बहुत सारा चारा,
बहुत सारा गोबर
और इसके अनुपात में बहुत कम दूध…
मैं ज़्यादा रोज़ यह सब सह नहीं पाया
राम-राम पुकारते हुए घुस गया एक क्रूर कुहराम में,
लोगों के पेशाब पर से गुज़रते हुए पकड़ी मैंने बसें
भंडारे खाते हुए देखे ऊँचे-ऊँचे भवन
और उनके अनुपात में छोटे-छोटे घर और पेड़
महानगर में रोज़गार मिलते ही,
मैं भूल गया कि मुल्क में किसकी सरकार है
पाँच साल गुज़र गए मैंने न गाय देखी, न शेर
देखते-देखते देश एक विशाल चिड़ियाघर में बदल गया
मुझे इससे क्या फ़र्क पड़ा
कोई पूछे तो बता न पाऊँ
हाँ, मेरे कई दोस्तों के पाँच साल बुरी तरह बर्बाद हुए
वे या तो हिंदी विभाग में मास्टर हो गए या कवि या झंड
इस शब्दावली के लिए मुझे माफ़ न करें,
क्योंकि यही अब सही शब्दावली है—पराभव के विश्लेषण की
24×7 सब जगह कमीने और उचक्के ही जीतते हुए दिखाई दिए,
चूक और पछतावा तवक़्क़ो के लायक़ नहीं बचा
सारी तवक़्क़ो अब एक रवीश कुमार से है
मानो सारा साहित्य अब एक अख़बार से है
जिस पर खाना रखकर खाओ तो खाना गंदा हो जाए
क्या संस्कृतियाँ ऐसे ही पराजित होती हैं—एक सरलीकृत अवसाद में
यह भी गए पाँच सालों में ही हुआ कि दो-चार को छोड़कर एक-एक करके हिंदी की सारी प्रगतिशीलता पूरी तरह खुलेआम अशोक वाजपेयी के पीछे लग ली—
जबकि मैं विनोद नगर से चलकर विश्वास नगर से आगे न बढ़ सका
विश्वास की लंबी यात्राएँ सुप्रीम कोर्ट और बाबा रामदेव ने तय कीं
इस बीच सबसे ज़्यादा बेचैन हुईं स्त्रियाँ
सबसे ज़्यादा असुरक्षित हुए मुसलमान
सबसे ज़्यादा चुटकुले #मीटू और सी.बी.आई. और युद्ध और ग़रीबों पर बने
सबसे ज़्यादा संघर्ष आदिवासियों ने किया
सबसे ज़्यादा चालू हुआ मार्क जुकरबर्ग
सबसे ज़्यादा राजनीतिक कविताएँ मैंने नहीं लिखीं
क्योंकि सबसे ज़्यादा हास्यास्पद, दयनीय और ज़िम्मेदार नज़र आए हिंदी कवि।
- अविनाश मिश्र







