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    Home»साहित्य

    ‘चांद’, ‘माधुरी’ और हिंदी नवजागरण: अविनाश मिश्र

    By June 25, 2018Updated:June 28, 2018 साहित्य No Comments19 Mins Read
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    अपने लेखकीय कर्म की प्रतिबद्धता, मूल्यनिष्ठता और व्यापकता के लिए प्रसिद्ध प्रियंवद का नया काम एक ऐसे वक्त में हमारे सामने आया है जब समता के संघर्ष कमजोर पड़ रहे हैं, न्याय की राह और मुक्ति की इच्छा नए सिरे से दमन के बीच है, राजनीति और पत्रकारिता पतनशीलता के शीर्ष पर हैं और हिंदी की साहित्यिक मेधा की ऊंचाई नापने के लिए ‘दैनिक जागरण’ की मदद ली जा रही है। इस स्थिति में प्रियंवद के संपादन में हिंदी नवजागरण काल (1929 ई. से 1933 ई. तक) की दो प्रमुख पत्रिकाओं — ‘चांद’ और ‘माधुरी’ — से रचना-चयन के सात खंडों का प्रकाशन एक महत्वशाली और प्रासंगिक घटना है। एक बेहद अश्लील सांस्कृतिक शोर और प्राचीनता-प्रेम के दरमियान, बहुत पीछे जाए बगैर यह प्रकाशन यह जानने का अवसर है कि कभी हमारी संस्कृति कैसी थी, हमारी बनावट कैसी थी, हमारे घर कैसे थे, हमारी प्राथमिकताएं और आवश्कताएं कैसी थीं, हमारा रहन-सहन और अन्न कैसा था, हमारी शिक्षा-दीक्षा, हमारी किताबें और पोशाक कैसी थी, हमारे नाटक, हमारी नाटक-मंडलियां और फिल्में कैसी थीं, हमारी पत्रकारिता कैसी थी, अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता और मूल मानवीय अधिकारों के लिए हमारा कभी न खत्म होने वाला संघर्ष कैसा था। – लेखक 

    सारे सवालों की रोशनी में अंधेरा नजर आया

    (‘चांद’ और ‘माधुरी’ चयन के सात खंडों के प्रकाश में एक प्रतिक्रिया और एक प्रसंग)   

     –अविनाश मिश्र  

    16107461_1328427407221041_632303947667798252_oमैथिलीशरण गुप्त की ‘आर्य’ शीर्षक कविता की प्रारंभिक पंक्तियां — हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी / आओ विचारें आज मिल कर ये समस्याएं सभी — अपनी बहुउद्देशीयता की वजह से कभी पुरानी पड़ती नजर नहीं आती हैं। हमारी समस्याएं बढ़ती-बदलती रहती हैं और यह विचार करने की सामर्थ्य भी कि हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी…

    ‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड में राष्ट्रीय शिक्षा पर रामरखसिंह सहगल के किस्तवार संपादकीय शिक्षा में स्त्रियों और दलितों की स्थिति, उसमें व्याप्त वर्ण-व्यवस्था का पक्ष, और उसके जरिए सत्ता के प्रतिकार की तत्कालीन परंपरा बयान करते हैं। मौजूदा राजसत्ता इस वक्त जो हमारे विश्वविद्यालयों और विद्यार्थियों के साथ कर रही है, इसकी जांच के लिए ये संपादकीय एक आधार सरीखे हैं। आधुनिक शिक्षा-प्रणाली के संदर्भ में रामरखसिंह सहगल मेकॉले को उद्धृत करते हैं, ‘‘हमें भारत में ऐसे मनुष्यों की एक श्रेणी पैदा कर देने का शक्ति-भर प्रयत्न करना चाहिए, जो हमारे और उन करोड़ों भारतवासियों के बीच, जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिए का काम करे। इन लोगों को ऐसा होना चाहिए कि ये केवल रंग और रक्त की दृष्टि से भारतवासी हों, किंतु रुचि, विचार, भाषा और भावों की दृष्टि से अंग्रेज हों।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 93]

