डॉ दिलीप अग्निहोत्री
इतिहास के पन्नों के आधार पर दीवार पर लगे चित्र की पैरिवी करना बेमानी है। इतिहास खलनायकों को भी जगह देता है। लाखों लोगों की मौत के गुनाहगार भी इसमें शामिल होते है, देश को विभाजित कराने वालों का भी जिक्र होता है। इन पन्नों पर उनकी फोटो भी रहती है। लेकिन दीवार पर उन्हीं की फोटो लगाई जाती है, जिनके प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव होता है। इतिहास में तो तैमूर और नादिरशाह की जिक्र होगा। वह इतिहास के अंग है। उनके काल्पनिक चित्र भी होते है । लेकिन इसका यह मतलब नहीं उन्हें दीवार पर भी सजा दिया जाय। दीवार पर इनकी फोटो कोई नहीं लगता। भारत में अभी तक कोई इनके नाम पर अपने बेटों के नाम नहीं रखता था। ऐसा करने वाले वाले नासमझ या शातिर होते है। बहुत संभव है कि ऐसे लोग अपनी हिन्दू पत्नी को इस नाम से कोई सन्देश देने की मंशा रखते हो। जिन्हें अपने बेटे का नाम तैमूर रखने में शुकुन मिलता है।लेकिन वह अपने तैमूर को इतिहास के तैमूर जैसा नहीं बनाना चाहेगे।संभव है ऐसे लोग अपनी औलादों का नाम नादिरशाह भी रखे। लेकिन सामाजिक दायित्व का भी एक तकाजा होता है। इतिहास में अनेक लोग ऐसे होते है, जिनकी दीवार पर तस्वीर और नामकरण दोनों से परहेज होना चाहिए। भारत की कोई संस्था जिन्ना की तस्वीर लगाए तो सवाल उठेंगे। खासतौर पर सरकारी सहायता से चलने वाले संस्थानों की जबाबदेही भी होनी चाहिए। अनेक सेकुलर नेताओं ने इसे व्यर्थ विवाद बताया। लेकिन उन्होंने फोटो हटाने की मांग करने वालों को ही गुनाहगार माना। फोटो के पक्ष में तकरीर करने वाले उनके निशाने पर नहीं थे। यदि ये फोटो हटाने पर राजी हो जाते तो, विवाद वही न समाप्त हो जाता। जिन्हें विवाद पैदा करने वाला बताया जा रहा है, उन्हें भी मौका नहीं मिलता। जिन्ना, इकबाल और सर सैय्यद अहमद खान तीनों को भारत में महिमा मंडित नहीं करना चाहिए। बेशक
जिन्ना और इकबाल प्रारंभ में स्वतंत्रता संग्राम में शरीक थे। जबकि सैयद अहमद खान उसी दौर में द्विराष्ट्र सिद्धांत की बुनियाद बना रहे थे।
अंग्रेजों का हाँथ उनके ऊपर था। वह अंग्रेजों की खुलकर पैरवी करते थे। बदले में ब्रिटिश उपाधि और पद से नवाजे जाते थे। उनके विचारों पर गौर करें तो साफ होगा कि जिन्ना ने इसी से प्रेरणा ली। बाद में जिन्ना भी वही शब्द दोहराने लगे थे। यह विचार था कि -हिंदू और मुसलमान एक ही सिंहासन पर बराबर के अधिकार से नहीं बैठ सकते। जब तक एक कौम दूसरे को जीत न ले तब तक देश में कभी शांति स्थापित नहीं हो सकती। मुस्लिम आबादी हिंदुओं से कम हैं और किंतु उन्हें कमजोर नहीं समझा जाए। वे अपने दम पर मुकाम पाने में सक्षम हैं। सात सौ वर्षों तक हमने जी पर शासन किया, अब उनके शासन में नहीं रह सकते।
