राजस्थान में दैनिक भास्कर के हालिया स्टिंग ऑपरेशन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भ्रष्टाचार राजनीतिक दलों की सीमाओं से परे है। भाजपा के खींवसर विधायक रेवंतराम डांगा, कांग्रेस की हिंडौन विधायक अनीता जाटव और निर्दलीय बयाना विधायक ऋतु बनावत को विधायक निधि से विकास कार्यों की अनुशंसा के बदले 40-50 प्रतिशत कमीशन मांगते कैमरे में कैद किया गया। यह कोई नया खुलासा नहीं, बल्कि जनता के उस लंबे अनुभव की पुष्टि है कि जनप्रतिनिधि अक्सर सार्वजनिक धन को निजी कमाई का जरिया बना लेते हैं।
ये तीनों विधायक पहली बार चुने गए हैं, फिर भी कमीशन की भाषा में पारंगत दिखे। डांगा ने पुराने तजुर्बे का हवाला देते हुए स्पष्ट डील की, जबकि अनीता और ऋतु के प्रतिनिधियों ने भी बिना हिचक सौदा तय किया। सोचिए, नए विधायक ही इतने प्रतिशत हिस्सा मांग रहे हैं तो पुराने नेताओं ने कितना धन लूटा होगा? इसमें अधिकारियों और ठेकेदारों का हिस्सा जोड़ें तो विकास कार्यों की गुणवत्ता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। नतीजा सामने है , सड़कें जल्दी उखड़ जाती हैं, भवनों की दीवारें गिर पड़ती हैं और सार्वजनिक परियोजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
राजस्थान में पुलिस, परिवहन, खनन, बिजली जैसे विभागों से लेकर पंचायत स्तर तक भ्रष्टाचार की शिकायतें आम हैं। सरकारें जीरो टॉलरेंस का दावा करती हैं, लेकिन हकीकत में विधायकों की सिफारिश पर ही नियुक्तियां होती हैं, जिससे हिस्सेदारी का खेल चलता रहता है। ईमानदार रहना चाहे तो राजनीतिक दलाल साथ नहीं छोड़ते। नतीजतन, राजनीति और नैतिकता अब दुश्मन जैसे हो गए हैं।
मुख्य बात यह है कि भ्रष्टाचार किसी एक दल की संपत्ति नहीं। सत्ता हो या विपक्ष, जब जनप्रतिनिधि ही जनता के पैसे पर डाका डालें तो विकास का सपना कैसे पूरा होगा? इस स्टिंग ने सिर्फ तीन चेहरों को बेनकाब किया, लेकिन पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है। जरूरत है सख्त कानूनों और पारदर्शी प्रक्रिया की, वरना लोकतंत्र की नींव ही कमजोर पड़ती रहेगी। – दिलीप राय शर्मा