    ‘चांद’ चयन के संपादकीय खंड को पढ़कर बहुत सहज ही इस बात की प्रतीति होती है कि अपने उन बहुत सारे राष्ट्र-निर्माताओं को जो भारतीय मानस को सहेजने-गढ़ने के लिए सचेष्ट रहे, हम कब का भुला चुके हैं। कुछ नाम इस चयन के पन्नों पर जब खुलते हैं, तब यह नजर आता है कि स्वतंत्रता से पूर्व सामाजिक-सुधार के सुदीर्घ संघर्ष में लगे रहे इन नामों का अब कोई नामलेवा नहीं है। हरविलास जी शारदा एक ऐसा ही नाम हैं और सरलादेवी चौधरानी भी। शारदा सामाजिक और राजनीतिक सुधारों में एक गंभीर पारस्परिक संबंध देखते थे। उनके अनुसार एक की ओर ध्यान न देने से दूसरे को गहरा आघात पहुंचता है। सामाजिक और राजनीतिक सुधार साथ-साथ हों, वह इस बात के हामी थे। बाल-विवाह संबंधी लड़ाई, अछूतोद्धार और स्त्री-समानता के लिए हरविलास जी शारदा के यत्न कितने अविस्मरणीय हैं, इसकी सूचना ‘चांद’ के संपादकीय पढ़कर मिलती है।

    ‘स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकार’ शीर्षक संपादकीय में धनीराम प्रेम लिखते हैं, ‘‘श्रीमती सरलादेवी चौधरानी भारत की उन थोड़ी-सी महिलाओं में से हैं, जिन्होंने राजनीतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में बहुत-कुछ कार्य किया है। उनकी सेवाएं पुरानी हैं और उनका अनुभव बहुत प्रौढ़। वह जो कुछ कहती हैं, वह सारगर्भित तथा गवेषणापूर्ण होता है और उसमें मनन करने योग्य पर्याप्त सामग्री रहती है। अभी हाल ही में उन्होंने ‘बंगाल महिला कांग्रेस’ की सभानेत्री की हैसियत से जो भाषण दिया है, वह बड़ा महत्वपूर्ण है। उस भाषण में भारतवर्ष के सामने तथा भारतवर्ष के द्वारा संसार के सामने उन्होंने बड़े स्पष्ट तथा जोरदार शब्दों में स्त्रियों के जन्मसिद्ध अधिकारों की मांग पेश की है।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 185-186]

    सरलादेवी की मांगों में हर आयु और वर्ग की स्त्री के लिए जिन अधिकारों की चर्चा की गई, वे स्त्री को एक नागरिक की तरह देखने की बुनियादी कार्य-योजना को प्रस्तावित करते हैं। सरलादेवी की आवाज तत्युगीन स्त्री-स्थिति को पूर्णतः परिवर्तित करने के पक्ष में थी। इसमें स्त्री-मुक्ति की आकांक्षा का वजन था।

    इसके अतिरिक्त ‘मिथिला’ (बहुविवाह की जातिवादी कुप्रथा के संदर्भ में), ‘हिंदू-समाज और तलाक’, ‘ऑर्डिनेंस-युग’, ‘हमारी धार्मिक समस्याएं’, ‘दर्द की तस्वीरें’, ‘वर्तमान राजपूताना’, ‘वे और हम’, ‘हिंदू-समाज और जातिभेद’, ‘हिंदुओं में संयुक्त-कुटुंब-प्रथा’, ‘सामाजिक-क्रांति’, ‘भारतीय स्त्री-समाज’, ‘संसार-संकट’, ‘विश्वव्यापी अर्थ-संकट’, ‘स्वदेशी’, ‘भारत में बेकारी’ ये शीर्षक ही ‘चांद’ के संपादकीयों के — जो रामरखसिंह सहगल, शुकदेव राय, त्रिवेणी प्रसाद, भुवनेश्वर प्रसाद मिश्र ‘माधव’, लक्ष्मीदेवी, धनीराम प्रेम, मथुरा लाल शर्मा, नवजादिकलाल श्रीवास्तव द्वारा लिखे गए — सरोकार और दृष्टि की व्यापकता को बताने के लिए पर्याप्त हैं।

