ममता की बढ़ती मुश्किलें

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पश्चिम बंगाल में चुनाव जैसे जैसे नजदीक आ रहें हैं भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की दरारें बढ़ती ही जा रही हैं अभी श्री राम वर्सेज अपमान का घूँट पीकर बैठी ममता बनर्जी ने फिर कहा सुभाष चंद्र बोस कि जयंती में जिस प्रकार मुझे बुलाकर अपमानित किया गया वह बर्दाश्त के काबिल नहीं है चुनाव इस अपमान का बदला लिया जायेगा।

उधर भारतीय जनता पार्टी राज्य में अपनी गतिविधियां बढ़ा रही है। पार्टी इस साल सत्ता पर काबिज होने की तैयारी में है। वहीं, भाजपा की गतिविधियों से तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खासी परेशान हैं। वोटों के समीकरणों के खाके खींचे और बढ़ाए जा रहे हैं।

दूसरी बड़ी बात तृणमूल से नेताओं का भाजपा की ओर जाने का क्रम भी है। इसी कड़ी में कभी ममता के खास रहे शुभेदु अधिकारी का नाम भी आता है। सोमवार को ममता ने शुभेंदु के गढ़ माने जाने वाले नंदीग्राम में बड़ी रैली की और इस बार वहीं से चुनाव लड़ने की घोषणा की। राज्य की राजनीति में एक और दिलचस्प तथ्य वोट बैंक की स्थिति भी है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अल्पसंख्यक वोट बैंक ममता से गहरे तक जुड़ा है और करीब तीस प्रतिशत है। यह वोट इस बार भी ममता के पाले में जाने की उम्मीद है। स्वाभाविक है कि इस स्थिति में भाजपा अपने हिंदू वोट बैंक को पुख्ता करने की कोशिशें करने में जुटी है।

भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के राज्य के दौरे बढ़ गए हैं। उनके साथ पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के भी दौरे चल रहे हैं। अल्पसंख्यक वोटों की बात आती है तो एआईएमआईएम अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी का नाम भी आता है जो राज्य में चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। करीब दो महीने पहले बिहार में चुनावों में वह पांच सीटें जीत चुके हैं। और अब बंगाल में भाग्य आजमाने की तैयारी में हैं। इसके अलावा वाम दलों और कांग्रेस में गठबंधन होने की भी खबर है।

इन सभी परिस्थितियों में चुनाव खासा दिलचस्प होता जा रहा है और दिन बीतने के साथ इन परिस्थितियों में बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं। यह देखने की बात होगी कि कौन सा दल कितना प्रभावी साबित होता है। राज्य के मतदाताओं पर ही यह निर्भर करेगा कि वे जीत का सेहरा किस दल के सिर पर बांधते हैं।

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