क्या वास्तव में भयमुक्त हो रहा है उत्तर प्रदेश?

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जी.के.चक्रवर्ती

किसी भी राज्य की शासन सत्ता की बागडोर वहां की सरकार के हाथ होती है और उसे सँभालने में वह कितनी सक्षम है और जनता को कितनी सुसाशन एवं उनको सुरक्षा देने में और उनकी जान माल की सुरक्षा करने में कामयाब होती है यह तो उस राज्य के लोगों के मध्य रोज की घटने वाली घटनाओं पर नजर डालने मात्र से हो जाती है। एक राज्य की सरकार वहां की जनता की जान माल की सुरक्षा किस हद तक कर पाती है यह उसकी सबसे बड़ी कसौटी भी है।

उत्तर प्रदेश में सत्तासीन सरकार इस प्रजा धर्म को निभाने में कहाँ तक सफल हुई या नही शायद यह एक प्रसाशनिक व्यवस्था की आंकलन का विषय हो सकता है लेकिन मौजूदा सरकार के नोयडा में अभी चंद दिनों पहले हुई घटना के परिपेक्ष में कहें तो उत्तर प्रदेश में अभी कुछ ही महीनो पहले संपन्न हुए चुनाव में चुनावी प्रचार के दौरान राज्य के कानून व्यवस्था को चुनावी मुद्दा बनाया था, लेकिन हम मौजूदा समय की कानून व्यवस्था की बात करें तो खुद भारतीय जनता पार्टी के राज में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की क्या हाल है?

इस प्रश्न के उत्तर में उस समय तब देखने को मिली जब भाजपा के एक ग्राम प्रधान और एक नेता के निजी अंगरक्षक और ड्राइवर की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई और जब उनकी गाड़ी अनियंत्रित हो गई तो उसकी चपेट में एक किशोरी के आ जाने से उसकी भी मौत हो गई। हलाकि काफी विरोध के बाद और मंत्री के लापरवाह ड्राइवर को पोलिश ने अरेस्ट कर लिया लेकिन इस् तरह के घटनाओं से यही साबित होता है कि उत्तर प्रदेश में कानून का भय बदमाशों में नहीं रहा।

अधिकतर मामलों में बहानेबाजी और लीपापोती ही उसकी कार्यप्रणाली का हिस्सा होता है। अभी हाल ही हुए विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी अखिलेश यादव की सरकार पर अपराधों से निपटने में नकामियाबी के आरोप लगाती रही। विधान सभा चुनाव में भाजपा ने जब अपना चुनाव घोषणापत्र जारी किया था तो उसमें गुंडाराज से मुक्ति दिलाने का संकल्प का जिक्र सर्वोपरि था। ‘न गुंडा राज न भ्रष्टाचार जैसा भाजपा का प्रमुख नारा रहा। इसलिए उसने लगभग साल भर के अपने कार्य काल के दौरान एक लाख पचास हजार पुलिसकर्मियों की भर्ती करने से लेकर सौ नंबर डॉयल करने पर पंद्रह मिनट में मौका ए वारदात पर पुलिस दल पहुंचने, तीन महिलाओं के पुलिस बटालियन गठित करने और प्रत्येक जिले में तीन महिला पुलिस स्टेशन गठित करने जैसे वादे किये गये। इन सबों के अतिरिक्त 100 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने तथा एक हजार महिला अफसरों की विशेष जांच टीम गठित करने की भी बात कही गई थी। लेकिन वास्तिविकता यह है कि गांव हो या शहर प्रदेश में अपराध और अपराधियों की संख्या में इजाफा होने के साथ ही साथ चोरी, डकैती, हत्या और बलात्कार जैसे मामलों की घटनाओं में विराम नहीं लगा।

उत्तर प्रदेश में भाजपा को शासन सत्ता संभाले कोई दस महीनों का समय गुजर चुका हैं, लेकिन वह इतने वक्त में ही वह कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर नाकाम साबित होने लगी है जहाँ मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के ठीक एक हफ्ते बाद योगी आदित्यनाथ जी ने चेताया था कि बदमाश या तो सुधर जाएं या राज्य छोड़ कर चले जाएं। सभी थानों के औचक निरीक्षण और एक बड़ी संख्या में पुलिस अफसरों के तबादले करके शुरू- शुरू में योगी ने एक ऐसा माहौल बनाया था मानो कि कानून-व्यवस्था जैसे प्रशासनिक कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दिया जाने वाला है लेकिन वर्त्तमान समय में उनकी प्राथमिकताये बदली हुई दिखाई पड़ने लगी है।

पुलिस एवं प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त और जवाबदेही बनाने जैसी मुहिम की जगह पूजा पाठ औए दर्शनों में अधिक ध्यान देने जैसी बातों की खबरें समय पर आती रहती हैं। अब यहाँ यह प्रश्न उठना लाजमी है क्या वे इसी प्रकार उत्तर प्रदेश को भयमुक्त बनाने के अपने किये वादे को पूरा कर पायेंगे! क्या प्रदेश में इसी तरह के परिवर्तन लाने के लिए प्रदेश के लोगो ने उन्हें जीता कर प्रदेश के साशन सत्ता की वाग डोर उनके हाथों में सौपा था? इसका सही उत्तर तो आने वाला समय ही देगा।

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