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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    संस्मरण वर्षा काले: बचपन का जल जीवन

    ShagunBy ShagunJuly 8, 2020 Hot issue No Comments3 Mins Read
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    अरविन्द कुमार साहू

    आज अधिकाँश गाँवों में हैंडपम्प, टुल्लू पम्प, सब्मर्सिबल या पाईप लाईन से सप्लाई तकनीक के सहारे जरुरी उपयोग का पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। लेकिन सिर्फ तीस-पैंतीस वर्ष पीछे जायें तो ऐसा बिल्कुल भी नही था। हर मुहल्ले में कुएँ या तालाब भी नही होते थे। नदी किनारे बसे गाँवों की बड़ी आबादी नहाने, कपडे व बर्तन धोने तथा पीने के लिये काफी दूरियाँ तय करते हुए, जंगली जानवरों तथा अराजक तत्वों से खतरों के बावजूद नदी के पानी पर ही आश्रित होती थी।

    प्रतिवर्ष नदी में डूबकर, या किसी मगरमच्छ का शिकार होकर अनेक जानें जाती थी। सर पर पीतल या मिट्टी की गागरें लादकर घाट पर आते जाते गाँव की किशोरियाँ या महिलाएँ भी प्राय: दबंगों की कुदृष्टि का शिकार हो जाती थी। गाँव के तालाबों पर भी ऐसी परिस्थितियाँ अक्सर बनती थी। निजी तालाब व कुएँ अक्सर जाति- पाति और निजता के शिकार होते थे और यदा – कदा बने निजी कुएँ सबके लिये दुर्लभ ही थे।

    मेरी याददाश्त के अनुसार मेरा बचपन रायबरेली और प्रतापगढ़ जिले के कई गाँवों में बीता । यह 1970 के दशक की आखिरी और अस्सी के दशक की शुरुवात थी। मेरे आवास के दोनो पैतृक गाँवों में घर के सामने पुरखों के बनवाये निजी कुएँ थे, जिनसे पुरवाही के सहारे पास के खेतों में सिंचाई भी होती थी। मीठा पानी होने के कारण इनसे सार्वजनिक रूप से पूरे मुहल्ले को जिनमें दलित व ब्राह्मण भी थे, किसी को पीने के पानी की कभी कोई दिक्कत या भेदभाव नही होने दिया गया।
    किन्तु मेरी ननिहाल नायन स्टेट मे नाना के घर के सामने जो कुआँ था, उसका पानी समुद्री जल की तरह खारा था। ये पीने में नमकीन और बेस्वाद था, इससे कपडे भी ठीक तरह साफ नही होते थे और चूल्हे पर उबलती दाल तो बिल्कुल भी नहीं गलती थी। गाँव के कुछ लोग वहाँ नहा लेते थे तो कुछ लोग सुबह नित्यक्रिया,नहाने व कपडे धोने के लिये छोटे समूह में एक-डेढ़ किलोमीटर दूर नदी के घाट पर ही निकल जाते थे।

    इस पूरे गाँव में ऐसा एक ही कुआँ था जो पूर्व रजवाडे की हवेलीनुमा आवास के सामने था। इसका पानी मीठा था और बड़ा आकार होने के कारण या मिठउवा कुआँ या बड़े कुआँ दोनों नाम से प्रसिद्ध था। पूरे गावँ के बीच स्थित इस कुएँ पर दबंगों के डर व अन्तिम घरों से काफी दूरी के बावजूद वहाँ से सारा गाँव थोड़ा- थोड़ा पानी लेने आ ही जाता था। जब भी हम ननिहाल जाते तो हमें वहाँ घर के सामने वाले कुएँ का खारा पानी अच्छा नही लगता था, तब मेरी मौसी या नानी आदि वहाँ से मिठऊवा कुआँ जाकर हम लोगों के लिये पीने और दाल उबालने के लिये एक या दो घड़ा रोज भरकर लाती थी। बाकी काम के लिये लोग मजबूरन खारे पानी के कुओं से ही ज्यादा काम चलाते थे।

    एक राज की बात बताऊँ कि गर्मी की सन्नाटे वाली भरी दोपहर या कभी भी अकेले हमारे घर की औरतों को उस तरफ़ जाने की मनाही थी। बाद में एक बार मैने अपनी माँ को किसी से बतियाते सुना कि मीठे कुएँ के सामने रहने वाले उस हवेली के कुछ दबंग लोग सन्नाटे में पानी भरने आने वाली युवतियों को गंदे-गन्दे कामुक इशारे करते और फब्तियां कसते थे। उन्होने यहाँ तक बताया कि उस कुएँ पर अकेले पानी भरने गयी कुछ युवतियाँ ऐसा गायब हुई थी कि उनका आज तक कोई सुराग ही नही मिला।

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