पाकिस्तान इन दिनों एक जटिल भू-राजनीतिक और आंतरिक संकट के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका द्वारा इज़राइल के समर्थन में ईरान पर किए गए हमले और पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की हालिया अमेरिकी यात्रा ने देश में एक तीखी बहस को जन्म दिया है। इस यात्रा के दौरान मुनीर की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अभूतपूर्व मुलाकात और ट्रंप के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की पैरवी ने पाकिस्तानी जनता के बीच असंतोष को और गहरा कर दिया है। यह स्थिति न केवल मुनीर की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रही है, बल्कि पाकिस्तान की सैन्य और नागरिक नेतृत्व के बीच पहले से मौजूद खाई को और चौड़ा कर रही है।
मुनीर की अमेरिकी यात्रा: एक विवादास्पद कदम
18 जून 2025 को व्हाइट हाउस में ट्रंप द्वारा आयोजित एक विशेष लंच में जनरल असीम मुनीर का स्वागत किया गया, जो किसी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा किसी पाकिस्तानी सेना प्रमुख के लिए पहली बार किया गया ऐसा आयोजन था। इस मुलाकात में भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने में कथित भूमिका के लिए ट्रंप को नोबेल पुरस्कार के लिए नामित करने की बात सामने आई। हालांकि, इस मुलाकात का एक और महत्वपूर्ण पहलू था—इज़राइल-ईरान संघर्ष पर चर्चा, जिसमें पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और ईरान के साथ इसके संबंधों को रणनीतिक रूप से देखा गया। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा, “पाकिस्तान ईरान को बहुत अच्छी तरह जानता है, शायद सबसे ज्यादा,” जिसने इस मुलाकात के पीछे अमेरिका की रणनीतिक मंशा को उजागर किया।
इस मुलाकात ने पाकिस्तान में एक तीव्र प्रतिक्रिया को जन्म दिया। मुनीर की यात्रा के दौरान वाशिंगटन में इमरान खान के समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें उन्हें “हत्यारा” और “तानाशाह” जैसे नारों से निशाना बनाया गया। सोशल मीडिया पर भी मुनीर की आलोचना की गई, जहां उनकी तस्वीरों पर “मास मर्डरर” जैसे संदेशों के साथ डिजिटल बिलबोर्ड प्रदर्शित किए गए। यह जनता का गुस्सा केवल सैन्य नेतृत्व की कथित “गद्दारी” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की विदेश नीति और क्षेत्रीय संरेखण पर गहरे सवाल उठा रहा है।
ईरान पर अमेरिकी हमले और पाकिस्तान की दुविधा
21 जून 2025 को अमेरिका द्वारा ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकानों पर किए गए हमले ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया। इस हमले की पाकिस्तान ने कड़ी निंदा की, जिसमें विदेश मंत्री इशाक दार ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और ईरान को आत्मरक्षा का अधिकार है। हालांकि, यह बयान मुनीर की अमेरिकी यात्रा के ठीक बाद आया, जिसने जनता के बीच यह धारणा बनाई कि पाकिस्तानी सेना और सरकार की नीतियां एक-दूसरे के विरोध में हैं।
पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा और ऐतिहासिक सांस्कृतिक-धार्मिक संबंध हैं। पाकिस्तानी जनता में ईरान के प्रति सहानुभूति और इज़राइल के प्रति विरोध का भाव प्रबल है। इस संदर्भ में, इज़राइल के एक कथित बयान—“अगला नंबर पाकिस्तान का है”—ने जनता के बीच डर और आक्रोश को और भड़का दिया है। हालांकि इस बयान की प्रामाणिकता पर सवाल हैं, लेकिन यह सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने मुनीर के प्रति नाराजगी को और बढ़ाया।
जनता का असंतोष और सैन्य नेतृत्व पर दबाव
पाकिस्तान में सेना का हमेशा से राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है, लेकिन मुनीर की अमेरिकी यात्रा ने इस प्रभाव को चुनौती दी है। जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि सेना प्रमुख अपनी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और अमेरिका के साथ गठजोड़ को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि देश की जनता ईरान के साथ एकजुटता चाहती है। इस विरोधाभास ने मुनीर की छवि को नुकसान पहुंचाया है, खासकर उन लोगों के बीच जो पहले से ही सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप से असंतुष्ट हैं।
इमरान खान की पार्टी, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई), ने इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मुनीर के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया है। वाशिंगटन में उनके समर्थकों ने न केवल विरोध प्रदर्शन किए, बल्कि डिजिटल वैन और बिलबोर्ड के माध्यम से मुनीर को “इस्लामाबाद का कसाई” जैसे नामों से पुकारा। यह प्रदर्शन केवल व्यक्तिगत हमले तक सीमित नहीं हैं; वे पाकिस्तान की जनता में बढ़ते असंतोष और सैन्य नेतृत्व के प्रति अविश्वास को दर्शाते हैं।
आने वाला समय चुनौतियां और संकट से भरा
पाकिस्तान के लिए यह समय अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक ओर, देश आर्थिक संकट और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा है; दूसरी ओर, क्षेत्रीय भू-राजनीति में उसकी स्थिति जटिल हो रही है। मुनीर की अमेरिकी यात्रा और ईरान पर अमेरिकी हमले ने पाकिस्तान को एक कठिन संतुलनकारी भूमिका में डाल दिया है। यदि पाकिस्तान अमेरिका के साथ अपने संबंधों को और गहरा करता है, तो यह ईरान के साथ उसके संबंधों को जोखिम में डाल सकता है, जो जनता के बीच और असंतोष को बढ़ाएगा। वहीं, यदि वह ईरान का समर्थन करता है, तो अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग की संभावनाएं कमजोर पड़ सकती हैं।
इसके अलावा, इज़राइल का कथित बयान कि “पाकिस्तान अगला नंबर है” ने देश में सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। यह बयान, भले ही अनौपचारिक हो, पाकिस्तानी जनता में यह धारणा पैदा कर रहा है कि मुनीर की नीतियां देश को एक खतरनाक स्थिति की ओर ले जा रही हैं। यह स्थिति न केवल मुनीर के लिए, बल्कि पूरे सैन्य प्रतिष्ठान के लिए एक बड़ी चुनौती है।
जनरल असीम मुनीर की अमेरिकी यात्रा और ट्रंप के साथ उनकी मुलाकात ने पाकिस्तान में एक गहरे विभाजन को उजागर किया है। एक ओर सैन्य नेतृत्व अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जनता ईरान के साथ एकजुटता और इज़राइल-अमेरिका विरोधी भावनाओं से प्रेरित है। यह विरोधाभास मुनीर के लिए व्यक्तिगत और पाकिस्तानी सेना के लिए संस्थागत स्तर पर मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
आने वाले समय में, मुनीर को न केवल जनता के असंतोष को संबोधित करना होगा, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के बीच एक नाजुक संतुलन भी बनाना होगा। यदि वे ऐसा करने में विफल रहे, तो यह न केवल उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाएगा, बल्कि पाकिस्तान को एक गहरे आंतरिक और बाह्य संकट की ओर धकेल सकता है। इस संदर्भ में, पाकिस्तान की सरकार और सेना को जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुए एक ऐसी नीति अपनानी होगी जो देश के हितों को प्राथमिकता दे और क्षेत्रीय शांति को बढ़ावा दे।