    इस पर्याप्तता का प्रभाव समझने के लिए ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों के संयुक्त प्राक्कथन में व्यक्त प्रियंवद के शब्द उल्लेखनीय हैं, ‘‘1929 में बाल-विवाह के विरोध में ‘शारदा एक्ट’ पारित हुआ और 1929 में ही स्त्रियों की कुछ श्रेणियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला। स्त्रियां अब जहाज उड़ा रही थीं, विश्वविद्यालयों में डिग्रियां ले रही थीं, खिलाड़ी बन रही थीं, तैरने की पोशाक पहनकर पानी में छलांगें लगा रही थीं। वे जेल जा रही थीं, शराब की दुकानों पर पिकेटिंग कर रही थीं, सिनेमा के परदे पर निस्संकोच काम कर रही थीं।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 12]

    ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के अंकों से चयनित कहानियों के खंड क्रमशः दो और छह की कहानियां पढ़कर आधुनिक हिंदी कहानी के बनने की प्रक्रिया समझी जा सकती है। नवजागरणकालीनता की वजह से जागरण, गर्व और सुधार इन कहानियों का केंद्रीय पहलू है। ‘चांद’ कहानी खंड में चतुरसेन शास्त्री, विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, जनार्दनप्रसाद झा ‘द्विज’, ‘मुक्त’, धनीराम ‘प्रेम’, ‘रतन’, अनूपलाल मंडल, विष्णुदत्त शर्मा, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, ब्रह्मस्वरूप गुप्त, अंतर्वेदी, टॉल्स्टॉय, गौतमचंद्र त्रिवेदी ‘नीरस’, नर्मदाप्रसाद खरे, पृथ्वीनाथ शर्मा, प्रेमचंद, जीवानंद वात्सायन, जहूरबख्श, रणवीरसिंह ‘वीर’, ललितकिशोरसिंह की कहानियां हैं और ‘माधुरी’ कहानी खंड में केशवदेव शर्मा, के.पी., सुदर्शन, प्रेमचंद, खड्गजीत मिश्र, प्रयाग दास भार्गव, भगवती प्रसाद वाजपेयी, रामेश्वरप्रसाद श्रीवास्तव, चंद्रगुप्त विद्यालंकार, इलाचंद्र जोशी, कालिका प्रसाद चतुर्वेदी, प्रफुल्लचंद्र ओझा, शंभुदयाल सकसेना, मुंशी अलीअब्बास हुसैनी, अवध उपाध्याय, सोमदत्त विद्यालंकार, केदारनाथ अग्रवाल, कन्हैयालाल की कहानियां हैं।

