29 मार्च को आये भयानक भूकंप से म्यांमार, थाईलैंड, इंडोनेशिया और अफगानिस्तान चौंक गए, इसकी विभीषिका का बढ़ता रूप लोगों को दहलाता जा रहा है। कुदरत के इस कोप से म्यांमार में करीब सवा दो हजार मौतें हो चुकी हैं और आशंका है कि संख्या दस हजार तक जा सकती है। हजारों गगनचुंबी इमारतों व विशालकाय पुलों के ढहने, संचार व आवागमन व्यवस्था के ध्वस्त होने की बात ही अलग है। थाई राजधानी बैंकाक में भी दस लोग मारे गए हैं। भूकंप की भीषणता । का अंदाज इसी बात से लगता है कि एक अमेरिकी वैज्ञानिक के अनुसार 7.7 तीव्रता की इस आपदा की ऊर्जा तीन सौ से अधि परमाणु बमों के बराबर थी और ये झटके कई महीनों तक रह सकते हैं।

म्यांमार में तीन दिनों के भीतर सत्रह झटके आ भी चुके हैं। यह दावा भी है कि संचार व्यवस्था ध्वस्त होने के कारण अभी सारी जानकारी बाहर आ ही नहीं पाई है। पिछले दो वर्षों के दौरान अफगानिस्तान और नेपाल ऐसी ही भयानक त्रासदी को झेल चुके हैं। भारत में भी ऐसी घटनाएं जब तब होती रहती हैं। इन के पीछे पृथ्वी के नीचे टेक्टोनिक्स प्लेटों (विवर्तनिक परतों) के बदलाव या टकराव को मुख्य कारण माना जाता है। तब स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि चांद और मंगल ग्रहों पर मानव बस्तियां बसाने का सपना देखने और पाताल की गहराइयां नाप लेने का दावा करने वाले वैज्ञानिक आखिर पृथ्वी के नीचे होने वाली हलचलों की खबर क्यों नहीं हासिल कर पा रहे।
अब अधिकाधिक विनाशकारी साबित हो रही प्राकृतिक आपदाओं के पीछे मुख्य कारण यह है कि पृथ्वी के तापमान में उत्तरोत्तर वृद्धि के कारण वायुमंडल में परिवर्तन आ रहा है। कथित विकासवादी अवधारणा के पीछे दीवानी दुनिया प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रही है जबकि ये संसाधन ही तापमान को संतुलित रखते हुए वातावरण को सुरक्षित बनाते हैं। तब प्रकृति को चुनौती और मात देने की महत्वाकांक्षाओं के दुष्परिणाम इसी ढंग की बढ़ती गंभीर आपदाओं की विभीषिका के रूप में सामने आ रहे हैं। इनसे बचने के लिए मानव को ही अपना रवैया बदलना होगा।







