व्यंग : विद्वान बनने से बचिए!

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अंशुमाली रस्तोगी
विद्वान बनने के लिए मैंने कभी ‘जुगाड़’ नहीं लगाई। मैंने लेखन पर उतना ही ध्यान रखा, जितना विद्या बालन ने ‘डर्टी पिक्चर’ में अपने पल्लू का रखा था। ऐसा सुना है मैंने कि लेखक आधा विद्वान भी होता है। बुद्धिजीवी होने का ठप्पा उस पर पहले से लगा ही है। मुझे यह भी नहीं पता कि विद्वान और बुद्धिजीवी में क्या अंतर होता है?
पढ़ाई भी मैंने विद्वान या अच्छा छात्र बनने के लिए नहीं की। हालांकि मेरे अध्यापकों ने एड़ी-चोटी तक का दम लगा लिया मुझे विद्वान बनाने में पर मुझे नहीं बनना था, नहीं ही बना। ज्यादा पढ़कर कहीं विद्वान बन जाता तो लेने के देने पड़ जाते। जग-हंसाई होती सो अलग। स्कूल की पत्रिका में मेरा नाम छपता, मोहल्ले में मुझे इज्जत की निगाहों से देखा जाता; कितना गिल्ट महसूस होता मुझको। इसीलिए होशियार छात्र और विद्वान बनने के लफड़े से जितना बच सकता था, बचा।
कभी-कभी मुझे हैरानी होती है कि लोग विद्वान बन कैसे जाते हैं? विद्वान होने में बड़ी शान समझते हैं। जबकि हकीकत यह है कि देश और समाज की लुटिया विद्वानों ने ही डुबोई है। विद्वान न होते तो आज देश के ये हालात भी न होते। सब सुकून की जिंदगी जी रहे होते। न किसी पर पढ़ाई का बोझ होता न लिखाई का। बुद्धिजीवी भी किसी कोने में बैठे ‘राम नाम की माला’ जप रहे होते। विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने मिलकर साहित्य, इतिहास और समाज को गर्त में धकेलने का काम किया है।
विद्वान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वो अपने आगे किसी की सुनता नहीं। कभी सीधी दिशा में चलता नहीं। लिखेगा तो ऐसा लिखेगा कि जिसे वो ही समझ व पढ़ सके। जब देखो तब दुनिया को सुधारने में लगा रहता है। विद्वान अगर कवि है, समझ लीजिए, कबाड़ा निश्चित है। मैं कई ऐसे विद्वान कवियों को जानता हूं, जिन्होंने कविताएं लिखकर-लिखकर कविता का बेड़ा गर्क कर दिया है। ऊंचे-ऊंचे पुरस्कार पा लिए हैं। फेसबुक पर तो विद्वान कवियों का गैंग ही है।
हालांकि मैं व्यंग्य जरूर लिखता हूं लेकिन यहां भी मैंने खुद को विद्वान व्यंग्यकार होने से बचाए रखा है। अभी तक न अपना कोई व्यंग्य संग्रह लाया हूं न ही कोई पुरस्कार-सम्मान हथियाया है। व्यंग्यकारों के किसी ग्रुप से भी नहीं जुड़ा हूं। वरिष्ठ व्यंग्यकारों की छाया से भी खुद को दूर रखा है। मैं नहीं चाहता कि कोई मुझे विद्वान व्यंग्यकार कहकर ‘गाली’ दे।
मेरी मानिए, विद्वान बनने या होने में कोई फायदा नहीं। उल्टा नुकसान ही है। बनना ही है तो जड़-विद्वान या जड़-बुद्विजीवी बनिए। हर कहीं से तारीफें पाएंगे। देश और समाज को बचा सकते हैं तो विद्वानों से बचाइए। विद्वान न घर का रहने देता है न घाट का। समझे कुछ।

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