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    Home»धर्म»Spirituality

    रावलपिंडी की मस्जिद के साथ ही जैन मंदिर की है चमक बरकरार

    ShagunBy ShagunDecember 19, 2017Updated:December 19, 2017 Spirituality No Comments3 Mins Read
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    मौलाना अशरफ के परिवार को है मंदिर के असली वारिसों का इंतजार


    आजादी के साथ ही हिन्दुस्तान से अलग होकर बने पाकिस्तान के रावलपिंडी में हिंदूओं की तादाद तो बहुत कम हो गई, लेकिन यहां मौजूद मंदिरों की चमक आज भी बरकार है। इसका कारण है कि मौजूद मंदिर के वारिसों का इंतजार कर रहे मुस्लिम परिवार ही मंदिर की देखरेख करते हैं। हद यह है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय जो लोग यहां तोड़-फोड़ करने आए उन्हें भी इन लोगों ने रोक दिया।

    रावलपिंडी शहर के बीच स्थित स्थित मस्जिद के अहाते में एक जैन मंदिर भी है जिसकी देखरेख पिछले 70 साल से मौलाना अशरफ अली का परिवार कर रहा है। मौलाना अशरफ का कहना है कि ऐसा वो इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बंटवारे के समय यहां से जाते हुए जैन समाज व हिन्दू परिवार के लोगों ने उक्त मंदिर की चाबी उनके पिता मौलाना गुलाम उल्ला खान को यह कहते हुए सौंपी थी कि जब हालात सही होंगे तो वो लोग वापस आकर मंदिर की चाबी ले लेंगे। यह अलग बात है कि आजादी के बाद से आज तक ऐसा नहीं हो सका और मौलाना का परिवार अपना फर्ज निभाते हुए मंदिर की देखरेख के साथ ही उसकी हिफाजत भी कर रहा है।

    मौलाना अशरफ ने बताया है कि उन्हें नहीं मालूम कि हिन्दुस्तान में मंदिर के वारिसान कहां और किस हाल में रह रहे हैं। ऐसे में यदि स्वयं ही मंदिर वाला परिवार के सदस्य रावलपिंडी आकर उनसे मंदिर की चाबी ले लें तो वो उन्हें सौंप सकते हैं। मंदिर के हिफाजत करते हुए मौलाना अशरफ ने यहां तक कहा है कि किसी भी धर्म की किताब में यह नहीं लिखा है कि दूसरे के धर्म के चिंन्हों या इबादतगाहों को तोड़ा जाए या उन्हें नष्ट कर दिया जाए। देश के बंटवारे से पहले के हालात को बताते हुए मौलाना अशरफ कहते हैं कि रावलपिंडी के राजाबाजार में हिंदुओं की घनी आबादी थी और यहां जैन समाज के लोग भी बहुतायत में रहते थे। मौजूदा मंदिर जैन समाज के लोगों द्वारा स्थापित किया गया था। तब लोगों के दिलों में प्रेम भाव था और इसका सुबूत मस्जिद के अहाते में बना यह जैन मंदिर है। चूंकि बंटवारे के समय जाते हुए जैन व हिन्दू परिवार से मौलाना अशरफ के पिता ने वादा किया था कि मंदिर को कुछ नहीं होगा, अत: उसे फर्ज जान आज भी परिवार के सदस्य उसकी हिफाजत कर रहे हैं। मंदिर के असली वारिसों का मौलाना अशरफ को आज भी इंतजार है, ताकि वो उन्हें मंदिर की चाबी उन्हें सौंप सकें।

    मौलाना चलाते हैं मदरसा
    खास बात यह है कि यहां मौलाना अशरफ अली एक मदरसा जामिया तालीम-उल-कुरान के नाम से संचालित भी करते हैं। इसके साथ ही वो यहां पढ़ने वाले बच्चों को अन्य धर्मों की मान्यताओं और उनकी इबादत करने के तरीकों के बारे में भी बताते हैं और बतौर सुबूत इस मंदिर को भी दिखाते हैं। दरअसल ऐसा करके मौलाना अपने शिष्यों को अन्य धर्मों के प्रति सम्मान करना भी सिखाते हैं।

    रेलवे स्टेशन पर है कृष्णा मंदिर
    रावलपिंडी रेलवे स्टेशन के नजदीक ही एक कृष्णा मंदिर भी है जो कि 1897 में बनाया गया था। मंदिर को कानजी मल, उजगर मल और राम राजपल ने स्थापित किया था। इस मंदिर के अंदर शिवलिंग के साथ ही साथ भगवान कृष्ण, गणेश समेत मां दुर्गा की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर में पूजा-पाठ करने आज भी हिंदू धर्म के लोग आते हैं और मंदिर के सेवक जगमोहन अरोड़ा हैं जो परंपराओं का निर्वाहन करते चले आ रहे हैं।

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