डॉ दिलीप अग्निहोत्री
यह राहत का विषय है कि फिलहाल मुख्य न्यायधीश को हटाने के प्रस्ताव संबन्धी याचिका खारिज हुई। वैसे सूत्रधार कपिल सिब्बल अब क्या करेंगे, यह देखने के लिए इंतजार करना होगा। लेकिन इस प्रकरण के प्रत्येक कदम पर कांग्रेस की फजीहत हुई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश पर कदाचार और अक्षमता का कोई आरोप नहीं था। इन आरोपो के अलावा संविधान किसी जज को हटाने की इजाजत नहीं देता। ऐसे में उनको हटाने के कांग्रेसी अभियान में कोई दम नहीं था। लेकिन उसने इस पर भी राजनीति करने में संकोच नहीं किया।सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के दो संसादों की इस संबन्ध में अर्जी खारिज कर दी थी। इसी के साथ उस प्रस्ताव का भविष्य तय हो गया था। एक प्रकार से इसे निरर्थक मान लिया गया था। इसके पीछे की राजनीति साफ दिखाई दे रही थी। कांग्रेस की इस मुहिम के कर्णधार कपिल सिब्बल ने संविधान पीठ के मुद्दे पर याचिका वापस ली थी। उन्होंने संविधान पीठ को मामला सौपने पर सवाल उठाए थे। इस निर्णय की प्रति मांगी थी। मुख्य न्यायधीश से संबंधित मामला था। इस कारण उन्होंने जस्टिस ए के सीकरी को रोस्टर निर्धारित करने की शक्ति दी थी। याचिका संविधान पीठ को सौपने का आदेश जस्टिस सीकरी ने ही दिया था। वरिष्ठता क्रम में जस्टिस चेलमेश्वर ,रंजन गोगोई, मदन लोकुर, और कुरियन जोसेफ ऊपर थे। लेकिन ये लोग मुख्य न्यायधीश के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस कर चुके है। ऐसे में मुख्य न्यायधीश से संबंधित मसला इनको देना ठीक नहीं था। इसके बाद जस्टिस सीकरी का स्थान था। उनकी पीठ में चार अन्य न्यायधीश थे। जिनका स्थान वरिष्ठता क्रम में उनके बाद था। पीठ के गठन की सूचना समय से बेबसाइट में डाल दी गई थी।
कांग्रेस इसके प्रति गंभीर ही नही थी। यह बात अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल की दलील से भी जाहिर होती है। उनका कहना था कि याचिका की विचारणीयता शक के दायरे में है। क्योंकि इसे कांग्रेस के मात्र दो सांसदों ने चुनौती दी है। जबकि मूल प्रस्ताव पर चौसठ सांसदों प्रताप सिंह बाजबा और हर्षादर्य याग्निक ने हस्ताक्षर किए थे। इन दोनों कोई बहुत चर्चित या सक्रिय सांसद नहीं है। यह समझ से परे है कि कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका के लिए वरिष्ठ सांसदों को आगे क्यों नहीं किया। शायद दिग्गज जानते थे कि इस याचिका से फजीहत होगी । इसलिए उन्होंने बाजबा और याज्ञनिक जैसे लो प्रोफ़ाइल सांसदों को आगे किया। मात्र दो सांसदों की याचिका का एक अन्य सन्देश भी था। मतलब छह पार्टियों के बाँसठ सांसदों को राज्यसभा सभापति के निर्णय पर कोई आपत्ति नहीं है। सभापति वैकैया नायडू ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। उन्होंने खारिज करने के बीस कारणों का उल्लेख किया था।
कपिल सिब्बल ने उस प्रशासनिक आदेश को दिखाने की मांग की थी, जिसके तहत इस मामले में संविधान पीठ का गठन हुआ। सिब्बल प्रशासनिक आदेश की वैधता को ही चुनौती दे रहे थे। यह मसले को अधिक खींचने और विवादित बनाने का प्रयास हो सकता था। संविधान पीठ द्वारा आदेश दिखाने से इनकार के बाद सिब्बल द्वारा याचिका वापस लेने का अनुरोध किया। जिसे बेंच ने मानते हुए मामले को निरस्त कर दिया। इस बेंच में जस्टिस एके सीकरी, एसए बोबड़े, एनवी रमन्ना, अरुण मिश्रा और एके गोयल शामिल थे। ये सभी जज वरिष्ठता में नंबर छह से नंबर दस तक के शामिल हुए। लेकिन जब दो से पांच वली वरिष्ठता के नाम देखते है तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है। जो निर्णय हुआ, वह न्याय की मूल अवधारणा के अनुकूल था।
विशेष महत्व के मामलों पर संविधान पीठ द्वारा सुनवाई की जाती है। इस मसले पर जो पीठ बनी उसमें भी सभी वरिष्ठ और विद्वान न्यायधीश शामिल थे। वरिष्ठता क्रम में बदलाव उचित और अपरिहार्य लगता है।
कुछ भी हो न्यायपालिका का सम्मान होना चाहिए। राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित प्रस्ताव किसी न्यायधीश के संबन्ध में नहीं बनाने चाहिए। कांग्रेस के कतिपय विद्वान और चर्चित विधि विशेषज्ञ ने इस मसले के प्रत्येक स्तर पर फजीहत कराई है। यदि जस्टिस लोया प्रकरण से बात प्रारंभ करें तो इसमें भी कांग्रेस की फजीहत शुरू हुई थी। राहुल गांधी अनेक सांसद को लेकर राष्ट्रपति के यहां पहुंच गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुहिम को राजनीति से प्रेरित बताया था। बेहतर होता कि कांग्रेस इसके बाद मर्यादा का परिचय देती। लेकिन कुछ समय बाद उसने संभावनाओ के आधार पर मुख्य न्यायधीश को हटाने का प्रस्ताव बना लिया । इसमें भी फजीहत हुई । संविधान में प्रमाणित आरोप पर ही किसी जज को हटाने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। अगली फजीहत तब हुई जब कांग्रेस के कदम का अधिकांश दलों ने समर्थन नहीं किया। इसके बाद राज्यसभा के सभापति ने इसे संविधान वीरोधी मान कर खारिज कर दिया । इसके बाद कांग्रेस को चुप बैठ जाना चाहिए था। लेकिन फजीहत अभी बाकी थी । सुप्रीम कोर्ट ने भी याचिका खारिज कर दी। अब कांग्रेस हाईकमान को विचार करना होगा कि उसे इस व्यर्थ और आधारहीन कवायद से क्या हासिल हुआ।







