जी क़े चक्रवर्ती
हमारे देश के लोगों विशेष कर गावँ के लोगों के लिए खुशहाली की खेती, को बढ़ावा देने के लिए उसकी गुणवत्ता को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है। इसके लिए देश में जैविक खेती पर होने वाला व्यय खेती की लागत बहुत ही न्यूनतम दर पर होने वाली खेती से उत्पादित वस्तुओं में गुणवत्ता एवं पौष्टिकता की मात्रा अधिक होती है, जबकि रासायनिक खादों के प्रयोग से पैदा होने वाले अन्न में कई तरह के नुकसान होते ही है साथ ही साथ पौष्टिकता एवं स्वाद दोनों ही निम्न होते हैं।
देश के बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश से लेकर पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती एवं बागवानी पर ही निर्भर है। कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए इन प्रदेशों के किसान विभिन्न रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों की बड़ी मात्रा में प्रयोग कर रहे हैं। देश के जिम्मेदारों को यह देखने की फुरसत ही नही कि क्या जिन जमीन में अन्न उगाया जाता है या उगाये जा रहे हैं ऐसी जमीन को वास्तव में खादों या कीटनाशकों की जरूरत है भी या नहीं है। इन रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से जमींन, जल, एवं उपजाऊ जमीन को बहुत नुकसान पहुंच रहा है, शायद इससे होने वाले क्षति की भरपाई करने में हमे बहुत लंबा समय लग जाए, इसके अलावा मनुष्यों में ऐसे अन्न को खाने से कई तरह की बीमारिया उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है। इन रसायनिक खादों के प्रयोगों से पैदा होने वाले अन्न के सेवन से कैन्सर, दस्त, उल्टियां अपच जैसे कई तरह के जानलेवा बीमारियां पैदा होने का खतरा बना रहता है।
एक समय ऐसा था जब संपूर्ण राष्ट्र में हरित क्रांति लाने के लिए इन रासायनिक खादों का बहुत बढ़ चढ़ कर प्रयोग किया गया था, हां यह बात जरूर है कि इसकी वजह से शुरुआती दौर में अच्छे परिणाम अवश्य निकल कर आए एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। लेकिन इन रासायनिकों का प्रयोग धीरे-धीरे बिना सोचे-समझे इनका प्रयोग बढ़ते चले जाने से खेती एवं पर्यावरण दोनों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। खादों के अत्याधिक इस्तेमाल से भूमि की मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक जैविक तत्व समाप्त होने से उत्पादन कम होने लगा, जिससे वर्त्तमान समय में किसानों की लागत बढ़ी गई और उसके स्थान पर मुनाफा भी कम होने लगा। इसलिए खेती वर्तमान समय में एक घाटे का सौदा साबित हो रहे हैं।
देश के कृषि वैज्ञानिक लगातार चेतावनी देते रहे कि यदि कृषि में रासायनिक खादों का इस्तेमाल इसी तरह से अंधाधुंध होता रहा तो भविष्य में देश की उपजाऊ जमीन का बड़ा भाग बंजर भूमि में तब्दील हो जायेगी। किसानों से जुड़े इन वास्तविक अहम मुद्दों पर सरकार की गंभीर चिंता नहीं झलकती है, यदि सरकार द्वारा शीघ्र शून्य लागत वाली प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन नहीं दिया गया तो निश्चित रूप से देश की किसानों की उपजाऊ खेत एक दिन हो न हो ऊसर में तब्दील होते देर नहीं लगेगी ऐसी स्थिति में किसानो को आत्महत्या से उन्हें कोई भी नहीं रोक पायेगा।
मौजूदा सरकार की नीतियों से यह लगता है कि देश में खेती व किसानों को बचाने के लिए आगामी पांच साल में राज्य में पूरी तरह शून्य लागत पर खेती का लक्ष्य रखा गया है, इस लक्ष्य को छूने के लिए सरकार द्वारा कैसे प्रयास कियेे जायेंगे यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन इसके लिए प्रदेश सरकार ने 25 करोड़ रुपये की शून्य लागत वाली प्राकृतिक जैविक खेती योजना की शुरुआत की है, जो किसानों को बीमारी देने के स्थान पर अन्न देने वाला बनाएगी। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षित किया जाना बेहद आवश्यक है। इस विधि से खेती करने का लाभ यह है कि किसान रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों पर होने वाले भारी-भरकम खर्चों की बचत करने के साथ ही साथ इससे पैदा होने वाला अनाज व अन्य उत्पाद सेहत के लिए नुकसान दायक नहीं होंगे और उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता व पौष्टिकता अधिक होगी। जबकि रासायनिक खादों से उत्पादित वस्तुओं के कई तरह के नुकसानों को झेलने उठाना पड़ेगा। स्वस्थ भारत के निर्माण के लिए किसानों को इस सार्थक पहल में भागीदार अवश्य बनना चाहिए।







