व्यंग: अंशुमाली रस्तोगी
सुनने में पहले जरूर थोड़ा अटपटा टाइप लगता था। मगर अब आदत-सी हो गई। यों भी, आदतें जितनी व्यावहारिक हों, उतनी ठीक। ज्यादा मनघुन्ना बनने का कोई मतलब नहीं बैठता। यह संसार सामाजिक है। समाज में किस्म-किस्म के लोग हैं। तरह-तरह की बातें व अदावतें हैं। तो जितना एडजस्ट हो जाए, उतना ठीक।
ओहो, बातों-बातों यह तो बताया ही नहीं कि क्या सुनने की आदत पड़ गई है मुझे। दरअसल, बात कुछ यों है कि अब मैं भाई या भाईसाहब के मुकाबले’ अंकल’ अधिक पुकारा जाने लगा लूं। बाहर वालो का क्या कहूं, खुद की घरवाली भी मुझे अंकल कहकर ही प्रायः संबोधित करती है।
यों, बाहर वाले को तो फिर भी अंकल शब्द पर हल्की-सी आंखें चढ़ा सकता हूं किन्तु घरवाली तो आखिर घरवाली ही ठहरी न।
लेकिन कोई नहीं। अंकल संबोधन को मैंने अब लाइफ-स्टाइल में शामिल कर लिया है। सही भी है न। इस पर किस-किस से भिडुंगा, किस-किस पर आंखें तरेरुंगा। किस-किस पर मन ही मन बद्दुआएं दर्ज करवाऊंगा।
साफ-सीधी सी बात है, उम्र भी तो हो चली है अब। दिल बेशक कितना ही जवान क्यों न हो, सिर और दाढ़ी के सफेद पड़ते बाल, बाहर के राज बे-पर्दा कर ही देते हैं। जैसे, पीने के बाद शराबी बदबू को जेब में कैद कर नहीं रख सकता।
माशाअल्लाह शादीशुदा हूं। दो प्यारी बच्चियों का बाप हूं। चालीस पार उम्र जा चुकी है। घर-परिवार में कई बच्चों का मामा, मौसा, ताऊ, चाचा, फूफा भी हूं। अब भी अंकल न कहलाऊंगा तो भला क्या उम्र के आखिरी दौर में कहलाऊंगा!
अंकल होना या पुकारे जाना गाली थोड़े है। मैंने तो बड़े-बड़े फिल्मी स्टारों तक को अंकल कहे जाते अपने दोनों कानों से सुना है।
इस कड़वी हकीकत से क्या मुंह फेरना, जब दुनिया में आए हैं तो एक दिन अंकल भी कहे जाएंगे ही। मगर कुछ मोहतरमाएं ऐसी हैं, जो खुद के ‘आंटी’ पुकारे जाने पर बड़ा खराब-सा चेहरा-मोहरा बना लेती हैं। मानो- उन्हें गाली ही दे दी हो! छूटते ही कहती हैं, ‘आंटी मत कहो मुझे!’ यह भी कोई बात हुई भला!
इस संसार में एक भगवान-खुदा ही है जिसे कोई अंकल नहीं कहता। वरना तो हम इंसान पैदाइशी अंकल-आंटी ही हैं!







