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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    यह कैसे कह सकते है कि लोकतंत्र खतरे में है?

    By January 19, 2018Updated:January 19, 2018 Hot issue No Comments8 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    भारत के सबसे बड़े लोकतंत्र की सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठ जजो ने जिस तरह से मुख्य न्यायाधीश के प्रति अपना मतभेद उजागर किया हैं उससे संपूर्ण देश आज हैरान है कि ऐसा आजतक कभी भी इससे पहले नहीं हुआ एवं कोई भी व्यक्ति ऐसा होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। इन चारों न्यायाधीशों के मुख्य न्यायाधीश से उसी समय से मतभेद चल रहे थे जब लखनऊ के एक मेडिकल कॉलेज से जुड़े मामले पर सुनवाई होनी थी। जैसा की इन चारों न्यायाधीशों के अनुसार मुख्य न्यायाधीश ने उक्त मामले के साथ-साथ कुछ अन्य कथित अहम मामलों को अपनी मनपसंद बेंच को सुनवाई के लिए भेजे थे। यह मालूम नहीं, कि यह आरोप कितने सच हैैं, लेकिन ऐसे मामलों की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए कि यह अधिकार मुख्य न्यायाधीश को है कि वह किन ममलों को किस बेंच के पास भेजें या न भेजें ऐसा अधिकार उन्हें प्राप्त होने के बावजूद यह भी सही है कि केस आवंटन की एक स्थापित परंपरा भी है जो यह कहती है कि एक प्रकृति के मामले को ऐसी बेंच को भेजे जाएं जो उस तरह के मामलों का निपटारा करती रही हों। इन चारों जजों के मौजूदा प्रेस वार्ता से देश में चारो तरफ हलचल पैदा हो जाने से यह बात स्पष्ट हुयी कि यह चारों न्यायाधीश जिन कुछ बड़े मामलों की सुनवाई खुद करना चाहते थे वे उनके पास नहीं भेजे गए। ऐसे एक मामलों में मेडिकल कॉलेज वाला मामला भी था।


    मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रेस वार्ता करने वाले न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय की प्रशासनिक वर्त्तमान कार्यशैली को भले ही लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला जैसा बताया गया हो, लेकिन सत्य तो यही है कि केवल सुप्रीम कोर्ट ही भारतीय लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वल्कि तथ्य यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज जिस कोलेजियम व्यवस्था के तहत नियुक्त होते हैैं उसमें सरकार अथवा अन्य किसी भी संस्था की कोई भूमिका नहीं होती है तो ऐसे में हम यह कैसे कह सकते है कि लोकतंत्र खतरे में है?

    प्रेस वार्ता में जिस एक अन्य मामले का जिक्र हुआ उसमें जज लोया की मौत का मामला भी शामिल था। जज लोया की आकस्मिक मौत दिसंबर 2014 को हुई थी। वह गुजरात के शोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी आरोपी थे। चूंकि उनके साथी न्यायाधीशों की मौजूदगी में उनका उपचार एवं उनके शव का पोस्टमार्टम किये जाने से किसी भी प्रकार की कोई संदेह व्यक्त नहीं किये गए और नही किसी तरह की बातें उठी वहीं पुरे तीन साल बाद गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अचानक यह प्रचारित किया जाने लगा कि जज लोया की मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी। हालांकि उनके बेटे ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स में कहा था कि ऐसा कुछ भी नहीं था, लेकिन बावजूद इसके मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इस मसले को उछालता रहा। इन्हीं खबरों के आधार पर 9 जनवरी 0218 को मुम्बई उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई। वहां उसकी सुनवाई प्रारंभ हो चुक थीं फिर भी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई। शुक्रवार को जब सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका पर सुनवाई चल ही रही थी तो न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद रहीं एक वकील सबसे यह अनुरोध कर रही थीं कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को न सुने। आखिरकार यह कैसी पहेली है?

    चार जजों द्वारा इस तरह की प्रेस वार्ता बुलाये जाने से देश हतप्रद रह गया इससे कहीं न कहीं सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा एवं शाख़ को बहुत बड़े आघात पहुंचाने जैसा काम किया है। इन चारों न्यायाधीशों द्वारा न केवल मुख्य न्यायाधीश पर अविश्वास जताया गया, इसके अतिरिक्त यह भी कहा कि इस अदालत में जैसे काम हो रहा है वह लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला है। यदि कहा जाये तो इस तरह के टिप्पणियों से एक प्रकार से मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध खुली बगावत करने जैसे संदेश जनता के बीच जाता है कि सर्वोच्च न्यायालय में कोई बड़ी गड़बड़ी है। मात्र ऐसा संदेश ही देश के सर्वोच्च संस्था की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने वाला है। इस संस्था को होने वाले इस तरह की क्षति की भरपाई कर पाना सहज नहीं है, क्योंकि 12 जनवरी को इस प्रकरण में को जो कुछ भी हुआ वह प्रत्येक तरह से अकल्पनीय हदप्रद करने वाली बात है।

    मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध प्रेस वार्ता करने वाले न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय की प्रशासनिक वर्त्तमान कार्यशैली को भले ही लोकतंत्र को खतरे में डालने वाला जैसा बताया गया हो, लेकिन सत्य तो यही है कि केवल सुप्रीम कोर्ट ही भारतीय लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करता। वल्कि तथ्य यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज जिस कोलेजियम व्यवस्था के तहत नियुक्त होते हैैं उसमें सरकार अथवा अन्य किसी भी संस्था की कोई भूमिका नहीं होती है तो ऐसे में हम यह कैसे कह सकते है कि लोकतंत्र खतरे में है? साथ ही यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि जिन चार न्यायाधीशों द्वारा प्रेस वार्ता की वे स्वमं इसी कोलेजियम का हिस्सा हैैं। किसी भी संस्था के सदस्यों के आपस में मतभेदों का होना कोई नयी एवं अनोखी बात नहीं है लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि आपसी मतभेदों को सार्वजनिक होने जाने दिया जाये वल्कि येसा होने से भी बचाया जाएं। यह तो समझना बहुत ही कठिन बात है कि इन चारों न्यायाधीशों की मुख्य न्यायाधीश से अपने मतभेद को अंदरूनी स्तर पर क्यों नहीं सुलझा लिया गया?


