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    Home»लघुकथा

    राजा परीक्षित और शुकदेव महाराज

    By June 21, 2017Updated:July 20, 2017 लघुकथा No Comments4 Mins Read
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    king & shukdev
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    राजा परीक्षित को श्रीमद्भागवत पुराण सुनाते हुए जब शुक्रदेव जी महाराज को छह दिन बीत गए और सांप के काटने से मृत्यु होने का एक दिन शेष रह गया, तब भी राजा परीक्षित का शोक और मृत्यु का भय दूर नहीं हुआ। अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर राजा का मन क्षुब्ध हो रहा था। तब शुक्रदेव जी महाराज ने परीक्षित को एक कथा सुनानी आरंभ की।
    राजन! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा पहुंचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात हो गई और भारी वर्षा भी होने लगी। जंगल में शेर, व्याघ्र आदि जंगली जानवर बोलने लगे। राजा ने सोचा कि किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात बिताने के लिए विश्राम का स्थान मिल जाए तो अच्छा रहेगा।
    इसी दौरान राजा को एक दीपक दिखाई दिया, वहां पहुंचकर उसने एक बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था।  साथ ही अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह झोंपड़ी थी। उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन पीछे जंगली जानवर और खराब मौसम के कारण राजा ने झोपड़ी में ही विश्राम करने का निर्णय लिया। राजा ने बहेलिये से रातभर ठहने का अनुरोध किया।
    बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहां आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूं, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
    राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है, यहां तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, सिर्फ एक रात्रि ही काटनी है। बहेलिये ने राजा को ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा।
    सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह उठा तो वही सब परमप्रिय लगने लगा। अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। वह बहेलिये से और ठहरने की प्रार्थना करने लगा। इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा। राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
    कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित से पूछा, परीक्षित! बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था? परीक्षित ने उत्तर दिया, भगवन!  वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइये ? वह तो बड़ा भारी मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है।
    श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा, हे राजा परीक्षित ! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं। इस मल-मूल की गठरी देह  में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप झंझट फैला रहे हैं और मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है? राजा परीक्षित का ज्ञान जाग पड़ा और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

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