मीडिया और राडिया के. कितने तो पेंच खोजे. सारे स्वयंभूओं की पैंट उतार कर रख दी थी कि कोई सांस भी नहीं ले पाया. लोकसभा, सुप्रीम कोर्ट और अखबारों में तो खबरें, टिप्‍पणियां बहुत बाद में आईं. प्रभु चावला और उनके बेटे को लेकर या फिर अमर उजाला के मालिकों में फैले झगडे़ को लेकर, भास्कर मालिकों में झगडे़ और अंतर्द्वंद्व को ले कर जितनी और जितनी तरह की खबर आलोक ने लिखीं, इस मारक बीमारी से लड़ते हुए लिखीं, यह एक मिसाल है. लोग तो मामूली दारोगाओं से भी मौका पड़ते गलबहियां करते दिखते हैं. पर वह बडे़-बडे़ पुलिस कमिश्नरों को भी जूते की नोंक पर रखता था. यह अनायास नहीं था कि वह कहता था कि श्मशान पर भी वह चलते हुए जाएगा! उस के आत्मबल की पराकाष्‍ठा थी यह. और मैं तो एक बार कहता हूं कि वह पैदल ही गया. आखिर उसको कंधा देने वाले खबरची उसके पांव नहीं तो और क्या थे? अभी मैं बात रिपोर्टर वही जो एडिटर मन भाए की कर रहा था. बतर्ज़ दुल्हन वही जो पिया मन भाए. तो असल में तो वह प्रभाष जोशी का शागिर्द था. कई-कई अर्थ में. वह उनका अर्जुन भी था और उनका एकलव्य भी. कई बार अलग-अलग, कई बार एक साथ. वह उनका हनुमान भी था. यकीन मानिए हिंदी में यह संपादक रिपोर्टर की जोड़ी बहुत समय तक याद की जाएगी.

    हां, यह ज़रूर है कि तब शायद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप में इतिहास अपने को दुहरा रहा था. मेरी जानकारी में एक संपादक और एक रिपोर्टर की और ऐसी ही जोड़ी और थी. कुलदीप नैय्यर और अश्विनी सरीन की. कुलदीप नैय्यर भी अश्विनी सरीन पर ऐसा ही भरोसा करते थे. और तिहाड़ से लगायत कमला तक ढेर सारी खबरें कीं. और अब प्रभाष जोशी और आलोक तोमर की जोड़ी सामने थी. नहीं हिंदी में तो अभी भी और तब भी संपादक रिपोर्टर को चोर ही समझते हैं. और तिस पर क्राइम रिपोर्टर! अब तो खैर बहुतायत में क्या रिपोर्टर, क्या संपादक ज़्यादातर चोर हो भी गए हैं. जितना बड़ा चोर उतना सफल संपादक, उतना सफल रिपोर्टर. कुलदीप नैय्यर तो खैर क्या कर रहे हैं अब सभी जानते हैं. अश्विनी सरीन ने भी बाद में बहुत झटके खाए. लेकिन अंगरेजी में एक शब्द होता है कंप्रोमाइज़. अश्विनी सरीन ने उसे समय रहते जान लिया, सीख लिया. अब भी इंडियन एक्सप्रेस में जमे रहे. तरह-तरह की ज़िम्मेदारियां निभाते हुए. प्रभाष जोशी भी जब तक रामनाथ गोयनका रहे, जमे रहे. बाद में वह भी अंगरेजी के उस शब्द कंप्रोमाइज़ का अनुवाद हिंदी में नहीं कर पाए. कम से कम नौकरी के अर्थ में न जान पाए न सीख पाए और कूच कर गए. और जब गुरु प्रभाष जोशी नहीं यह कर पाए तो शिष्‍य आलोक तोमर भी क्या खाकर जानता, सीखता, कंप्रोमाइज़! कैसे करता हिंदी में उसका अनुवाद. नहीं किया. नतीज़ा सामने था. गधे खेत खाते रहे और जुलाहा मार खाता रहा.

