करीब एक दशक पहले शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम लागू होने के बाद उम्मीद जगी थी कि अब देशभर के निर्धन वर्गों के बच्चों को भी शुरुआत से ही स्तरीय शिक्षा मिल सकेगी। पर कानून लागू होने के बाद से इसकी जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। यूपी की राजधानी लखनऊ में भी तमाम तर्कों की आड़ की तिकड़मों से स्कूलों द्वारा इन बच्चों को प्रवेश से इंकार करना हर साल का खेल बन गया है। इस साल भी शुरू हुए शैक्षिक वर्ष में करीब दस हजार चयनित बच्चों को प्रवेश देने से इंकार कर दिया गया है। जबकि चार चरणों की लॉटरी में 18 हजार से अधिक बच्चों को प्रवेश देने को चुना गया था।
कई नामी स्कूलों के प्रबंधक कोई दलील निकाल कर मामला अदालत में ले जाते हैं जिसके बाद मामला लटक कर अंत में खत्म ही हो जाता है। कानून से लुकाछिपी के इस खेल को केंद्र और राज्य सरकारें भी देखती हैं लेकिन तुरंत एक्शन लेने की जगह उनका तंत्र कमेटी बनाकर जांच बैठाने तक की औपचारिकता पूरी करके छुट्टी पा लेता है। चूंकि शिक्षा देने के नाम पर स्कूल चलाना काफी समय से मोटे मुनाफे का कारोबार बन चुका है, इसलिए कम फीस पर बच्चों को अपने यहां प्रवेश देना इनके मालिकों को कताई गवारा नहीं होता।
चूंकि कारोबार में लिए ऊपर तक पहुंच बनाने से आसानी होती है तो उसके लिए स्कूल प्रबंधन हर तरह के प्रचलित हथकंडे अपनाकर विभाग के चपरासी से लेकर उच्च अधिकारी और सरकार में अपनी पहुंच बनाकर किसी भी कार्रवाई को लेकर बेखौफ रहते हैं। नतीजा यह है कि एक उपयोगी कानून की मदद से अपने बच्चों का भविष्य बनाने की उम्मीद पाले अभिभावक इन स्कूलों के चक्कर काटने को मजबूर रहते हैं।







