श्याम कुमार
लखनऊ में गोमतीनगर विस्तार क्षेत्र में स्थित मकदूमपुर पुलिस चौकी के पास दो सिपाहियों द्वारा एप्पल मोबाइल कंपनी के क्षेत्रीय विक्रय प्रबंधक विवेक तिवारी की गोली मारकर हत्या किए जाने की घटना ने जनमानस को हिलाकर रख दिया और इससे एक बार फिर पुलिस बल के मुंह पर कालिख लगी। लेकिन हमेशा की तरह कुछ दिनों बाद इस घटना को विस्मृत कर दिया जाएगा। वैसे भी, इस घटना में यदि बड़े आदमी की हत्या न हुई होती और उसके बजाय कोई गरीब आदमी मारा गया होता तो उस घटना की ओर न तो लोगों का ध्यान जाता और न ही अखबारों में इतनी चिल्लपों मचती।
अखबारों में उक्त घटना को विशेष महत्व मिलने का ही यह परिणाम हुआ कि संयुक्तराष्ट्र महासभा के 73वें सत्र में विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने हिन्दी में जो जबरदस्त भाषण किया, जिसमें पाकिस्तान की करतूतों का जमकर खुलासा किया, वह अतिमहत्वपूर्ण भाषण अखबारों में लखनऊ की घटना के सामने दब गया। सदैव की तरह इस बार भी पुलिस की कार्यशैली पर तरह-तरह से उंगलियां उठाई जा रही हैं तथा कुछ विपक्षी नेता अपनी आदत के अनुसार राजनीतिक रोटियां सेंकने पर अमादा हैं। पूर्व-मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तो ऐसा बयान दिया है, जिससे लगता है कि उनके शासनकाल में रामराज वाली स्थिति थी तथा इस प्रकार की घटनाएं नहीं होती थीं। एक सज्जन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी तो ‘गुंडा पार्टी’ के रूप में कुख्यात है तथा उस शासन में पुलिस गुंडे नेताओं की चाकरी करने पर मजबूर रहती थी।
पुलिस के विरुद्ध इस होहल्ले में इस बार भी उन कारणों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जो ऐसी घटनाओं के पीछे बुनियादी कारण के रूप में हुआ करते हैं। सुना जा रहा है कि गोमती नगर विस्तार में जो हत्या हुई है, उसके पीछे पुलिस द्वारा वसूली करने की हवस ही मुख्य कारण था। पुलिस नागरिकों की रक्षा करने की मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी करने के बजाय नित्य तरह-तरह से ‘मुर्गे’ ढूंढ़ा करती है, ताकि उनसे वसूली कर अपनी जेब गरम कर सके। उन सिपाहियों ने जब कार में युवा जोड़ा बैठे देखा तो उन्हें लगा कि उन्हें वसूली के लिए अच्छा मौका मिल गया है। यह भी बताया जा रहा है कि वहां पुलिस नियमित रूप से बैठकर वाहन सवारों या अन्य लोगों से किसी न किसी बहाने वसूली किया करती है। यही कारण है कि जब पुलिस विभाग ‘हेलमेट अभियान’ चलाता है तो पुलिसजनों की बांछें खिल जाती हैं और उन्हें अपना बैंकबैलेंस बढ़ाने का मौका मिल जाता है। इसीलिए अनेक अवकाशप्राप्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी यह मत व्यक्त किया है कि ऐसे प्रयास होने चाहिए कि पुलिस को उन कार्यों से दूर रखा जाय, जहां वसूली करने की गुंजाइश हो।

