मुग़ल लघुचित्र शैली के भारतीय चित्रकारों की बात करें तो प्रमुखता से दो नाम सामने आते हैं। प्राप्त विवरणों के अनुसार मीर सैय्यद अली और अब्द अल समद के द्वारा अकबर के दरबार में जिन स्थानीय कलाकारों को प्रशिक्षित किया गया था उनमें दशवंत और बसावन का जिक्र मिलता है। वैसे दशवंत के जन्मस्थान और तिथि की कोई जानकारी नहीं है, केवल इतना पता चलता है कि इसकी मृत्यु 1584 में हुयी थी। यह भी जिक्र आता है कि वह पालकी ढोनेवाली जाति के थे। लेकिन अकबर के शाही चित्रालय में उस दौर में कार्यरत सैकड़ों कलाकारों में से दशवंत और बसावन का जिक्र होना इनके महत्व को दर्शाता है। अमरीका के ओहियो स्थित क्लीवलैंड संग्रहालय में संग्रहित तुतीनामा के एक चित्र को इसी कलाकार का बनाया हुआ माना जाता है। कहा जाता है कि मानसिक असुंतलन की स्थिति में इस कलाकार ने 1584 में आत्महत्या कर ली थी।
उपलब्ध जानकारियों के अनुसार यह एकलौता ऐसा चित्र है जिसे पूरी तरह से दशवंत द्वारा बनाया गया माना जाता है। क्योंकि अन्य उपलब्ध चित्रों के बारे में बताया जाता है कि इसमें रेखांकन का काम दशवंत द्वारा किया गया और उसमें रंग भरने का काम उसके किसी सहायक के द्वारा किया गया है। यह भी विवरण मिलता है कि महाभारत के अनुवाद वाले एक ग्रन्थ में चित्रों के निर्माण में इसने अग्रणी भूमिका निभाई। यहाँ उनके सहयोगी के तौर पर केशो नामक कलाकार का जिक्र है । इसके एक चित्र में अर्जुन द्वारा मछली की आंख पर निशाना लगाए जाने की घटना का चित्रण है।
इसी क्रम में यह बात भी आती है कि पटना के खुदाबख्स लाइब्रेरी में संग्रहित ‘तारिख-ए-खानदान-ए-तैमूरिया’ में तैमूर के बचपन को दर्शाता जो चित्र है उसे बनाने में दशवंत के सहयोगी के तौर पर जगजीवन कलां नामक चित्रकार का नाम भी आता है। इस जगजीवन कलां के बारे में जो कुछ और जानकारी मिलती है वह यह कि इनके बड़े भाई का नाम केशव कलां था । इन दोनों भाईयों के द्वारा अकबरनामा के जो चित्र बनाये गए हैं उनमें रेखांकन का काम केशव द्वारा और रंग भरने का काम जगजीवन के द्वारा किया जाता रहा था। लेकिन यह जानकारी नहीं मिल पा रही है कि ये दोनों कलाकार कहाँ के रहनेवाले थे। कुछ ऐसे संकेत अवश्य मिलते हैं कि मुग़लों के आगमन से पहले भी यहाँ स्थानीय चित्रकारों के द्वारा लघुचित्रण किया जाता रहा था। हम जानते हैं कि पुस्तकों व ग्रंथों के लिए चित्रण की परंपरा के प्रमाण के तौर पर हमारे पास पालकालीन चित्र शैली की जानकारी है, जिसका केंद्र मगध था। ऐसे में यह शोध का विषय है कि 14 वीं-15 वीं सदी आते आते क्या यह परंपरा किसी रूप में बची थी या नहीं। अलबत्ता कुछ जगहों पर जगजीवन का सम्बन्ध पटना से बताया गया है लेकिन इसकी पुष्टि का कोई आधार आज हमारे पास उपलब्ध नहीं है।
बसावनका ज़िक्र आता है तो ऐसे विवरण मिलते हैं कि 1580-1600 तक मुगल शैली के इस भारतीय चित्रकार की कला सर्वाधिक फली- फूली। उनके समकालीनों द्वारा उन्हें रंगों की गहरी समझ वाला कलाकार माना जाता रहा। साथ ही मानवीय आकृतियों के निरूपण में भी उनकी दक्षता अनुकरणीय थी। कतिपय इन्हीं कारणों से मुगल सम्राट अकबर की आधिकारिक जीवनी अकबरनामा के रचना की जिम्मेदारी उन्हें दी गयी। विदित हो कि अकबरनामा को इस दौर की भारतीय कला का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेज समझा जाता है। जहाँ तक इस कलाकार के जन्मस्थान या अन्य विवरणों की बात है तो किसी तरह की विशेष जानकारी आज उपलब्ध नहीं है। कुछ इतिहासकारों द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि इनका जन्म वर्तमान उत्तरप्रदेश के किसी पिछड़े इलाके में हुआ था और उनकी जाती अहीर थी। फ़ारसी चित्रकार अब्द अल-समद ने उन्हें अकबर की चित्रशाला के लिए चुना था और पिता के बाद बेटे मनोहर दास ने यह जिम्मेदारी निभाई।
आज उनके बनाये हुए 100 से अधिक चित्र दुनिया भर के विभिन्न संग्रहों में उपलब्ध हैं। उनके नाम का उल्लेख सबसे पहले पहल ‘तूतीनामा’ के सचित्र संस्करण में मिलता है। इन चित्रों में रंग भरने का काम बसावन के द्वारा तथा रेखांकन का काम दशवंत व अन्य के द्वारा किया गया माना जाता है। जिन पांडुलिपियों की रचना में बसावन का योगदान समझा जाता है वे हैं – राजमनामा, अकबर-नामा, दरब-नामा, जमी के बहारिस्तान और तैमूर-नामा के लिए चित्रण। भारतीय कला में पश्चिमी कला प्रभावों को लाने का श्रेय भी इसी कलाकार को दिया जाता है। बसावन पश्चिमी तकनीकों में रुचि रखने वाले पहले भारतीय कलाकारों में से एक थे, जिन्होंने जेसन के मिशनरियों द्वारा अकबर के दरबार में लाई गई यूरोपीय पेंटिंग से प्रेरणा ग्रहण की थी।
उनकी कृतियों में प्रकाश और छाया के मजबूत विरोधाभासों का बड़ी ही खूबसूरती से प्रयोग हमें देखने को मिलता है। इसके बावजूद पश्चिमी प्रभाव उनकी रचनाओं में कभी भी प्रमुख नहीं रहा। अकबर महान के इतिहासकार अबू अल-फ़ादल अल्लामी ने बसावन को अपने दौर का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार माना है। वैसे देखा जाय तो यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम अपने दौर के सर्वाधिक महत्वपूर्ण इन दो कलाकारों के बारे में कुछ भी विशेष नहीं जानते है। उनकी कृतियों से उनके बारे में जितनी जानकारी मिल पाती है इसके अलावा कुछ जानने का कोई जरिया हम निकल नहीं पाए हैं। – ब्लॉग से साभार







