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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    किसानों का भला कैसे हो?

    ShagunBy ShagunSeptember 25, 2020 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    साभार: google
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    Post Views: 550

    अपना नजरिया : जी के चक्रवर्ती

    केंद्र सरकार की ओर अभी कृषि सुधार बिल कहे जा रहे तीन विधेयकों में से दो पिछले रविवार के दिन यानीकि 20 सितम्बर 2020 को राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित हो गये है। अब इस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अंतिम मुहर लगनी बाकी है उसके बाद देश मे यह क़ानून बन जाएगा। जबकि, इस बिल के समर्थन में स्वयं सरकार के अंदर ही सभी लोग एकमत नही हैं।

    आज देश मे कृषि बिल पर जो बवाल हो रहे हैं, उसमें विशेष कर एग्रीकल्चर मार्केटिंग प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी अर्थात एपीएमसी (APMC) पर अधिक जोर दिया जा रहा है। इसे लोग एपीएमसी (APMC) के नाम से जानते हैं। किसान भाइयों के मन में इस तरह का प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह एपीएमसी क्या है? इस में क्या खूबियां या खामियां है? इसमें बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी? इत्यादि जैसे प्रश्नों के उत्तर में यदि हम इस सम्बंध में बात करते हैं तो देश के किसानों को उनके उपज की लाभकारी व सही मूल्य का समर्थन नहीं मिल पाना इसकी प्रमुख वजह है।

    हालाँकि यह समस्या केवल मौजूदा समय की समस्या नहीं है वरन देश के आजादी काल के उपरान्त से ही इस दिशा में अनेकों प्रयास जरूर किये गये हैं लेकिन देश मे वर्ष 1970 के दशकों में (APMC) रेगुलेशन ऐक्ट (APMC Act) के अनुसार कृषि की विपणन (Marketing) समितियां बनी थीं। इसे संक्षिप्त रूप में एपीएमसी (APMC) कहते है। इस समिति का उद्देश्य बाजार की अनिश्चितताओं से किसानों को उभरना होता है।

    वैसे सही कहा जाय तो हमारे देश के किसानों की हालत किसी से भी छिपी नहीं है। भारत के किसान बेहद मुश्किल परिस्थितियों में अपने खेतों में अनाज उत्पादन करते हैं और फिर उनको उन्हीं के उत्पाद का सही मूल्य भी नहीं मिल पाता है।

    एपीएमसी कानून (APMC Act) लाने का मुख्य उद्देश्य कृषि मंडियों में एक ऐसी व्यवस्था लाने और किसान भाइयों की बिचौलियों के हाथों होने वाले शोषणों से निजात दिलाने की दिशा में उठाया गया एक सराहनीय कदम हैं। देश के अधिकांश राज्यों में इससे पूर्व अपने-अपने एपीएमसी कानून हुआ करता था। मौजूदा समय तक एपीएमसी व्यवस्था समय एवं जरूरत के अनुसार विकसित ही नहीं हो पायी थी। इन मंडियों के ढांचे में बढ़ोतरी तो हुई लेकिन यह अतिरिक्त कृषि वस्तुओं की खरीद और बिक्री के मध्य में तालमेल नहीं बिठा पाई। जिसके कारण इसके द्वारा किसानों का शोषण ही होता रहा।

    देश मे इस कानून के लागू हो जाने के बाद कृषि क्षेत्र में निजी व्यवसायिक लोग ज़रूर उतरेंगे लेकिन हम ऐसा क्यों नहीं करते कि एमएसपी को एक क़ानूनी जामा पहना दिया जाए जिससे निजी कंपनियां जो मौजूदा समय मे कह रही हैं कि वो किसानों को एमएसपी से ज़्यादा दाम देंगे, वहीं सरकार, के अर्थशास्त्री भी यही कह रहे हैं तो फिर इसे क़ानूनी रूप क्यों नहीं दिया जाता कि इतने से कम दामों में किसी भी फ़सल की ख़रीदारी नहीं कि जायेगी। इस तरह से देश के किसान भाई एक बार पुनः अपने आपको ठगा हुआ महसूस करने के स्थान पर गर्वित होंगे।

    Shagun

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