सुनने में यह सुझाव बड़ा अच्छा प्रतीत होता है, लेकिन व्यावहारिक नहीं है। थानों की पुलिस की आय के अनगिनत स्रोत होते हैं। कितने स्रोत तो ऐसे होते हैं, जिनमें ‘मछली कब पानी पी जाती है’ कहावत की तरह यह पता ही नहीं लगाया जा सकता कि पुलिस ने कब अपनी जेब गरम कर ली। लखनऊ में ही नाका एवं अमीनाबाद ऐसे थाने हैं, जिनके बारे में मशहूर है कि वहां नित्य लाखों रुपये की वसूली होती है। यह भी चर्चित है कि पुलिस विभाग में होनेवाली वसूली में थाने के निचले वर्ग से लेकर पुलिस विभाग के बहुत ऊंचे वर्ग तक वसूली की धनराशि वितरित होती है। एक अवकाशप्राप्त ईमानदार वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने एक बार मुझे बताया था कि पुलिस विभाग में आम पुलिसजनों के लिए एक पुलिस कल्याण कोष होता है, जिससे आम पुलिसजनों का शायद ही कभी कोई कल्याण होता है तथा उस कोष का धन लोगों की जेबों में चला जाया करता है। इलाहाबाद में अनेक वर्ष पूर्व एक यातायात पुलिसकर्मी मेरे पास आया करता था, जिसने एक बार मुझे बताया था कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने यातायात विभाग से हर महीने उन्हें मिलनेवाली दस हजार की धनराशि को दुगुना कर दिया है।
थाने तो अवैध वसूली के गढ़ बने हुए हैं। इलाहाबाद में एक युवक मेरे पास आया करता था, जिसकी भरती पुलिस विभाग में सिपाही के रूप में हो गई थी। भरती के कुछ महीने बाद जब वह मुझसे मिलने आया तो मैंने पुलिस विभाग में उसके अनुभव पूछे, जिस पर उसने बताया कि वह नित्य कम से कम सौ रुपये की वसूली अवश्य कर लिया करता है। जब मैंने उससे थाने के दरोगा व निरीक्षक की आमदनी के बारे में पूछा तो उसने बताया था कि उनकी आमदनी को अथाह माना जा सकता है। कुछ दशक पूर्व इलाहाबाद में ही कोतवाली के बगल में स्थित एक परिचित दुकानदार ने मुझे बताया था कि वहां जो प्रभारी निरीक्षक तैनात होकर आता है, उस समय उसके पास मात्र एक सूटकेस होता है, किन्तु जब वह वहां से अन्यत्र तैनाती पर विदा होता है तो उसका सामान कई ट्रकों में भरकर जाता है। सड़कों पर पुलिस की वसूली बहुत आम है।

चौराहों पर कभी भी वह दृश्य देखा जा सकता है। अब तो पुलिस स्वयं वसूली करने के बजाय अपने गुर्गे रखती है, जिनके जरिए वसूली की जाती है। इससे फंसने का डर नहीं रहता है। इसी प्रकार शहरों में सड़कों पर अतिक्रमणों को पुलिस का भरपूर संरक्षण रहता है। फेरीवाले अपनी दुकान लगाकर लगभग पूरी सड़क घेरे रहते हैं, जो नियमित रूप से पुलिस को निर्धारित ‘सुविधा शुल्क’ देकर पटरियां और सड़क ‘अपने बाप की’ मान लेतेे हैं। यही कारण है कि जब कभी अतिक्रमण हटाने का अभियान चलता है तो अतिक्रमणकारियों को पहले से सूचना मिल जाती है और वे उस समय अपनी दुकान हटाकर कुछ देर बाद वहां फिर अड्डा जमा लेते हैं।
वास्तविकता यह है कि पुलिस विभाग को हमारे नेताओं ने बरबाद किया है। उन्होंने पुलिस को अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का माध्यम बना डाला है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के समय में यह स्थिति विशेष रूप से बनी। सपा के शासन में अपराधी तत्वों को प्रबल सरकारी संरक्षण प्राप्त हो जाता है। कई वर्ष पूर्व एक ईमानदार पुलिस उपाधीक्षक ने मुझसे बातचीत में टिप्पणी की थी कि तमाम अपराधी प्रवृत्ति के जिन नेताओं को गनर मुहैया करा दिए गए हैं, कुछ वर्षों बाद उसका परिणाम यह होगा कि वैसे नेताओं से जुड़े वे सुरक्षाकर्मी अपनेआप एक ऐसे प्रशिक्षित एवं संगठित अपराधी गिरोह का रूप ले लेंगे, जो भविष्य की ईमानदार सरकारों एवं जनता के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द सिद्ध होंगे। सपा सरकार के समय लखनऊ में मेरे पड़ोस में एक माफिया को दो-दो गनर मिले हुए थे, जिनके बारे में चर्चा थी कि वे उस माफिया के आपराधिक कृत्यों में सहयोग करते हैं।
पुलिस के अमानवीय कृत्यों पर नजर डालते समय इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि स्वयं पुलिस के साथ भी अमानवीय व्यवहार होता है। पुलिसजनों को चौबीसो घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है तथा परिवार से दूर कष्टप्रद वातावरण में रहना पड़ता है। उन्हें साप्ताहिक छुट्टी तक नहीं दी जाती है। काम की तुलना में वेतन बहुत कम मिलता है। ऐसा महसूस होता है, जैसे सरकार ने कम वेतन देकर उन्हें इस बात की खुली छूट दे दी है कि वे अवैध वसूली को अपनी आय का जरिया बना लें। यदि पुलिस की कमजोरियों के बुनियादी कारणों पर ध्यान नहीं दिया गया तो बड़े आदमियों के पुलिस का शिकार बनने पर तो हंगामा मचेगा, किन्तु बड़ी संख्या में नित्य जो शरीफ व गरीब लोग पुलिस के शिकार बना करते हैं, उनके साथ होने वाली घटनाएं हमेशा की तरह ‘तूती की आवाज’ बनकर रह जाया करेंगी।








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