जहां एक ओर सारी दुनिया इंतजार कर रही है कि हजारों लोगों की जान ले चुका तीन साल से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध और करीब डेढ़ साल से जारी इजरायल बनाम हमास जंग कब खत्म होती है ताकि इन जगहों पर बचे हुए लोग चैन और सुकून से जिंदगी गुजार सकें तो वहीं आईएसआईएस के आतंकवाद और पूर्व राष्ट्रपति बशर अल असद के दमनकारी शासन के कहर से छटपटाता रहा सीरिया अब फिर उसी ओर जा रहा है। सांस्कृतिक और जातीय विविधताओं वाले इस देश में अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न और जनसंहार काफी व्यापक हो चुका है।

असद के निर्वासन के बाद सत्ता में आए हयात तहरीर अल शाम (एचटीएस) के नेता अबू मोहम्मद अल जुलानी ने अपनी छवि एक आधुनिक और दूरदर्शी नेता की बनाई तो जरूर पर उनका शासन भी अब खूनी जातीय टकराव का ही हिस्सा बनता जा रहा है। उनके सुरक्षाबल भी इस समय सीरियाई तटों के गांवों के लोगों की हत्या करने तथा इलाकों पर कब्जे में जुटे हैं। लंबे समय से लोगों के पलायन का क्रम जारी है और लाखों सीरियाई अब तक विस्थापित हो चुके हैं।
उधर कुर्द और अलबाइट समुदाय जिनको लेकर क्षेत्र के तुर्की, इराक और ईरान जैसे देश भी हस्तक्षेप कर रहे हैं, एक अलग समस्या बनते जा रहे हैं। इन तमाम समुदायों और देशों के हितों का टकराव देश की सत्ता के भी उसी में उलझ जाने के कारण सीरिया में अब जातीय संघर्ष जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उससे वहां गृहयुद्ध पैदा होने के आसार बनते जा रहे हैं। मरने- मारने की यह जद्दोजहद उस स्थिति से भी कहीं ज्यादा गंभीर होगी जब असद की फौजें बरसों तक नागरिकों का बेहद क्रूरता से दमन करती रही थीं और बड़े पैमाने पर लूट, हत्या, अपहरण, अंग भंग एवं बलात्कार आम बात हो गए थे।
नए नेता जुलानी भले ही यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके अतीत को लेकर लोग आशंकित न रहें पर उनकी फौजों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यानी सीरिया एक ऐसी भयंकर अशांति की ओर बढ़ रहा है जिसमें उसे लंबे समय तक खूनी तबाही झेलनी पड़ सकती है।







