नामवर सिंह -1926 -2019
नामवर सिंह के पूरे व्यक्तित्व को अगर देखें तो वह एक ऐसे व्यक्ति नज़र आते हैं जिसका मुंह हमेशा खुला हुआ, हाथ हमेशा उठे हुए, पैर हमेशा सफ़र में हैं. और इस प्रक्रिया में ऐसे अवसर अनेक हैं जब वह मार्क्सवाद की नैतिकता को आहत करते रहे. जबकि वह प्रतिभा-पुंज, प्रखर बौद्धिक, प्रबुद्ध आलोचक, तलस्पर्शी विश्लेषक, अद्भुत वक्ता रहे… यह नामवर सिंह के चाटुकार और प्रशंसक ही नहीं, उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं.”
नामवर जी की खूबी रही कि वे अपने निजी जीवन को निजी रखते थे और उसको कभी सार्वजनिक बहस में नहीं आने देते थे। निजी के वे ही पहलू सामने आते हैं, जो सार्वजनिक कर्म का हिस्सा रहे हैं। निजी और पब्लिक में नामवरजी का यह संतुलन देखने योग्य था। नामवरजी ने बड़े ही तरीके से दिल्ली में कुछ साल पहले हुए एक कार्यक्रम में बताया कि वे कैसे पढ़े, उन्होंने किससे भाषा सीखी, किनका उनके ऊपर असर था। साथ ही बेबाकी के साथ यह भी बताया कि किस तरह उन्होंने तीन सप्ताह के अंदर भारत भूषण अग्रवाल के कहने पर ‘‘कविता के नये प्रतिमान’ किताब लिखी, जिसे बाद में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत किया गया।
उन्होंने साफ कहा कि यह किताब तो मैंने साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए लिखी थी। नामवरजी की इस घटना से मुझे यह सवाल उठाने की इच्छा हो रही है कि हम कैसे जीएं? और किस तरह जीते रहे हैं? हर लेखक को इन दोनों सवालों को अपने तरीके से खोलना चाहिए। नामवरजी कैसे जीए? सवाल का हल कैसे निकाला, इसका उत्तर उनके लंबे दैनिन्दन जीवन में फैला हुआ है, जिनमें अनेक बातें हैं जिनको सीखने की जरूरत है। मसलन; भाषा पर उनका जो अधिकार है वह चीज सीखने की है। वे बेहतर हिंदी गद्य लिखते और बोलते हैं। उदात्त, उत्तेजक और मधुर काव्यात्मक गद्य के उन्होंने बेहतरीन मानक बनाए हैं। इसके अलावा, निजी जीवन में वे भ्रष्ट नहीं रहे हैं। उनके ऊपर पक्षपात और आत्मगत फैसले लेने के आरोप लगते रहे हैं और हो सकता है; इनमें से कई फैसले गलत रहे हों, लेकिन वे निजी तौर पर भ्रष्ट नहीं थे।
बौद्धिक ईमानदारी का उन्होंने भरसक पालन किया। ज्ञान को पढ़कर हासिल करना और अपडेट रखना उनकी खास विशेषता थी। इसके अलावा, उनकी जीवनशैली संगठित और सुनियोजित रही है। इसमें सुबह चार बजे उठना, पढ़ना और टहलना नियमित कार्य था। कोई भी घर आए तो आने देना, कोई भी बुलाए तो उसके कार्यक्रम में जाना यह उनकी मिलनसारिता के गुण हैं। वे निजी तौर पर कभी किसी से खराब नहीं बोले, चाहे वह जितना ही खराब बोलता रहा हो। व्यवहार में उदात्तता को नामवरजी ने जिस तरह ढाला, वह सीखने लायक चीज है। नामवरजी के जीवन की धुरी उदात्त व्यवहार और उदार मूल्यों से बनी थी। इसमें गांव के किसान का बोध है, इसमें महानगरीय जीवन की ध्वनियां हैं और इसमें ग्लोबल नागरिक का विश्वबोध भी है। वे लोकल और ग्लोबल एक ही साथ नजर आते थे।
पहनावे और जीवनशैली में लोकल और नजरिए में ग्लोबल या यों कहें खांटी मार्क्सवादी की तरह विश्वदृष्टि से ओतप्रोत नजर आते रहे थे। नामवरजी के आसपास या दूर रहने वाले लोग यह सोचते थे कि वे अपने छात्रों को रचते रहे हैं, बनाते रहे हैं, लेकिन सच यह नहीं है। नामवरजी ने किसी को नहीं बनाया। निर्मिंत करना उनकी पद्धति और नजरिए का अंग कभी नहीं रहा था। यह बात मैं इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि अनेक लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि नामवरजी ने क्या निर्मिंत करके दिया? कैसा विभाग दिया? कितने मेधावी तैयार किए? असल में, नामवरजी ने हमें यह बताया कि कैसे जिएं। इससे यह निष्कर्ष न निकालें कि वे निर्मिंत करते रहे हैं। किताब कैसे पढ़ें? किताबों और जीवन के विविध आयामों से जुड़े सवालों को कैसे देखें? यह उनकी अकादमिक शिक्षा का हिस्सा है। एक अच्छे शिक्षक का काम है बताना, समझाना, न कि निर्मिंत करना।
