आशा शैली
एक समय था जब बाल साहित्यकार को हेय दृष्टि से देखा जाता था। उसे दोयम दर्जे का साहित्यकार समझा जाता था। बाल साहित्य को लेकर साहित्यकारों में इसी कारण अधिक उत्साह नहीं रहा पर इस मिथ को तोड़ने में बालसाहित्य के पितामह आदरणीय डॉ. राष्ट्रबंधु की प्रेरणा और प्रोत्साहन ने बड़ा काम किया। बहुत से नए-पुराने रचनाकार इस ओर अग्रसर हुए और विपुल मात्रा में बाल साहित्य भी सामने आया। डॉ. राष्ट्रबंधु के इस महानतम योगदान के कारण ही उन्हें बाल साहित्य का पुरोधा और बाल साहित्य के पितामह भी कहा गया। इस दिशा में चम्पक, बाल भारती आदि पत्रिकाओं के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता। इसी का परिणाम था कि हिमाचल में बहुत से साहित्यकार बाल साहित्य लेखन में आगे आये। बाल साहित्य में शोधकार्य भी हुए और साहित्य की श्रीवृद्धि हुई।
समय ने करवट ली, वे पत्रिकाएँ भी बाल साहित्य को स्थान देने लगीं जो पहले इस दिशा में मौन रहती थी। वर्तमान में बाल साहित्य को हेय दृष्टि से नहीं देखा जा रहा। वर्तमान में प्रत्येक रचनाकार प्रौढ़ लेखन के साथ ही बाल साहित्य को भी समय और प्राथमिकता दे रहा है। इसलिए वर्तमान समय में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य लिखा भी जा रहा है, परन्तु मीडिया का इस ओर ध्यान कतई नहीं है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि बाल साहित्य लेखन का उत्साह भी कम होता जा रहा है।
यह ठोस यथार्थ है कि समाज को सही दिशा देने में बाल साहित्य का विशेष योगदान रहता है। हम जो कुछ भी बाल्यकाल में पढ़-जान लेते हैं वह हमारे भीतर कहीं गहरे पैठ जाता है और बड़े होने के बाद भी वही सब हमारा आदर्श बना रहता है। इसीलिए एक सुदृढ़ और संस्कृत समाज की रचना के लिए बाल साहित्य की आवश्यकता सदा ही रहती है।
अधिकतर सुनने में आता है कि बच्चे पढ़ने में रुचि नहीं ले रहे। तो इसका कारण बच्चों को रुचिकर पुस्तकें उपलब्ध न होना है। बच्चों की रुचि पढ़ने में कभी कम नहीं होती, चाहे आप विज्ञान की कितनी भी दुहाई दें, जहाँ रंगीन पुस्तकें दिखाई दे जाएँ बच्चे वहाँ लपकते देखे गए हैं। यहाँ मुझे याद आ रहा है। मैंने कुछ मित्रों की कविताएँ लेकर ‘कहाँ से आए बंदर जी’ नाम से एक बाल पुस्तक प्रकाशित की थी। पुस्तक का हर पृष्ठ रंगीन है। मैं उसे लेकर बाल प्रहरी के कार्यक्रम में भीमताल गई। वहाँ पुस्तक प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। हमने वे पुस्तकें प्रदर्शनी में रख दीं। शाम तक एक भी पुस्तक नहीं बची थी। बच्चे बार-बार उस पुस्तक को खोज रहे थे। इससे यह तो सिद्ध हो जाता है कि बच्चों की रुचि पढ़ने में सदैव रहती है। अब यह हम पर निर्भर है कि हम उसे क्या दे रहे हैं। पर बात लिखने मात्र से समाप्त नहीं हो जाती। सबसे बड़ी समस्या तो प्रकाशन की होती है। कितना भी अच्छा लिखा हुआ यदि उसे इच्छुक सही पात्र तक नहीं पहुँचेगा तो उस लिखने का अर्थ क्या रह जाएगा?
हमारे लिखे हुए को उचित स्थान पर पहुँचाना ही प्रकाशन और प्रसार व्यवस्था अर्थात् मीडिया का काम होता है। समग्र साहित्य से अलग बाल साहित्य इस दशा में अभी भी पिछली पंक्ति में खड़ा है। लेखक अपना बहुमूल्य समय लगाकर कुछ लिख तो लेता है परन्तु उसे सही जगह तक पहुँचाएगा तो मीडिया अथवा प्रकाशन ही और वह मौन है।
बड़े-बड़े प्रकाशन बाजारवाद की चपेट में हैं और केवल उन्हीं लेखकों को छाप रहे हैं जिनके माध्यम से उन्हें थोक खरीद की सम्भावना नजर आती है। फिर वे बिकी हुई पुस्तकें चाहे अल्मारियों में बंद पड़ी रहें।
बड़े प्रकाशक अक्सर ही पुस्तक का मूल्य इतना अधिक रख देते हैं कि सुनकर ही पसीना आने लगे। प्रकाशन हालांकि कोई आसान काम भी नहीं परन्तु इतना कठिन भी नहीं कि पुस्तकों के मूल्य आकाश छूने लगें। यदि पुस्तकों को अल्मारियों में रखने के लिए न बनाकर पढ़ने के लिए बनाया जाए तो कम लागत में पुस्तक मिल सकती है। प्रकाशकों को इस ओर ध्यान देना होगा।
यदि समाज में बढ़ते अनाचार और अपराधों पर अंकुश लगाना है तो स्वस्थ बाल साहित्य उपलब्ध करवाना आवश्यक है। इस दिशा में जब तक प्रचार तंत्र (मीडिया) और प्रकाशन संस्थाएँ अपना दायित्व नहीं समझेंगी तब तक सफलता हाथ लगना कठिन है।