    अब तो अखबारों से भाषा का स्वाद भी बिसर गया है. नहीं जैसे फूलों की सुगंध होती है, बरखा में पानी की उमंग होती है, माटी की सोंधी खुशबू होती है, मां की, बहन की, पत्नी या बेटी द्वारा परोसी थाली में भोजन का जो स्वाद होता है वैसे ही कभी अखबारों में भी, खबरों में भी भाषा का स्वाद होता था. जो अब दलाली और लायजनिंग और कहूं कि तकनीकी पेंच की भेंट चढ़ गया. वह अखबारों में भाषा का स्वाद, वह खबरों में भाषा का स्वाद. आलोक ने अपने लिखे में अभी भी इस गंध को बाकी रखा था. अब वह भी दुर्लभ हो गया. बिसर गया. अब शायद लोगों को इसकी ज़रूरत ही नहीं रही. आलोक दरअसल जाना ही गया अपनी भाषा के लिए. और हां, अपनी पारदर्शिता के लिए भी. नहीं एक से एक मगरमच्‍छ बैठे पडे़ हैं, सांस नहीं लेते अपने किए-धरे पर. पर आलोक दूसरों के ही नहीं अपने स्याह सफ़ेद पर भी बेलाग था. अगर वह इंदिरा गांधी की हत्या की खबर सुनकर शरद यादव से पचास रूपए ले कर तुरंत रिपोर्ट करने के लिए कूच कर सकता था तो मुंबई में नवभारत टाइम्स को उसी की तर्ज़ में जनसत्ता के लिए उसे समुद्र में अंडरवर्ल्ड की मदद से फिंकवा सकता था. अगर वह अपनी एजेंसी चलाने के लिए चंद्रा स्वामी से पैसे ले सकता था तो इसे स्वीकारने का साहस भी रखता था. स्वीकारता ही था. नहीं अब तो एक से एक बिल्लियां है कि चूहा खाती रहती हैं और हज करती रहती हैं. कोई कुछ टोके-ओके तो गुरेरती भी रहती हैं. ऐसे दौर में आलोक का बिछड़ना सालता भी है, तोड़ता भी है.

    वह जनसत्ता में जिस दिन कायदे की खबर नहीं लिख पाता था, एक गाना गाने लगता था, ‘मुसाफिर हूं यारों, न घर है ना ठिकाना, बस चलते जाना है.’ कई बार वह मुसाफिर हूं यारों! गाकर ही यही लाइन बार-बार दुहरात रहता था. तो क्या वह ठिकाना पा गया? कि चलते चला गया. अपने उस पिया के पास! बताइए कि क्या विचित्र और दुर्भाग्यपूर्ण संयोग है कि प्रभाष जोशी के जाने के बाद ही उस का कैंसर पता चलता है. और वह जाता भी है तो कैंसर को धत्‍ता बताते हुए हार्ट अटैक की नाव पर सवार हो कर? तो क्या उसके पिया प्रभाष जोशी वहां उसे मिस कर रहे थे? कबीर के पिया को गाते-गाते? एक बार वह झंडेवालान में मिला आज तक के दफ़्तर में. आलोक वहां तब बतौर कंसलटेंट था. तब वह जल्दी ही मुंबई से लौटा था. कौन बनेगा करोड़पति के संवाद लिख कर. अमिताभ बच्चन के लिए. बहुत उत्साहित था. कंप्यूटर जी लाक कर दिया जाए जैसे डायलाग उसने ही लिखे है, यह वह बार-बार बताता रहा. ठीक वैसे ही जब उसने अटलजी का लालकिले पर दिया गया भाषण भी लिखा था तब भी बहुत उत्साहित रहता था. खुद ही बोलता रहता था कि आतंकवाद और संवाद एक साथ नहीं चल सकता. और जैसे जोड़ता चलता था कि यह मैंने लिखा है.