पाकिस्तान की आयुधशाला कहा जाता था। उन्नीस सौ चालीस के बाद मुस्लिम लीग ने अपने राजनैतिक सिध्दांतों के प्रसार के लिए इसे अनुकूल संस्थान के रूप में इस्तेमाल किया गया।जाहिर है कि मुस्लिम लीग में शामिल होने के बाद जिन्ना की भी यही बोली हो गई थी। यह सही है कि सय्यद अहमद और जिन्ना दोनों अब दुनिया में नहीं है। लेकिन भारत इनसे प्रेरणा नहीं ले सकता। उनके इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता। इन्होंने नफरत को हवा दी थी । जिन्ना की सीधी कार्रवाई काले अध्याय के रूप में दर्ज रहेगी। उनके इस आह्वान ने भारी रक्तपात कराया था। ऐसे व्यक्ति की फोटो भारत की किसी दीवार पर नहीं होनी चाहिए। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि यहां जिन्ना की तस्वीर उन्नीस सौ अड़तीस से लगी है।
बॉम्बे हाईकोर्ट और साबरमती आश्रम समेत कई और जगहों पर भी जिन्ना की तस्वीर लगी है।अब तक किसी को इन तस्वीरों से कोई परेशानी नहीं । कुलपति का यह तर्क स्वीकार्य नहीं है। किसी गलती पर जब भी ध्यान जाए , उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। इस आधार पर कोई गलती जारी नहीं रह सकती। साबरमती आश्रम की फोटो का मात्र ऐतिहासिक सन्दर्भ है। वहाँ महात्मा गांधी के साथ कार्य कर चुके नेताओं की प्रदर्शनी जैसी है।यदि मुम्बई हाई कोर्ट में फोटो है , तो न्यायपालिका को उसके औचित्य पर विचार करना चाहिए। एएमयू के लिए जिन्ना नहीं राजा महेंद्र प्रताप महत्वपूर्ण है। जिन्होंने जमीन देकर इस संस्थान की स्थापना को सुगम बनाया। राजा महेंद्र प्रताप सिंह के प्रपौत्र राजा गरुणध्वज सिंह, उन्होंने कहा कि जिन्ना ने साजिश करके भारत का विभाजन किया। ऐसे व्यक्ति की तस्वीर सरकारी संस्थान में लगना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। राजा महेंद्र प्रताप सिंह की तस्वीर लेकर पहुंचे गरुणध्वज ने कहा कि जिन्ना की तस्वीर हटाकर वहां यह तस्वीर लगाई जानी चाहिए।
यह भी समझना होगा कि जिन्ना तो अपने जीवन के आखरी दिनों में उसी मुल्क में उपेक्षित हो गए थे, जिसकी स्थापना के लिए उन्होंने डायरेक्ट एक्शन की हिंसा का सहारा लिया था। वह गवर्नर जनरल थे । लेकिन प्रधानमंत्री लियाकत अली ने उन्हें तवज्जो देना बंद कर दिया था। कहा तो यह भी जाता है कि आखरी दिनों में उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा मुहैया नहीं कराई गई थी। भारत से उनकी बहन फातिमा उनके साथ गई थी। लेकिन उनकी मौत भी सन्दिग्ध स्थिति में हुई थी।
उन्हीं जिन्ना की तस्वीर के प्रति भारत के किसी भी संस्थान का आग्रह अजीब लगता है। फोटो हटाकर तत्काल इस विवाद को समाप्त कर देना चाहिए। जिन मुसलमानों को पाकिस्तान जाना था, वह बटवारे के समय चले गए। ये बात अलग है कि वह आज तक मोहाजिर ही बने हुए है। जो मुसलमान यहां रहे उन्होंने भारत को अपना माना । यहां की विविधता से उनका लगाव था। सामाजिक एकता की यह भावना मजबूत रहनी चाहिए। जिन्ना जैसे लोगों का नाम, उनकी फोटो, फिर फोटो के लिए विवाद सभी अनुचित है। इनका इतिहास के पृष्ठ में रहना ही मुनासिब है।