    ‘चांद’ के लेख, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (3) और ‘माधुरी’ के संपादकीय, आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड (4) में भी एक सशक्त स्त्री-पक्ष व्यक्त हुआ है। संसारप्रसिद्ध स्त्रियों की तुलना में भारतीय स्त्री और उसकी सामाजिक स्थिति, गर्भ-निरोध और स्त्रियों के जेल-जीवन पर ‘चांद’ के अंकों में प्रकाशित लेख सटीक अर्थों में एक बड़े सामाजिक सुधार का प्रस्ताव करते प्रतीत होते हैं। ‘चांद’ और ‘माधुरी’ में आलोचना एवं पुस्तक परिचय खंड के अंतर्गत हिंदी किताबों की एक ऐसी दुनिया नुमायां होती है जो अब धूसरित हो चुकी है। अब न इन किताबों का कहीं पता है, न इनके लेखकों, आलोचकों, अनुवादकों और प्रकाशकों का… ये भारत के लगभग सब कोनों में थे और यह होना इस बात की तस्दीक है कि पुस्तक-प्रकाशन तब किसी महानगरीय केंद्रीयता से ग्रस्त नहीं था। इन किताबों के विषय इनके लिए आवश्यक श्रम और दृष्टि की विविधता का आप प्रमाण हैं। ‘काउंट टालस्टाय के उपन्यासों का अनुवाद’ शीर्षक माधुरी में प्रकाशित संपादकीय टिप्पणी बताती है, ‘‘संसार की कोई ऐसी प्रसिद्ध भाषा नहीं, जिसमें टालस्टाय की रचनाओं के सुंदर अनुवाद न हों। हिंदी में भी उनकी कुछ कहानियों और दो-एक नाटकों का अनुवाद हो चुका है, पर उनके बड़े-बड़े उपन्यासों का, जिन्होंने संसार-साहित्य में एक नए युग की सृष्टि कर दी है, अभी तक अनुवाद नहीं हुआ। उनके तीन बड़े उपन्यास उच्चकोटि के हैं— ‘एनी करेनिना’, ‘रिजरेक्रेशन’ और ‘वार एंड पीस’। जिन लोगों ने इन साहित्य-रत्नों को पढ़ा है, वे जानते हैं कि इस जोड़ के उपन्यास संसार में अधिक नहीं हैं— उनके नाम उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। इन उपन्यासों से वंचित होकर कोई भी भाषा गर्व से सिर ऊंचा नहीं कर सकती। …इसलिए यह लिखते हुए हम एक गौरव-युक्त हर्ष का अनुभव कर रहे हैं कि इन तीनों पुस्तकों के अनुवाद हिंदी में हो गए हैं, और इसका श्रेय हमारे मित्र श्री रुद्रनारायणजी अग्रवाल को प्राप्त है। लगभग तीन हजार पृष्ठों का अनुवाद करना कोई आसान काम न था, पर आप टालस्टाय के परम भक्त हैं, और भक्ति ही वह वस्तु है, जो पहाड़ों पर कुएं खोदती है, कंदराओं में चित्र बनाती है और शैलश्रृंगों पर मंदिरों का निर्माण करती है।’’ [खंड : 4, पृष्ठ : 29]

    सोवियत संघ-विघटन से पूर्व मास्‍को के प्रमुख प्रकाशन गृह प्रगति एवं रादुगा प्रकाशन और भारतीय पीपुल पब्लिशिंग हाउस से आए मदन लाल मधु (‘आन्ना कारेनिना’ और ‘वार एंड पीस’ के अनुवादक) और भीष्म साहनी (‘रिस्रेक्शन’ के अनुवादक) के रूस में क्रमशः रोजगार और प्रवास के दौरान किए गए अनुवादों के लगभग चार दशक पूर्व किए गए रुद्रनारायणजी अग्रवाल कृत तोल्स्तोय के उपन्यासों के अनुवाद क्या हुए, यह प्रश्न यहां विचारणीय है।

    ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से चयन के इन खंडों में कविताओं का चयन नहीं किया गया है। विविध व परिशिष्ट खंड (7) में ‘माधुरी’ के जनवरी-1931 अंक से ‘मारवाड़ के कुछ दोहे’ (रामनरेश त्रिपाठी) जरूर शामिल हैं। इस चयन में कविताओं से दूरी बरतने के प्रियंवद ने दो कारण बताए हैं, ‘‘पहला यह, कि कविताओं में या तो अत्यंत भावुकता भरी, छायावादी, रूमानी भाषायी बाजीगरी थी या फिर स्थूल राष्ट्रवादी उच्छवास या फिर प्राचीन परंपरा में लिखे सवैये, मुक्तक आदि। यद्यपि कवियों में कुछ नाम महत्वपूर्ण थे, जैसे कि महादेवी वर्मा, रामकुमार वर्मा (इनकी कविताएं सबसे अधिक थीं) सोहनलाल द्विवेदी, जगन्नाथ दास रत्नाकर, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ व कुछ अन्य भी। पर ये कविताएं किसी भी मानक से हमारे चयन के उद्देश्य के पास नहीं पहुंचती थीं। संभव है ये उस समय लोकप्रिय हों, पर ये अपने समय का मुख्य स्वर नहीं थीं। ‘केसर की क्यारी’ ‘चांद’ का एक ऐसा ही स्तंभ था जिसमें उर्दू शाइरी का प्रतिनिधित्व था। पर वह भी बहुत कमजोर था। उर्दू शाइरी इसके पहले ही बहुत ऊंचे मेयार तय कर चुकी थी। इसके अलावा इसमें कुछ भी तत्कालीन मनुष्य से नहीं जुड़ता था।’’ [खंड : 1, पृष्ठ : 15]