    मैंने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में तब के जनसत्ता के कई लोगों को चरित्र बनाया है. आलोक तोमर भी है उसमें. अपने ही रंग में. एक मित्र ने उसको कई बार भड़काया कि देखो- तुमको ले कर क्या-क्या लिख दिया है. वह जब सुनते-सुनते आजिज आ गया. तो बोला, ‘तो गलत क्या लिखा है. मैं तब ऐसा भी था और हूं. तुम्हें कोई दिक्कत? फिर यह बात उसने फ़ोन कर के मुझे बताई. मैं चुप ही रहा. क्या कहता भला. जब वह खुद ही इस बारे में जवाब दे चुका था. बहुत लोग इस ज़िंदगी में मिले. बहुतों के साथ काम किया, बात किया, जीवन जिया. पर आलोक तोमर में जो साफगोई थी, जो पारदर्शिता थी वह दुर्लभ थी. जैसे कि हर आदमी में दस- बीस आदमी होते हैं, आलोक में भी थे. पर एक बात बिलकुल साफ थी कि उसके भीतर का भी कोई आदमी हिप्पोक्रेट नहीं था. आलोक तोमर पूरा का पूरा जैसा भीतर था, वैसा ही बाहर भी था. हिप्पोक्रेसी उसे दूर से भी छूती नहीं थी. पर क्या कीजिएगा अब वह नहीं है तो एक बात कहना चाहता हूं जो बहुत समय से मेरे मन में घुमड़ती रही है, एक बार आलोक तोमर से भी पी कर कह दी थी, वह चुप रह गया था. आदत के विपरीत. वह कुछ बोला नहीं था. हालांकि यह मौका नहीं है इस बात को दुहराने का. फिर भी आप लोगों से आज उस बात को दुहरा रहा हूं.

    आलोक तोमर को प्रभाष जोशी की तानाशाही ने मार डाला था. बहुत पहले. नहीं ऐसा गुनाह नहीं कर दिया था आलोक तोमर ने कि उसे जनसत्ता से निकाल दिया जाता. उसे माफ़ किया जा सकता था. पर क्या कीजिएगा प्रभाष जोशी की तानाशाही ने सिर्फ़ आलोक तोमर ही को नहीं कइयों को मारा. और मज़ा यह कि उन सभी मरे लोगों ने फिर भी प्रभाष जोशी को हमेशा सलाम किया. एकाध परमानंद पांडेय या अच्छे लाल प्रजापति या डा. चमन लाल आदि को छोड़ दें तो, जो आज भी उन्हें माफ़ नहीं करते. वैसे भी इस पर भी अब विचार करने का समय आ ही गया है कि प्रभाष जोशी के जनसत्ता स्कूल से निकले तमाम लोग अब कहां हैं? गुरूर तो हम को भी है कि हम जनसत्ता में थे. बहुतों को है. पर अब कहां हैं हम? सवाल यह भी है कि कोई एक उस शिखर पर भी क्यों नहीं पहुंचा, जहां प्रभाष्‍ा जोशी पहुंचे थे? या वह शिखर भी कोई एक क्यों नहीं छू पाया?

    रामकृष्‍ण परमहंस की तरह एक विवेकानंद क्यों नहीं तैयार कर पाए वह? बनवारी जी को तो प्रभाष जोशी एक समय सबसे ज़्यादा मानते थे. कई बार अपने से भी आगे रखते थे. बनवारी जी के आगे आलोक तोमर भी कुछ नहीं थे. सतीप्रथा के समर्थन में संपादकीय बनवारी जी ने ही लिखी थी, पर जब प्रहार शुरू हुए तो जोशी जी ने उसे खुद पर ओढ़ लिया. इस के पहले एक संपादकीय में संशोधन पर बनवारी रूठ कर इस्तीफ़ा दे बैठे थे. जोशी जी ने उन्हें फिर-फिर मनाया. वह सर्वोदयी बनवारी भी अब क्या कर रहे हैं? दरअसल बनवारी भी अंतत: जोशी जी के ही शिकार हुए. हरिशंकर व्यास क्या कर रहे हैं? जानते हैं आप? ये रजत शर्मा या राजीव शुक्ला भी उन के आगे दंद-फ़ंद में पानी भरें. यह लोग तो सिर्फ़ चैनलों वगैरह के मालिक हैं. पर हरिशंकर व्यास तो कई-कई खदानों के मालिक हैं. और हां, राजीव शुक्ला भी जनसत्ता में प्रभाष जोशी के साथ थे यह आज कितने लोग जानना चाहते हैं?

