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    Home»ब्लॉग»Hindi Diwas

    भारत की अंतरात्मा है हिंदी, इसे अंग्रेजी से मत ख़त्म करिये

    By September 12, 2018 Hindi Diwas 2 Comments3 Mins Read
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    Post Views: 622

    प्रस्तुति: जी क़े चक्रवर्ती

    राष्ट्रभाषा एक देश की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होने के साथ ही साथ वहां के जन मानस की अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। जिसे सम्पूर्ण राष्ट्र के मध्य भाषा के विभिन्न कार्यों के रूप में पढ़ने, लिखने एवं वार्तालाप जैसे मनोभावनाओं की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है।

    भाषा वह श्रोत है जिसमें राष्ट्र के समस्त कार्यो को सम्पन्न किया जाता है। राष्ट्र के सभी विशेष कर सरकारी सभी कामकाज के लिये हिंदी भाषा को एक स्वीकृत भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है। फिर भी आज वर्तमान समय में इसके प्रयोग करने को लेकर लोग तुच्छ भावनाओं का शिकार हैं। किसी भी देश में बोले जाने वाली भाषओं की संख्या एक से अनेक हो सकती है लेकिन वह भाषा जो सभी को मान्य होने के साथ ही साथ बोलने और समझने में भी सरल हो जो उस देश के सभी नागरिकों की धड़कती आत्मा होती है।

    राष्ट्र भाषा के मामले में हमारा देश बहुत उलझ हुआ होने से उस पर लिखना या बात करने को एक औसत दर्जे के प्रचारकों का काम समझा जाता है। आज वर्तमान समय मे अपनी राष्ट्र भाषा यानी कि हिंदी में लिखने एवं उसके प्रयोग करने को लेकर लोग हीन भावनाओं के शिकार होने के बजाय अपनी राष्ट्र भाषा के प्रयोग करने को लेकर लोगों को अपने आप को गर्वित अनुभव करना चाहिये।

    आज लोग भाषा पर बात करना अवांछित समझते हैं। भाषा किसी भी समाज के अभिव्यक्ति का आईना होता है जब कभी भी भाषा का प्रश्न आता है तो वह निश्चित रूप से मानवीय सरोकारों से जुड़ा हुआ होता है। विशेष कर हमारे भारत देश में, जहाँ साम्राज्यवादी भाषा जनता को जनतंत्र से अलग कर रही है।

    वहीं हिन्दी एवं अंग्रेजी भाषा आपस मे प्रतिस्पर्द्धाएं देशी भाषाओं के साथ ही राष्ट्रभाषा के द्वंद्व में परिवर्तित हो कर रह गई है। एक मानव को दूसरे मानव से जोड़ने वाली भाषा एक सूत्र के रूप में तलवार जैसे बना रह गई है। पराधीनता की भाषा स्वाधीनता के गर्व स्वरूप हो गई है। निश्चित रूप से इसके पीछे हमारे दास मन की भावनाओं की सक्रियता ही मूल रूप से जिम्मेदार है।

    भाषा के विषय में आज भी हमारी वही सोच एवं रवैया है जो जीवन के विषय में है। कोई भी मूल्य नष्ट होने से बचा है क्या कि जो भाषा एवं स्वाभिमान बचे रहें ? हमे ऐसा लगता है कि अब राजनीति, नौकरशाही, पूँजीवाद या साम्राज्यवाद को कोसना सब कुछ बेकार है, जब तक जनता स्वमं ही अपना हित-अनहित न देखेगी, तब तक इस देश मे कुछ भी नहीं बदलेगा पाएगा।

    इसलिए कोई भी समस्या हो, वह सीधे जनता को रूबरू या संबोधित होना चाहिए। देश की जनता को विभाजनकारी षड्यंत्रों के सुपुर्द करके हम भाषा के मध्य कोई संवेदन, कोई हार्दिकता या सदभाव पैदा नहीं कर सकते हैं।

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    2 Comments

    1. 토토사이트 on September 14, 2018 1:29 pm

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      Reply
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      Reply
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