    प्रो. राजकुमार अपने एक लेख में भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण में कथित उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य की चर्चा के सिरे से गायब होने की समस्या को प्रश्नांकित करते हैं। लेकिन ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से ये चयन-खंड इस बात का प्रमाण हैं कि यह समस्या द्विवेदी युग में भी कायम रही आई। यहां राजकुमार का यह कथ्य ध्यान देने योग्य है, ‘‘उर्दू को आप हिंदी की शैली मानें या उसकी परिकल्पना को ही अस्वीकार करें, लेकिन सच्चाई है कि हिंदी के नए चाल में ढलने से पहले उर्दू में साहित्य लिखने का सिलसिला शुरू हो चुका था। इसलिए फारसी लिपि या उर्दू में  फारसी-अरबी के शब्दों को जबरदस्ती ठूंसने की आलोचना करने के बावजूद हिंदी जाति के नवजागरण की चर्चा से उर्दू में लिखे गए साहित्य को आप बाहर नहीं कर सकते। ऐसा करने से उसकी सांप्रदायिक परिणिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और अंततः वही हुआ भी। मुख्य बात यह है हिंदी क्षेत्र की व्यापकता और भाषायी जटिलता के कारण यहां ऐसी स्थितियां उत्पन्न हुईं कि तेलुगू, बांग्ला या मराठी की तरह हिंदी का कोई एक रूप सुनिश्चित करना और बाकी रूपों को बाहर कर देना सभी को स्वीकार्य निर्णय नहीं बन पाया। फारसी और फिर उर्दू की परंपरा के विकास के कारण हिंदी के ही कई रजिस्टर बन गए। कई बार तो एक ही समय में अलग-अलग परंपरा से जुड़े लोग इन रजिस्टरों का अलग-अलग ढंग से उपयोग करते दिखाई पड़ते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम इनमें से किसी एक रूप के आधार पर हिंदी का स्वरूप स्थिर करने की कोशिश करते हैं। हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू के बीच खींचतान के समूचे इतिहास को इसी परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए। भारतेंदु युगीन हिंदी नवजागरण की समस्या यह है कि उसने हिंदी का एक सही रूप तय कर बाकी रूपों को प्रकारांतर से अवैध घोषित कर दिया और उनके बारे में किसी भी प्रकार के चिंतन-अध्ययन का ही निषेध कर दिया। उर्दू परंपरा में लिखे गए साहित्य को हिंदी नवजागरण के दायरे से बाहर कर देने के बावजूद भारतेंदु को इस बात का एहसास था कि उर्दू शाइरी की परंपरा से भिन्न खड़ी बोली हिंदी में कविता लिख पाना आसान नहीं होगा।’’

    खंड-5 में ‘माधुरी’ में प्रकाशित कुछ लेखों का चयन है। ‘‘यह देखना रोचक है कि समकालीन होते हुए भी, ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के लेखों में दृष्टि, चेतना, सरोकार व लेखकों की उपस्थिति, एक दीखने वाला फर्क है। ‘माधुरी’ लगभग मुख्य रूप से साहित्य की पत्रिका थी, जिसमें हिंदी के लगभग सभी बड़े नाम लिखते रहे थे। इसके लेखों में राजनीति से थोड़ी दूरी दिखती है, पर ‘चांद’ के लेखों में स्थिति इससे उलट थी।’’ [खंड : 5, ब्लर्ब से]

