देशप्रेम संस्कृति आत्मसम्मान के अतिरिक्त दैनिक मानवीय क्रियाओं में अति से बचें यह आवश्यक नहीं कि सदा बुरे कर्मों की वजह से ही दर्द सहने को मिले कई बार आवश्यकता से अधिक अच्छे होने का भी मूल्य चुकाना पड़ता है अति करना अच्छा नहीं होता और न किसी चीज की अति होना अच्छा होता है कबीरदास जी ने भी कहा है….
अति भली न बरसना अति भली न धूप।
अति भली न बोलना अति भली न चुप॥
अर्थात यदि वर्षा अधिक होगी तो चारों ओर जलथल हो जायेगा बाढ़ के प्रकोप जान-माल की हानि होगी बीमारियाँ परेशान करेंगी अनाज बरबाद होगा और मंहगाई बढ़ेगी इसी तरह सूर्य के प्रकोप से चारों ओर गर्मी की अधिकता होगी सूखा पड़ेगा और हम दाने-दाने के लिये तरसेंगे दूसरी पंक्ति में कवि उन लोगों को सचेत कर रहा है जो बहुत बोलते हैं अनावश्यक प्रलाप करते समय वे प्रायः मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं उन्हें पता ही नहीं चल पाता कि वे न कहने वाली बात कब कह जाते हैं जो झगड़े-फसाद का कारण बनती है ऐसा व्यक्ति हवा में रहता है और झूठ-सच भी कहता रहता है इसके विपरीत बिल्कुल चुप रहने वाले को भी लोग पसंद नहीं करते उसे घमंडी, चुप्पा,अव्यवहारिक और न जाने क्या-क्या कहते हैं चुप्पा लोग यदि गलत कार्यों में संलग्न हो जाते हैं तो जल्दी तब तक पता नहीं लगता जब तक कोई कारनामा उनकी किसी गलती से उजागर न हो जाय।
यह सत्य है, एक चुप सौ सुख या ‘एक चुप सौ को हराये’ धर्माचरण करने वालों के लिये चुप रहना बहुत बड़ा गुण है यह हमारे धैर्य व सहनशीलता का प्रतीक है पर अति चुप बहुत बड़ा अवगुण बन जाता है इसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, धन लिप्सा, पद लालसा, आदर्शवादिता, सच्चाई, ईमानदारी, आग्रह-विग्रह आदि में से किसी भी गुण-अवगुण की अति बहुत दुखदायी होती है हर गुण की जीवन में आवश्यकता है पर जब अति होकर वह हमारे लिये झंझाल बन जाये तो उसका त्याग करना चाहिए क्योंकि ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ अर्थात् अति को हर जगह छोड़ देना चाहिए और यथासंभव अति से बचना चाहिए क्या ‘अति’ प्रत्येक स्थान पर बुरा है ?
इस विषय पर बहुत ही गहराई से सोचा जाये तो लगता है कि अति कई स्थानों पर अच्छी भी होती है जैस भगवान् राम की अति पितृभक्ति, भीष्म पितामह का अति राष्ट्रप्रेम, दानवीर कर्ण की अति दानवीरता, क्योंकि इन महापुरुषों ने अति करके ही उच्च कोटि का मान-सम्मान पाया है और इन्हें भगवान् एवं महापुरुषों की श्रेणी में लाता है।
देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय हमारे देश के कई क्रान्तिकारी आकण्ठ भाव से देशभक्ति में डूबे हुए थे इनका ‘अति’ देश प्रेम उनकी आत्मा को छू रहा तो क्या वे देशभक्त गलत थे, क्या उनकी देशभक्ति ही गलत थी, क्योंकि उन्होंने देशभक्ति की ‘अति’ कर दी थी। यदि वे ऐसा नहीं करते तो आज देश शायद आजाद भी नहीं होता देश की सुरक्षा जानकारियां अति गोपनीय रखने के लिये अति चुप लाभकारी है पर सामान्य कार्यों में अति चुप बहुत खतरनाक भी हो सकता है इसका सार यह है कि‘अति’ केवल दैनिक मानवीय क्रियाओं तक ही उचित प्रतीत होता है न कि देशप्रेम अथवा आत्मसम्मान के भावों में अति सर्वत्र वर्जयेत् अच्छी बात है, पर हमारी संस्कृति, हमारे आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं अन्यथा इसका मतलब होगा अपनी कायरता को नैतिकता की चादर में ढकने का प्रयास एक सनातन धर्मी प्राकृतिक रूप से सहिष्णु ही होता है पर उसे अपने आत्म सम्मान तथा संस्कृति, धर्म और राष्ट्र की रक्षा के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भी समझना चाहिए सहिष्णुता की आड़ में अपने जड़ों पर कुठाराघात सहने वाले सहिष्णु नहीं, कायर हैं….
- अजीत कुमार सिंह







