‘प्रेम’ शब्द सुनते ही मेरे मन में कृष्ण का चेहरा क्यों उभरता है? वे कृष्ण, जो गोकुल छोड़कर कभी लौटे नहीं—न यमुना, न वृंदावन, न कदंब, न राधा। कोई उन्हें वापस न खींच सका। मथुरा-गोकुल की दूरी कम थी, फिर भी कृष्ण हस्तिनापुर गए, पर गोकुल नहीं। शायद इसलिए कि गोकुल लौटने से उनके प्रेम की वह दिव्य ऊंचाई खंडित हो जाती। प्रेम देह का बंधन नहीं, आत्मा का गहना है। जब प्रेम देह तक सिमटता है, वह हार जाता है।
कृष्ण का प्रेम आत्मा का प्रेम था। वे राधा के साथ देह से कभी नहीं रहे। राधा उनकी याद में आंसुओं में डूबती रहीं, और कृष्ण उनकी याद में मुस्कुराते रहे। दोनों देह से दूर, पर आत्मा से एक। यही कारण है कि कृष्ण का प्रेम कभी पराजित नहीं हुआ। वे एकमात्र प्रेमी हैं, जिनका प्रेम अपराजित रहा। कितना विचित्र है—राधा कृष्ण को याद कर रोती रहीं, और कृष्ण राधा को याद कर मुस्कुराते रहे। दोनों अपनी-अपनी मर्यादा निभाते रहे। पुरुष रो नहीं पाता। वह भीतर की गहरी पीड़ा को भी मुस्कान के साथ सहता है। पुरुष होने का भाव उसे अंदर ही अंदर तोड़ देता है, फिर भी वह अपनी पीड़ा को व्यक्त नहीं कर पाता।
कृष्ण तो पूर्ण पुरुष के रूप में आए थे—वे भला कैसे रोते? मेरे राम रोए—पिता के लिए, माता के लिए, भाई के लिए, पत्नी के लिए, मित्र के लिए, मातृभूमि के लिए। लोग कहते हैं, कृष्ण कोमल थे और राम कठोर। मुझे लगता है, राम कोमल थे, कृष्ण कठोर। राम ने सबको क्षमा किया—चौदह वर्ष की पीड़ा देने वाली मंथरा तक को, कैकई के प्रति भी कोई कठोरता नहीं दिखाई। पर कृष्ण ने किसी को क्षमा नहीं किया—न दुर्योधन, न कर्ण, न ही अपने प्रिय मित्र अर्जुन को। अर्जुन ने पत्नी के अपमान को चुपचाप देखा, तो कृष्ण ने उसी के हाथों उनके कुल का नाश करवाया। राम क्षमा सिखाते हैं, कृष्ण दंड। दोनों ही जीवन के लिए अनिवार्य हैं।
लोग पूछते हैं, विश्व की सारी सभ्यताएं नष्ट हो गईं, पर भारत आज भी जीवंत है। मेरा जवाब है—भारत ने राम और कृष्ण दोनों को पूजा। यही उसकी दीर्घायु का कारण है। बात फिर प्रेम की, या कहें, कृष्ण की।
कृष्ण ने उद्धव को गोकुल इसलिए भेजा ताकि उनकी कहानियां सुनकर वे गोकुल को फिर जी सकें। प्रिय की बातें सुनने का सुख, उसे याद करने की मिठास, मिलन में भी नहीं। कृष्ण ने सिखाया कि प्रेम कैसे जिया जाता है, और युगों तक सिखाते रहेंगे। राधा-कृष्ण की कथा राधा के वियोग, समर्पण, आंसुओं से लिखी गई। किसी ने कृष्ण के मन को नहीं टटोला।
आत्मबल जितना मजबूत होगा, जीवन उतना ही भव्य और उच्च होगा। कमजोर नींव पर ऊंचा मकान नहीं बन सकता। अगर विचारों में उदासीनता या निराशा हो, तो जीवन कभी उच्चता की ओर नहीं बढ़ सकता। निराशा का अर्थ है लड़े बिना हार मान लेना। और जहां निराशा है, वहां आशा (प्रसन्नता) का प्रवेश असंभव है। बिना आशा के जीवन का विकास कैसे हो सकता है?
उदासीनता और निराशा जीवन रूपी महल की ऐसी कमजोर ईंटें हैं, जो इसे कभी भी ढहा सकती हैं। आत्मबल की ईंट जितनी मजबूत होगी, जीवन उतना ही भव्य और ऊंचा होगा।
शोको नाशयते धैर्यं, शोको नाशयते श्रुतम्।
शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपुः॥
शोक धैर्य, ज्ञान और सर्वस्व का नाश करता है। शोक से बड़ा कोई शत्रु नहीं। शोक मनुष्य के शौर्य को खा जाता है।