    इस खंड में प्रकाशित— ‘गुमान मिश्र और उनका आश्रयदाता’ (लाला सीताराम), ‘हिंदी में उच्चकोटि की पुस्तकों का अभाव’ (अवध उपाध्याय), ‘महाकवि भूषण की इतिहास अनुकूलता’ (रामचंद्र-गोविंद काटे), ‘शिवाजी महाराज की वास्तविक जन्म-तिथि’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘प्रयाग की हिंदी नाट्य-समिति’ (शिवपूजन सहाय), ‘प्राचीन भारत में राष्ट्रतंत्र’ (अरविंद घोष), ‘चुंबन’ (छन्नूलाल द्विवेदी), ‘रूस के आदर्श जेलखाने’ (देवव्रत शास्त्री), ‘बरवै-रामायण’ (सद्गुरुशरण अवस्थी), ‘उपाध्यायजी और अद्वैतवाद’ (वासुदेवशरण अग्रवाल), ‘अश्वमेध-यज्ञ’ (इंद्र विद्यालंकार), ‘प्रेमी मोपासां’ (केशवदेव शर्मा), ‘ब्रिटिश-साम्राज्य के पूर्व भारत’ (मंडन मिश्र), ‘कौटिल्य का वस्तु-विज्ञान’ (गोपाल-दामोदर तामस्कर), ‘हिंदी की आधुनिक कविता’ (विनयमोहन शर्मा), ‘भारतीय लिपि और भाषाएं’ (पांडेय रामावतार शर्मा), ‘उर्दू कविता में इस्लाह’ (ब्रजमोहन वर्मा), ‘हिंदी ‘य-श्रुति’ की परीक्षा’ (पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी शास्त्राचार्य) जैसे लेख ‘माधुरी’ की सुघड़, वैश्विक और विषय-वैविध्यपूर्ण संपादकीय दृष्टि का पता देते हैं। लेकिन इस सूची में स्त्री, दलित और मुस्लिम नामों का न होना, इस प्रश्न/विमर्श को जमीन दे सकता है कि क्या उनके नाम किन्हीं अप्रकाशित काली सूचियों में दर्ज थे? इस खंड में ही प्रकाशित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का लेख ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ पढ़ते हुए, यह प्रश्न भी बार-बार परेशान करता है कि इक़बाल को सांप्रदायिक मानने वाली नजर निराला को भी सांप्रदायिक क्यों नहीं मानती है। इस खंड में ही कृष्णबिहारी मिश्र का लेख ‘हिंदी-साहित्य का विकास’ इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की संदिग्ध तुलनात्मक दृष्टि और काव्य-विवेक, उनकी तथ्यात्मक चूकों और अमौलिकता पर विचार बहुत पहले ही किया जा चुका है। हिंदी में ऐसे विचार और विमर्श प्राय: दबी जुबान में होते रहे/रहते हैं, लेकिन इस प्रकार की मुखरताएं यहां घेर कर खत्म कर दी जाती रही हैं। असद ज़ैदी ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता-संग्राम के 150 साल पूरे होने पर जो विवादित कविता लिखी थी उसमें प्रतापनारायणों, मैथिलीशरणों और रामचंद्रों के विषय में यों ही नहीं कहा था कि वे खुद एक बेहतर गुलामी से ज्यादा कुछ नहीं चाहते थे। इस प्रकार देखें तो ‘चांद’ और ‘माधुरी’ से रचना-चयन के इन सात खंडों का प्रकाशन इस बात के लिए मजबूर करता है कि हम अपने कथित महान हिंदी-निर्माताओं के ‘हिंदू विवेक’ यानी उनकी उस सांप्रदायिक-दृष्टि को रेखांकित करें जिसकी वजह से वे एक तरफ अंग्रेज शासकों की प्रशंसा में रत थे और दूसरी तरफ हिंदू महासभा के एजेंडे पर भी काम कर रहे थे। यहां ‘वर्णाश्रम-धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक लेख से उद्धृत निराला रचित इस लंबे अनुच्छेद पर गौर करें :