    अब देखिए न राम बहादुर राय सरीखे व्यक्ति को भी अपने को छुट्टा कहने पर विवश हो जाना पडा है. फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है. हां, एक बात और तब कही जाती थी कि जोशी जी इतना बिगाड़ देते थे अपने सहयोगियों को वह कहीं और के लायक नहीं रह जाते. पर आलोक तोमर? वह तो प्रभाष जोशी को अपना कुम्हार भी कहता था. उनका दुलरूआ भी था. पर जनसत्ता छोड़ने के बाद वह अपनी पुरानी शान और रफ़्तार नहीं पा सका. और कुढ़ता रहा. रिपोर्टिंग का शिखर छूने के बाद, मानक बनने के बावजूद इस पचास-इक्यावन साल की ज़िंदगी में आखिर के कोई पंद्रह साल संघर्ष में ही सरक गए. यह क्या है? इसी अर्थ में वह उन का एकलव्य था. लेकिन उसका अर्जुन एकलव्य से बड़ा था. इसीलिए बात ढंकी-छुपी रह गई. वह फिर उनका हनुमान हो गया. बात खत्म हो गई थी. लेकिन सचमुच कहां हुई थी? उसने क्या-क्या तो पापड़ बेले. यह बहुत कम लोग जानते हैं. अपने को बचाने के लिए, अपने लिखने को बचाने के लिए.

    एक बार मैंने उस से अपनी तकलीफ़ बयान करने के लिए मन्ना डे के गाए एक गीत का सहारा लिया और कहा कि, ‘लिखने की चाह ने कितना मुझे रूलाया है!’ तो वह मायूस हो गया. रूंआंसा हो गया. कहने लगा, ‘हम सबकी यही नियती है. क्या करोगे?’ और देखिए न कि वह कैंसर वार्ड से भी क्या-क्या तो लिख रहा था. दवाओं के दाम में बाजीगरी, उसके गोरखधंधे से ले कर कैंसर वार्ड की तकलीफ तक. सिगरेट कंपनियों और सरकार तक को हिदायतें देता हुआ. तब जब इस देश का एक प्रधानमंत्री अपने बाई-पास के लिए गणतंत्र की परेड छोड़ देता है. और देखिए कि आलोक तोमर नाम का एक पत्रकार डेथ बेड से भी खबरें और टिप्पणियां लिखता रहा. मुझे उस का वह पीस भुलाए नहीं भुलता जिसमें उस ने आईटीसी के चेयरमैन से एक बार कैंसर वार्ड घूमने की बात कही थी. साथ ही सरकार से भी गुहार लगाई थी कि सिगरेट से मिलने वाले टैक्स से एक हिस्सा कैंसर के मरीजों के लिए खर्च किया जाए. उसकी बात पर कौन कितना अमल करेगा यह हम सभी जानते हैं.

    हालांकि वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्‍ठा से आलोक की अच्छी दोस्ती रही है. तो भी कौन सुनेगा, किसको सुनाएं की स्थिति फिर भी है. लेकिन गौर करने की एक बात यह भी है कि कितने पत्रकार साथी आलोक से सीख लेकर अपनी सिगरेट कुछ कम या बंद करेंगे क्या? न सही सभी लोग आलोक को श्रद्धांजलि देने वाले, उसको पसंद करने वाले ही सही क्या इतना भी कर सकेंगे? मुश्किल लगता है. पर शायद गौर करें. आलोक से भी बहुतेरे लोगों ने कहा था. उसने गौर तो किया पर बहुत देर करके. उसे तो पिया से मिलने की जल्दी थी. पता नहीं क्यों मुझे तो लगता है कि वह अभी वहां से भी कोई स्टोरी फ़ाइल कर देगा कि देखो यहां कितनी अंधेर मची है. या कुछ और सही. सचमुच आप इसे पागलपन कहिए कि भावुकता इंतज़ार बना हुआ है. इसलिए भी कि आलोक तोमर जैसे लोग कभी नहीं मरते. मेरे लिए तो वह अब भी ज़िंदा है. लिखो यार जल्दी लिखो! कहने को बार-बार मन करता है.
    सरोकारनामा से साभार

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