माता शीतला देवी (या शीतला माता) को स्वास्थ्य, शीतलता और रोगों से मुक्ति देने वाली देवी माना जाता है। वे चेचक, बुखार, त्वचा रोग जैसी बीमारियों की रक्षा करती हैं। उनकी पूजा चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी (कुछ जगह सप्तमी) को होती है, जिसे शीतला अष्टमी या बसौड़ा कहते हैं।
प्रस्तुति : नीतू सिंह
क्या है व्रत कथा : (सबसे प्रचलित कहानी)
एक गांव में लोग शीतला माता की पूजा बड़े उत्साह से करते थे। एक साल गाँववालों ने माता को गरम-गरम ताजा भोजन का भोग लगाया। माता ने वह गरम भोग ग्रहण किया, तो उनका मुँह जल गया और वे बहुत क्रोधित हो गईं। क्रोध में माता ने पूरे गाँव में बीमारियाँ फैला दीं।
गाँव में एक गरीब कुम्हारिन (या बुढ़िया) रहती थी। उसके पास ताजा खाना बनाने की सामर्थ्य नहीं थी, इसलिए उसने माता को एक दिन पहले का बचा हुआ ठंडा (बासी) भोजन ही अर्पित किया। माता उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उसके घर को सभी रोगों से बचाया। बाकी गाँव बीमार पड़ गया, लेकिन उस महिला का घर सुरक्षित रहा।
जब गाँववालों ने पूछा तो पता चला कि ठंडे भोग से माता प्रसन्न हुईं। तब से परंपरा बनी कि शीतला अष्टमी पर केवल ठंडा/बासी भोजन (बसौड़ा) का भोग लगाया जाता है, चूल्हा नहीं जलाया जाता और ठंडा ही खाया जाता है। इससे माता प्रसन्न होकर रोग दूर करती हैं।
होली के आठ दिन बाद पूजा क्यों?
- होली के बाद वसंत/गर्मी का मौसम शुरू होता है। पुराने समय में इस मौसम में चेचक, बुखार जैसी संक्रामक बीमारियाँ बहुत फैलती थीं।
- होली ठीक फाल्गुन/चैत्र में आती है, और शीतला अष्टमी होली के 7-8 दिन बाद (कृष्ण पक्ष अष्टमी) पड़ती है।

- इस समय मौसम बदलाव से रोग बढ़ते हैं, इसलिए माता शीतला की पूजा रोगों से रक्षा और शरीर को शीतल (ठंडक) देने के लिए की जाती है।
- ठंडा भोग लगाने से भी शरीर को ठंडक मिलती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
- संक्रामक बीमारियाँ से बचने के लिए जगह जगह मंदिरों में माता रानी की पूजा होती है। लखनऊ के टिकैतगंज में भव्य मेला लगता है जहां हज़ारों श्रद्धालु शीतला माता मंदिर में दर्शन के बाद मेले का आनंद लेते हैं।
बता दें कि इस व्रत से स्वास्थ्य, सुख-शांति और रोग मुक्ति की कामना पूरी होती है। – जय माता शीतला!