    ‘‘सृष्टि की साम्यावस्था कभी नहीं रहती, तब अंत्यजों या शूद्रों की ही क्यों रहने लगी। ज्यों-ज्यों परिवर्तन का चक्र घूमता गया, त्यों-त्यों असीरियन सभ्यता के साथ एक नवीन शक्ति एक नवीन वैदांतिक साम्य-स्फूर्ति लेकर पैदा हुई, जिसके आश्रय में देखते-देखते आधा संसार आ गया। भारतवर्ष पर गत हजार वर्षों से उसी सभ्यता का प्रवाह बह रहा है। यहां की दिव्य शक्ति के भार से झुके हुए निम्न-श्रेणियों के लोगों को उसकी सहायता से सिर उठाने का मौका मिला— वे लोग मुसलमान हो गए। यहां की दिव्य सभ्यता आसुर सभ्यता से लड़ते-लड़ते क्रमशः दुर्बल हो गई थी, अंत तक उसने विकारग्रस्त रोगी की तरह विकलांग, विकृत-मस्तिष्क होकर अपने ही घर वालों से तर्क-वितर्क और लड़ाई-झगड़ों पर कमर कस ली। क्रोध अपनी ही दुर्बलता का परिचायक है, और अंत तक आत्मनाश का कारण बन बैठता है, उधर दुर्बल का जीवन भी क्रोध करना ही है, उसकी और कोई व्याख्या भी नहीं। फलतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति पराभूत होकर मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगी। जब ग्रीक सभ्यता का दानवी प्रवाह गत दो शताब्दियों से आने लगा, दानवी माया अपने पूर्ण यौवन पर आ गई, हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का शासन सुदृढ़ हो गया, विज्ञान ने भौतिक करामात दिखाने आरंभ कर दिए, उस समय ब्राह्मण-शक्ति तो पराभूत हो ही चुकी थी, किंतु क्षत्रिय और वैश्य-शक्ति भी पूर्णतः विजित हो गई। शिक्षा जो थी अंग्रेजों के हाथ में गई, अस्त्र-विद्या अंग्रेजों के अधिकार में रही (अस्त्र ही छीन लिए गए, तब वह विद्या कहां रह गई? और वह क्षत्रियत्व भी विलीन हो गया), व्यवसाय-कौशल भी अंग्रेजों के हाथ में। भारतवासियों के भाग्य में पड़ा शूद्रत्व। यहां की ब्राह्मण-वृत्ति में शूद्रत्व, क्षत्रिय-कर्म में शूद्रत्व, और व्यवसायी जो विदेशों का माल बेचने वाले हैं कुछ और बढ़कर शूद्रत्व इख्तियार कर रहे हैं। अदालत में ब्राह्मण और चांडाल की एक ही हैसियत, एक ही स्थान, एक ही निर्णय। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने घर में ऐंठने के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य रह गए। बाहरी प्रतिघातों ने भारतवर्ष के उस समाज-शरीर को, उसके उस व्यक्तित्व को, समूल नष्ट कर दिया; बाह्य दृष्टि से उसका अस्तित्व ही न रह गया। अंग्रेज-सरकार ने मुसलमान और नान-मुसलमान के दो हिस्से करके हिंदू-समाज की कद्र में एक कदम और बढ़कर अपनी गुणग्राहिता प्रकट की। यहां साफ जाहिर हो रहा है कि ‘न निवसेत् म्लेच्छराज्ये’ का फल क्या होता है, संस्पर्श दोष का परिणाम कितना भयंकर हुआ करता है।’’ [खंड : 5, पृष्ठ : 80-81]