    यह हास्यास्पद बात है कि जो न्यायाधीशें अदालती मामलों का मीडिया ट्रायल विल्कुल भी पसंद नहीं करते उन्होंने अपने आंतरिक मामले को मीडिया ट्रायल के हवाले कियूं कर दिया? यह बात कितना उचित है कि इन चारों न्यायाधीशों द्वारा पहले प्रेस वार्ता बुलवा कर उनके समक्ष मुख्य न्यायाधीश पर अविश्वास जताया जाता है एवं फिर यह भी उम्मीद करें कि उनकी ओर से उठाए गए मसलों का समाधान भी हो जायेगा?

    यह हास्यास्पद बात है कि जो न्यायाधीशें अदालती मामलों का मीडिया ट्रायल विल्कुल भी पसंद नहीं करते उन्होंने अपने आंतरिक मामले को मीडिया ट्रायल के हवाले कियूं कर दिया? यह बात कितना उचित है कि इन चारों न्यायाधीशों द्वारा पहले प्रेस वार्ता बुलवा कर उनके समक्ष मुख्य न्यायाधीश पर अविश्वास जताया जाता है एवं फिर यह भी उम्मीद करें कि उनकी ओर से उठाए गए मसलों का समाधान भी हो जायेगा? आखिर उनके मध्य पैदा हुए मामलों का समाधान कौन करेगा? क्या सरकार, राजनीतिक दल या जनता? जबकि जजों की नियुक्तियों में किसी भी अन्य की भागीदारी नहीं होती है तो उनके मध्य पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने में बाहरी लोग भागीदार कैसे हो सकते हैैं? जबकि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एक विशिष्ट व्यक्तित्व के व्यक्ति होते हैं। उनपर यह विश्वास किया जाता है कि वे नीर-क्षीर एवं रिपक्व ढंग से मामलों में दूध का दूध पानी का पानी कर उचित न्याय एवं अपने सद्भावना पूर्ण आचरण से जनता को उचित न्याय देकर एक उदाहरण प्रतुत करेंगे।

    इन चारों न्यायाधीशों के लिए शायद इस सवाल का जवाब देना भी मुश्किल होगा कि अगर कुछ कथित बड़े मामले यदि उनके पास नहीं आए तो क्या इससे उनकी प्रतिष्ठा में किसी प्रकार के आघात लग कंर कोई कमी हो गई? क्या इन न्यायाधीशों के इस तरह के कार्यों परोक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट के अन्य 20 न्यायाधीशों की निष्ठा और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े करने जैसा काम नहीं किया? दुर्भाग्यपूर्ण केवल यह नहीं कि चार न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के आंतरिक मसले को सड़क पर ले आए, बल्कि यह भी है कि उनकी प्रेस वार्ता के ठीक बाद भाकपा नेता डी राजा जस्टिस चेलमेश्वर से मुलाकात करने उनके आवास पर चले गये। आखिरकर उन्हें ऐसा करने की क्या जरूरत थी? क्या दोनों के बीच हुई यह मुलाकात जनता के मन में संशय पैदा करने वाली नहीं है?

    भारत देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा सर्वोपरि समझी जाती है। देश का हर आमो, खास व्यक्ति को उससे यही उम्मीद रहती है कि किसी भी मसले पर जब कहीं से भी कोई न्याय नहीं मिलेगी तो सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अवश्य उस मामले में समाधान निकाला जाएगा। लेकिन यह वाकया ऐसे वक्त में हुआ है जब देश में अनेको ऐसे मामले अभी भी सर्वोच्च न्यायलय के अधीन हैं। संघात्मक शासन के अंतर्गत सर्वोच्च, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायालय का होना आवश्यक बताया जाता है। भारत भी एक संघीय राज्य है और इसलिए यहाँ भी एक संघीय न्यायालय का प्रावधान है, जिसे हम सर्वोच्च न्यायालय कहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय संविधान का व्याख्याता, अपील का अंतिम न्यायालय, नागरिकों के मूल अधिकारों का रक्षक होने के साथ ही साथ राष्ट्रपति का परामर्शदाता और देश के संविधान का संरक्षक भी है।

    भारतीय न्यायव्यवस्था के शीर्ष में सर्वोच्च न्यायालय हैं। सर्वोच्च न्यायलय 26 जनवरी, 1950 को देश में अस्तित्व में आया एवं देश के गणतंत्र बनने के दो दिनों के बाद 28 जनवरी, 1950 को काम करना शुरु किया तब से आज वर्त्तमान समय तक 68 वर्षों तक के इतिहास में जो कुछ भी हुआ है उसमे यह कहना कठिन है कि सुप्रीम कोर्ट को अभी भी इसी नजर से देखा जाएगा या नहीं?

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

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