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    जीतते-जीतते हार गए हम

    ShagunBy ShagunMay 11, 2025 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    उपेंद्र राय

    भारत और पाकिस्तान के बीच घोषित संघर्ष विराम ने न केवल क्षेत्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया है, बल्कि इसे लेकर विशेषज्ञों और विश्लेषकों के बीच गहन चर्चा भी शुरू कर दी है। विशेष रूप से, ज्योतिष राजनीति और सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी की टिप्पणी कि “भारत ने जीत के मुंह से हार छीन ली” ने इस निर्णय के रणनीतिक और सामरिक निहितार्थों पर सवाल उठाए हैं। इस लेख में, हम इस संघर्ष विराम के विभिन्न पहलुओं, इसके कारणों, परिणामों, और विशेषज्ञों के विश्लेषण का गहराई से मूल्यांकन करेंगे, साथ ही चेलानी की टिप्पणी के संदर्भ को समझने की कोशिश करेंगे।

    मालूम हो कि पहलगाम आतंकी हमले (अप्रैल 2025) के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था। इस हमले ने भारत को आक्रामक सैन्य कार्रवाई के लिए प्रेरित किया, जिसके तहत ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए गए। भारतीय सेना ने न केवल सामरिक रूप से महत्वपूर्ण जीत हासिल की, बल्कि पाकिस्तानी रक्षा प्रणाली की कमजोरियों को भी उजागर किया।

    पाकिस्तान, जिसे इस दौरान भारी नुकसान उठाना पड़ा, ने अंततः संघर्ष विराम की पहल की। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने पुष्टि की कि दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत के बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि, यह अचानक कदम भारत के लिए एक रणनीतिक जीत के बाद अप्रत्याशित माना जा रहा है।

    ब्रह्मा चेलानी का विश्लेषण: “जीत के मुंह से हार”

    ब्रह्मा चेलानी ने इस संघर्ष विराम को भारत की रणनीतिक विफलता के रूप में देखा। उनके अनुसार, भारत ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता का पूरा उपयोग नहीं किया और ऐतिहासिक गलतियों को दोहराते हुए युद्ध की स्थिति से बचने के लिए जल्दबाजी में संघर्ष विराम स्वीकार कर लिया। उनके विश्लेषण के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं:

    सैन्य दबाव का अपूर्ण उपयोग: चेलानी का मानना है कि भारत के पास स्पष्ट सैन्य बढ़त थी। ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को रक्षात्मक स्थिति में धकेल दिया था, और उसकी वायुसेना, ड्रोन, और अन्य रक्षा प्रणालियां भारत के सामने बेअसर साबित हो रही थीं। ऐसे में, भारत को इस स्थिति का लाभ उठाकर पाकिस्तान पर दीर्घकालिक रणनीतिक दबाव बनाए रखना चाहिए था।

    ऐतिहासिक गलतियों की पुनरावृत्ति: चेलानी ने 1965 और 1971 के युद्धों का हवाला दिया, जहां भारत ने युद्धविराम स्वीकार कर अपनी जीत को पूर्ण रूप से भुनाने का अवसर गंवा दिया। उदाहरण के लिए, 1965 में ताशकंद समझौते के बाद भारत ने लाहौर तक की प्रगति के बावजूद क्षेत्रीय लाभ छोड़ दिए। चेलानी का मानना है कि 2025 का यह संघर्ष विराम भी उसी पैटर्न का हिस्सा है।

    पाकिस्तान की झूठी जीत की घोषणा: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संघर्ष विराम को अपनी जीत के रूप में प्रचारित किया, जिसे चेलानी ने भारत की कूटनीतिक कमजोरी के रूप में देखा। इससे पाकिस्तान को नैतिक और मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली, जो भारत के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

    हालांकि चेलानी की आलोचना तीखी है, कुछ विशेषज्ञों और रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि संघर्ष विराम का निर्णय भारत के व्यापक रणनीतिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा रहे हैं:

    क्षेत्रीय स्थिरता: रक्षा विशेषज्ञ संजीव श्रीवास्तव ने संघर्ष विराम को एक सकारात्मक कदम बताया, जो दोनों देशों के बीच युद्ध जैसी स्थिति को टालने में मददगार साबित हुआ। पहलगाम हमले के बाद बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा दिया था, और संघर्ष विराम ने इसे कम करने में योगदान दिया।

    आर्थिक और मानवीय लागत: लंबे समय तक सैन्य संघर्ष भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए आर्थिक और मानवीय रूप से महंगा साबित हो सकता था। भारत, जो वैश्विक मंच पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में उभर रहा है, ने शायद इस लागत को कम करने के लिए संघर्ष विराम को प्राथमिकता दी।

    अंतरराष्ट्रीय दबाव: संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक शक्तियों का दबाव भी इस निर्णय में महत्वपूर्ण हो सकता है। 1965 और 1971 के युद्धों में भी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप ने युद्धविराम को मजबूर किया था, और 2025 में भी ऐसा ही हुआ हो सकता है।

    पाकिस्तान की कमजोर स्थिति: रिटायर्ड मेजर जनरल हर्ष कक्कर ने कहा कि पाकिस्तान ने युद्धविराम की मांग इसलिए की क्योंकि वह भारत के हमलों का सामना करने में असमर्थ था। यह अपने आप में भारत की सैन्य श्रेष्ठता का प्रमाण है।

    ज्योतिषीय दृष्टिकोण : दिलचस्प रूप से, कुछ ज्योतिषीय विश्लेषण भी इस संघर्ष विराम को लेकर सामने आए हैं। देवघर के ज्योतिषाचार्य पंडित नंदकिशोर मुद्गल ने दावा किया कि मई 2025 में ग्रह-नक्षत्र युद्ध की स्थिति बना रहे थे, लेकिन यह युद्ध बड़े स्तर पर नहीं होगा। उनके अनुसार, पाकिस्तान को इस संघर्ष से आर्थिक और सामरिक नुकसान होगा, जबकि भारत की स्थिति मजबूत रहेगी। हालांकि, यह दृष्टिकोण वैज्ञानिक आधार से परे है और इसे केवल सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

    संघर्ष विराम के दीर्घकालिक निहितार्थ :

    1. पाकिस्तान के लिए: संघर्ष विराम ने पाकिस्तान को तात्कालिक राहत दी है, लेकिन इसने उसकी सैन्य और कूटनीतिक कमजोरियों को उजागर किया है। आर्थिक संकट और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच, पाकिस्तान के लिए अपनी स्थिति मजबूत करना चुनौतीपूर्ण होगा।
    2. भारत के लिए: भारत ने अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन तो किया, लेकिन चेलानी जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवसर पूर्ण विजय में तब्दील नहीं हुआ। भविष्य में, भारत को ऐसी रणनीतियों की जरूरत होगी जो सैन्य और कूटनीतिक दोनों मोर्चों पर निर्णायक हों।
    3. क्षेत्रीय गतिशीलता: यह संघर्ष विराम भारत-पाकिस्तान संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित करेगा। चीन जैसे तीसरे पक्ष की भूमिका, जो ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का परोक्ष समर्थन करता रहा है, भी महत्वपूर्ण होगी।

    ब्रह्मा चेलानी की टिप्पणी “भारत ने जीत के मुंह से हार छीन ली” एक गहरे रणनीतिक सवाल को उठाती है: क्या भारत ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता का पूरा लाभ उठाया, या यह एक समझदारी भरा कूटनीतिक कदम था? जहां चेलानी इसे ऐतिहासिक गलती मानते हैं, वहीं अन्य विशेषज्ञ इसे क्षेत्रीय स्थिरता और दीर्घकालिक रणनीति के लिए जरूरी कदम बताते हैं। सत्य शायद इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच कहीं निहित है। भारत ने निश्चित रूप से अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाया, लेकिन भविष्य में उसे ऐसी रणनीतियों की जरूरत होगी जो सैन्य जीत को कूटनीतिक और सामरिक लाभ में बदल सकें।

    Shagun

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