अन्नदाताओं की सुधि

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जी क़े चक्रवर्ती
देश मे सरकारे आती हैं और अपना कार्यकाल पूरा कर चली जाती है। यह सिलसिला देश के आजादी काल से चला आ रहा है। किसानों के आर्थिक हालातों एवं उनकी समस्यों पर पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शात्री के अलावा आज तक उनके जैसा सोचने-विचारने वाला अभी तक कोई भी नही हुआ। किसान अपने अनाजों के समर्थन मूल्य में बृद्धि करने से लेकर खाद-पानी एवं बीज जैसे अनेक तरह के माँगों को लेकर देश समय समय पर अनेक राज्यों में धरना प्रदर्शन करते रहे लेकिन आज तक देश के सबसे निम्न आय वाले लोगों में उनकी गिनती होती चली आ रही है। किसानों की समस्यों को हल करने एवं उनको उनके उत्पादनो के समर्थन मूल्यों को बढ़ाने और उनकी समस्यों पर ध्यान देने की चिंता देश मे होने वाले चुनावों के नजदीक आने पर सभी पार्टियों को दिखाने लगती है और चुनाव समाप्त होते ही उनकी सुधि लेने वाले लोग एकदम से गायब हो जाते इस तरह से हमारे देश के किसानों को लगातार एक लम्बे अर्से से वेबकूफ बनते चले आ रहे हैं।
देश मे एक समय ऐसा भी था, जब सरकारें फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में थोड़ी बहुत वृद्धि कर उसे बहुत बड़ी बृद्धि के रूप में और किसानों के हक में लिए गए फैसले की संज्ञा देने लगती थी। लेकिन वर्तमान समय मे देश के किसानों एवं खेती की दयनीय अवस्था को देखते हुए ऐसा फैसला लिया जाना अत्यंत आवश्यक हो था। समय की पुकार एवं आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले इस फैसले के साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि केवल फसलों की खरीद पर लाभकारी मूल्य देने भर से ही खेती की दशा-दिशा में सुधार नहीं होने वाला है।
खेती को आधुनिक एवं उसकी उन्न्ती के लिए अभी भी बहुत कुछ किये जाने की आवश्यकता है। इस क्रम में यह सुनिश्चित किया जाना बहुत आवश्यक हो गया है कि किसान वर्तमान समय मे अत्याधुनिक ढंग से खेती करेंने में सक्षम हो, साथ ही साथ यह भी ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है कि खाद्यान्नों के साथ-साथ फल-सब्जियों के भी भंडारण और उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुगमता से पहुंचाने की भी कोई पुख्ता व्यवस्था किया जाना चाहिए। किसानों के कृषि उपज की खरीद-बिक्री की समुचित व्यवस्था किये जाने की भी जरूरतों के  है तभी वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा गया है उसको हासिल करने में हमे कामयाब हो सकेंगे।
एक लंबे अर्से के बाद आखिरकार केंद्र सरकार को देश के किसानों से किये गये वादे का ध्यान आ ही गया। इसके मध्य केंद्र सरकार ने खरीफ की फसलों के बढ़े हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा की है। किसानों को उनके फसलों के समर्थन मूल्य में बृद्धि करने का वादा बजट में किया गया था, इसलिए इसका विशेष रूप से किसानों द्वारा प्रतीक्षा किया जा रहा था कि खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य कब घोषित किये जाते भी हैं या नही? किसानों द्वारा इसकी प्रतीक्षा बड़े कौतुहल और जिज्ञासा के साथ हो रही थी कि सरकार की ओर से किये जाने वाली घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तव में लागत से डेढ़ गुना होंगी भी या नहीं? केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा इस बात का उल्लेख किया गया कि खरीफ की फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से डेढ़ गुना ही बैठता हैं।
क्योंकि सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना किये जाने से पहले खेती के सभी खर्चों को जोड़कर किसानों के परिवार द्वारा किये गए श्रम के मूल्य का आंकलन करने के पश्यचत कुल लागत में पचास प्रतिशत लाभांश को भी जोड़े जाने से इस फैसले पर किसी भी तरह के विवाद की उत्पत्ति होने की संभावन बहुत ही नगण्य है, लेकिन फिर भी जैसा कि विपक्षियों का वास्ता केवल विरोध जताने से ही होता है लेकिन सबसे अधिक महत्व इसका है कि किसान संतोष प्रकट करते भी हैं या नहीं?
क्योंकि किसानों की संतुष्टि ही इस समर्थन मूल्य के सही होने का माप दंड तो है साथ ही उन्हें ऐसा लगना चाहिए कि खेती-किसानी अब मात्र घाटे का सौदा नहीं रह गया है कृषि उत्पादन जैसे कपास, धान, दलहन, तिलहन समेत खरीफ की चौदाह फसलों के दामों में डेढ़ गुना तक न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बृद्धि किये जाने से देश के किसान को अपने कृषि उत्पादनो को बेचने के बाद जो रुपये हाथ आएंगे उससे वे अपनी रोजमर्रा की आम जरूरतें पूरी कर अपना जीवन-यापन अच्छे ढंग कर सकेंगे। ऐसा होने पर ही उनके बीच खुशहाली का संचार तो होगा ही अपितु उनके गांवों की समृधि में भी बढ़ोत्तरी होगी।

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