आज की सुबह रुला गई। संघर्ष ही जिन की कथा रही वह सुशील सिद्धार्थ आज सुबह-सुबह हम सब से विदा हो गए । संघर्ष का समुद्र उन्हें बहा ले गया । उन की ठिठोलियां, गलबहियां याद आ रही हैं। छोटी-छोटी नौकरियां , छोटे-छोटे दैनंदिन समझौते करते हुए सुशील अब थक रहे थे। दिल्ली उन्हें जैसे दूह रही थी। सुई लगा-लगा कर । वह व्यंग लिखते ही नहीं थे, जीते भी थे । एक अच्छे अध्येता, लेखक, कवि, वक्ता, व्यंग्यकार और एक अच्छे दोस्त का इस तरह जाना खल गया है । उम्र में हम से छोटे थे सुशील सिद्धार्थ, जाने की उम्र नहीं थी फिर भी चले गए । वह दिल्ली में रहते थे , पत्नी लखनऊ , बेटा अहमदाबाद। ज़िंदगी में उन की यह बेतरतीबी देख कर मैं अकसर उन से कहता था कि दिल्ली छोड़ दीजिए, लखनऊ लौट आइए। वह मुस्कुरा कर ज़िंदगी की दुश्वारियां गिनाते और कहते बस जल्दी ही आप के आदेश का पालन करता हूं बड़े भाई। लेकिन दिल्ली क्या वह तो दुनिया छोड़ गए । बड़े ठाट के साथ मुझे बड़े भाई कहने वाले सुशील की आब याद रह गई है। उन के शेर याद आते हैं ।
जाने किस बात पर हंसे थे हम
आज तक यह शहर परीशां है।
हाकिमे शहर कितनी नेमते लुटाता है
नींद छीन लेता है लोरियां सुनाता है।
एन जी ओ प्लास्टी के बाद भी हार्ट अटैक होना विचलित करता है । अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि !
दयानन्द पांडेय की वॉल से
व्यंग्य में भी कभी ‘खालीपन’ आ सकता है इस बारे में मैंने कभी सोचा ही नहीं था। मगर आज सोच रहा हूं। या कहूं खुद को ऐसा सोच पाने के लिए ‘मजबूर’ पा रहा हूं।
सुशील जी का यों अचानक चुप-चाप हमारे बीच से चले जाना यह खालीपन जितना हमें सता रहा है उससे कहीं ज्यादा इस खालीपन को मैं व्यंग्य में महसूस कर रहा हूं। मानो- व्यंग्य खुद ही कह रहा हो कि अब कौन मुझ पर इतने अधिकार के साथ व्यंग्य लिखेगा।
रह-रह कर याद आ रहा है मुझे उनका ‘समय सहारा’ में प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक स्तंभ ‘आईना’। तब कितने की देर उनसे उनके ‘आईने’ पर बातें होती थीं। लेकिन अब ‘आईना’ खाली है। उस आईने में सुशील जी के न होने की कमी मुझे बहुत खल रही है।
आप तो हमें ही ‘आईना’ दिखाकर चले गए सुशील जी।
जो हो पर मैं आपको ‘अलविदा’ कभी नहीं कहूंगा। आप हैं। कहीं नहीं गए हैं। आपका यह ‘मुस्कुराता चेहरा’ हमें आपके ‘आईने’ की याद हमेशा दिलाता रहेगा।
अंशुमाली रस्तोगी की वॉल से







