जी के चक्रवर्ती
किसी भी देश के लोगों के लिए खेल एक शारीरिक स्वस्थ होने और शारीरिक क्षमता के प्रदर्शित होने के साथ ही शारीरिक दक्षता का परिचायक होने के साथ ही साथ विश्व मे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की दृष्टिकोण से भी बहुत आवश्यक है। किसी भी देश में उसके लोगों के समाज के लोगों की खेलो के प्रति लगाव को दर्शाता तो है ही इसके अतिरिक्त विश्व के भिन्न भिन्न राष्ट्रों के मध्य एक दोस्ताना सम्बन्ध विकसित होने के साथ ही एक मजबूती भी प्रदान करने का काम करता है। इस तरह से सम्पूर्ण विश्व में फैले विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के आपस मे संस्कृति के आदान प्रदान करने का माध्यम इस अवसर पर सबको मिलता है। अभी जापान के टोक्यो में सम्पन्न हुये खेले गये ओलिंपिक खेलों का शुभारम्भ शुक्रवार 23 जुलाई वर्ष 2021 से शुरू हो कर रविवार 8 अगस्त 2021 के दिन सम्पन्न हुआ।
फिलहाल इस ओलिंपिक के नतीजे हमारे देश के लिये उत्साहवर्धक होने के साथ साथ संतोषजनक ही कहा जायेगा। यह बात केवल इस दृष्टिकोण से ही नहीं है कि जापान टोक्यो में संम्पन्न हुये प्रतिगताओं में हमारे देश के अनेक खिलाड़ीयों ने बहुत अच्छा प्रदर्शन करते हुये हमारे सभी उम्मीदों पर खरे उतरेंने की कोशिश की हैं बल्कि इस प्रदर्शन से हमारे देश में खेल की एक नई संस्कृति के विकसित होने की शुभारम्भ ही हुआ हैं।

टोक्यो ओलिंपिक मे भारत ने कुल सात मेडल जीते हैं जिसमे 1 गोल्ड, 2 रजत पदक और 4 ब्रॉन्ज मेडल जीते हैं इसी के साथ ही भारत पदक तालिका में आज 48वें नम्बर पर खड़ा है।
जिन खिलाड़ियों ने भारत के लिए टोक्यो ओलिंपिक में पदक हासिल किए हैं, वे देश और देशवासियों की ओर से उन्हें बहुत-बहुत बधाई और वे प्रशंसा के पात्र तो हैं ही इसके साथ ही उन लोगों ने देश का नाम विश्व पटल पर ऊंचा करने का काम भी किया है जो कि बहुत गर्व की बात है और उन खिलाड़ियों के खेल प्रदर्शन से यह भी उम्मीद बंधती है कि आने वाले समय में भारत खेल जगत की एक बड़ी हस्ती बनने में प्रयासरत होने के साथ ही सक्षम भी है।
मौजूदा समय मे हमारे देश के खिलाड़ियों के प्रदर्शनों से तो ऐसा लगने लगा है कि हम उन खेलों में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं, जिन खेलों को कभी हमने तब्बजो नही दिया या कहे हम पीछे रहे हैं जिसके कारण आज से कुछ समय पहले तक भला फेंक , तीरंदाजी, लम्बी छलांग जैसे कुछ एक एथलेटिक्स खेलो में हमे कोई आशा ही नजर नही आती थी, जहां तक एथलेटिक्स खेलो की बात करें तो एक समय इस खेल में रूस का वर्चस्व हुआ करता था, लेकिन आज हमारे देश के खिलाड़ी भी उसमें दक्षता प्राप्त कर विश्व मे अपनी योग्यताओं के झंडे गाड़ने लगे है। ऐसे में यदि बात की जाय तो पुरुष हाकी की और दूसरी तरफ महिला हाकी दोनों ही टीमें सेमीफाइनल में पहुंचने में सफल हुई और इन दोनों टीमों में से पुरुष हाकी टीम फाइनल में 41 सालों के बाद ओलिंपिक में कांस्य पदक अपने नाम कर अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते हुये दिखाई दी।
हमारे देश मे हॉकी और फुटबॉल जैसे पारम्परिक खेलों में देशवासियों के मध्य हमेशा से प्रचलित होने से इससे लगाव भी रहा है। लेकिन एक लम्बे समय से इन दोनों खेलों में कभी मेजर ध्यानचंद्र जिन्हें हॉकी के जादूगर के नाम से जाना जाता था तो वहीं फुटबॉल में बाईचुंग भूटिया जो भारतीय फुटबॉल में एक स्ट्राइकर के रूप में खेलते रहे और भूटिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय फुटबॉल का मशालदार माना जाता है। इन दोनों खेलो में इन दोनों भारतीय खिलाड़ीयो के हटते ही धीरे-धीरे भारत का वर्चस्व विश्व पटल पर कम होता चला गया। लेकिन इन पारम्परिक भारतीय खेलो के साथ ही अन्य खेलों में भी भारत खेल जगत की एक बड़ी ताकत बन कर उभर सकता है यह हमारे देश की नई खेल संस्कृति का नतीजा है कि आज हम विश्व मे अपनी दक्षता के झंडे गाड़ रहे हैं।