परिवार, परंपरा, साहित्य, कला, राज्य, पति-पत्नी संबंध, प्रेम, राजनीति आदि के विभिन्न जटिल पक्षों को वे विभिन्न बहानों के जरिए छात्रों के सामने रखते रहे थे। इसमें ही जीवन जीने की कला के सूत्र भी देते रहे हैं। इस समूची प्रक्रिया में सवाल यह भी उठा कि हम ज्ञान के लिए जी रहे हैं या सामाजिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए जी रहे हैं? किसके लिए पढ़ रहे हैं? ज्ञानार्जन के लिए या समाज को बदलने के लिए? नामवरजी का एक ही उत्तर होता था कि शिक्षा का लक्ष्य है सामाजिक परिवर्तन न कि ज्ञानार्जन। कैसे जिएं और कैसे मरें, यह कला हमें सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल होकर सीखनी चाहिए। नामवर सिंह धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी आलोचक हैं।
आलोचना में इस परंपरा की नींव रवीन्द्रनाथ नाथ टैगोर ने रखी। उनकी आलोचना का मुख्य क्षेत्र वर्तमान समाज और आधुनिक साहित्य है। वे हिंदी के कम्प्लीट आलोचक हैं, आलोचक होने के लिए बेहतरीन भाषाशास्त्री होना जरूरी है, वे अकेले ऐसे आलोचक हैं, जिनकी बुनियाद भाषाविज्ञान ने बनाई। आज जो मौजूद है और जो होना चाहिए, इसके बारे में फर्क करने का विवेक आलोचक में होना जरूरी है। ऐसा करने के लिए आपको यथार्थ को जानना जरूरी है। यही वह प्रस्थान बिंदु है, जहां से उनके लेखन और कर्म को देखा जाना चाहिए। नामवर सिंह ने आलोचना में बार-बार जोखिम उठाया है, आलोचना में नये का प्रवेश जोखिम उठाए बिना नहीं होता। इसलिए उनके साहस की बार-बार प्रशंसा हुई। साहस का अर्थ है-समझौताहीन अवधारणाओं को प्रस्तुति। अपनी इसी शैली के कारण वे जनप्रियता बनाए रखने में सफल रहे हैं। वे बार-बार कहते थे हमें यथार्थ समझना चाहिए और पाठ को भी समझना चाहिए। उनकी कठिनाइयों को समझना चाहिए। इसके बाद उसे लागू करने का पूरी तरह साहस होना चाहिए। वे पेशेवर आलोचक की तरह सोचते, बोलते और लिखते थे। वे जो सोचते,उसे लागू करने की क्षमता रखते थे।
नामवरजी पर बातें करते समय उनके आलोचक और बाग़ी भाव की खूब बातें उनके जीवनकाल में होती रही हैं, लेकिन जो बात उनकी रचना से लेकर व्यवहार तक फैली है और जिसका ज़िक्र नहीं होता-वह है उनका मानवाधिकारवादी नज़रिया। नामवरजी स्वभाव से मानवाधिकारों के कट्टर पक्षधर रहे और इस कारण वे अनेक बार मार्क्सवादी विचारधारा का भी अतिक्रमण कर जाते हैं। आपातकाल की चूक के अलावा, वे समूचे जीवनकाल मानवाधिकारों के पक्ष में बोलते-लिखते रहे।
उनकी समीक्षा को मार्क्सवाद की कसौटी पर कसने की बजाय मानवाधिकार के पैमानों पर देखा जाए तो ज्यादा बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। वे जीवन की निरंतरता को साहित्य की निरंतरता में खोजते थे, जिसे वे परंपराओं की खोज कहते रहे थे। उनका मानना था कि भारत में एक नहीं अनेक परंपराएं हैं। परंपरा की खोज का अर्थ मृत तत्वों की खोज करना नहीं है, बल्कि जीवंत तत्वों की खोज करना है। यही वह बिंदु है, जहां से वे जीवंत के साथ जुड़ने का नज़रिया देते हैं। जीवन जीने की कला का एक नया मंत्र देते हैं कि जीना है तो जीवंत रहो और जीवंत से जुड़ो।
- जगदीश्वर चतुव्रेदी से साभार







