विधान परिषद में भाजपा सदस्य विजय बहादुर पाठक ने उठाया गंभीर मुद्दा, सरकार से मांगी प्रभावी कार्रवाई
लखनऊ में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदन में एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठा है, जो आज के डिजिटल युग की एक बड़ी चुनौती को उजागर करता है जो बच्चों में मोबाइल फोन की बढ़ती लत को बढाता है, यह बेहद ही चिंतनीय विषय है। भाजपा के सदस्य और विधान परिषद सदस्य श्री विजय बहादुर पाठक ने मंगलवार को इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने स्कूलों में होमवर्क, असाइनमेंट और अन्य शैक्षिक सूचनाओं को व्हाट्सएप, पोर्टल या अन्य डिजिटल माध्यमों से देने की प्रथा को बच्चों की मोबाइल निर्भरता का प्रमुख कारण बताया।
कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल माध्यम अपनाना मजबूरी थी, जिसने उस समय शिक्षा को सुचारु रूप से चलाए रखने में मदद की। लेकिन महामारी के बाद भी कई स्कूलों में पारंपरिक डायरी की जगह व्हाट्सएप ग्रुप और डिजिटल पोर्टल ने ले ली है। अभिभावकों तक होमवर्क और स्कूल की सूचनाएं डिजिटल रूप से पहुंचाई जा रही हैं, जिसका उद्देश्य समय की बचत था। लेकिन इस सुविधा ने अनजाने में बच्चों के हाथ में मोबाइल फोन को एक आवश्यक उपकरण बना दिया है। अभिभावकों को मजबूरी में बच्चों को फोन सौंपना पड़ रहा है, ताकि वे होमवर्क देख सकें या सबमिट कर सकें।
इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पढ़ाई के बहाने फोन मिलने पर बच्चे धीरे-धीरे गेम्स, रील्स, सोशल मीडिया और अन्य मनोरंजक सामग्री की ओर मुड़ जाते हैं। इससे एडिक्टिव व्यवहार विकसित हो रहा है, एकाग्रता भंग हो रही है, याददाश्त कमजोर पड़ रही है और नींद के पैटर्न बिगड़ रहे हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के संज्ञानात्मक विकास, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और शैक्षिक प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। कुछ देशों में बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं, ताकि ऐसी लत को रोका जा सके।
यह मुद्दा केवल तकनीकी सुविधा का नहीं, बल्कि बच्चों के समग्र विकास का है। स्कूलों को चाहिए कि वे होमवर्क और सूचनाओं के लिए डिजिटल माध्यमों का उपयोग सीमित करें और पारंपरिक तरीकों को प्राथमिकता दें, खासकर छोटे बच्चों के लिए। सरकार को भी प्रभावी नीति बनानी चाहिए—जैसे स्कूलों में मोबाइल-फ्री जोन लागू करना, अभिभावकों के लिए जागरूकता अभियान चलाना और मनोरोग विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित दिशानिर्देश जारी करना।
तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन जब वह बच्चों के भविष्य को खतरे में डालने लगे, तो समय आ गया है कि हम संतुलन स्थापित करें। सदन में उठा यह मुद्दा न केवल विचारणीय है, बल्कि तत्काल कार्रवाई की मांग करता है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी स्वस्थ, संतुलित और सशक्त बने।