    हिंदी-निर्माताओं का हिंदू प्रशिक्षण किस तरह मुल्क के आजाद होने बाद भी परवान चढ़ता रहा है, इसके उदाहरण प्रत्येक दशक में नजर आ जाएंगे। यहां नाम गिनाने में नाम छूटने की आशंकाएं ज्यादा हैं, इसलिए अवकाश और औचित्य दोनों होने बावजूद इससे बचा जा रहा है, लेकिन मौजूदा भारतीय सरकार में हिंदी की नई पीढ़ी से एक हालिया उदाहरण दे ही देना चाहिए। 12 मार्च 2018 के ‘हिंदुस्तान’ के वाराणसी संस्करण की एक खबर का शीर्षक — ‘संकुल में पीएम : मोदी और मैक्रों ने देखा राम-हनुमान का मिलन’ — पढ़कर उसे पूरा पढ़ने की इच्छा हुई :

    ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रो ने सोमवार को बड़ा लालपुर के दीनदयाल संकुल में रामचरित मानस के प्रमुख प्रसंगों पर आधारित नाटक ‘चित्रकूट’ का मंचन देखा। रूपवाणी संस्था की इस प्रस्तुति में दोनों शासनाध्यक्षों की मौजूदगी के दौरान बाली-सुग्रीव युद्ध और श्रीराम-हनुमान मिलन के प्रसंगों का मंचन हुआ।

    संकुल के ओपेन थिएटर में दोनों शासनाध्यक्षों के साथ ब्रिगेटी मैक्रो (फ्रांस की प्रथम महिला) और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे। ओपेन थिएटर में दो गद्दे लगाए गए थे। लेकिन मोदी-इमैनुअल मैक्रो एक ही स्थान पर बैठे। वहां जगह कम पड़ने के कारण ब्रिगेटी मैक्रो ने बड़े ही सहज भाव से नीचे सीढ़ियों पर बैठकर रामलीला का मंचन देखा। उन्हें सीढ़ियों पर बैठता देख मोदी ने अफसरों को व्यवस्था करने का इशारा किया, लेकिन ब्रिगेटी मैक्रो ने मना कर दिया। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अकेले बैठे थे।

    व्योमेश शुक्ल निर्देशित इस नाटक में छऊ, कथक और भरतनाट्यम नृत्य-शैलियों को आधार बनाया गया। इस प्रस्तुति में राम, सीता, लक्ष्मण और हिरण की भूमिका क्रमशः स्वाति, नंदिनी, काजोल और साखी ने निभाई। अन्य भूमिकाओं में तापस, हेमंत, आकाश, देवांशी, दीपक गुप्त और विशाल थे।’’

    यह कहने की इच्छा नहीं है, लेकिन कहना पड़ रहा है कि व्योमेश शुक्ल हिंदी के चर्चित कवि और कभी जन संस्कृति मंच से संबद्ध रहे हैं। एक उम्र तक उन्हें एक साथ हिंदी के महत्वपूर्ण, प्रतिबद्ध, प्रगतिशील व्यक्तित्वों और कथित कलावादियों का स्नेह, सहयोग और समर्थन मिला है। ‘पहल’ और ‘उद्भावना’ सरीखी पत्रिकाओं ने उनके काम की पुस्तिकाएं प्रकाशित की हैं। उन्हें अशोक वाजपेयी ने भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया है। उन्हें श्रीकांत वर्मा पर अब तक नहीं आई किताब लिखने के लिए रज़ा फाउंडेशन की फैलोशिप मिली है। वह रज़ा फाउंडेशन की पत्रिका ‘समास’ के अब तक नहीं आए एक अंक के संपादक रहे हैं… यह व्योमेश का विकास-क्रम है और ये सारी घटनाएं 16 मई 2014 से पूर्व की हैं। इस तारीख से ठीक पूर्व 16वें लोकसभा चुनाव में वह बनारस में नरेंद्र मोदी के विरुद्ध — अरविंद केजरीवाल का नहीं — कांग्रेसी अजय राय का प्रचार कर, उनके पक्ष में हिंदी लेखकों-पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को एकजुट कर चुके हैं। लेकिन इस तारीख के बाद से वह आंदोलनात्मक और साहित्यिक व्यर्थताएं तज कर ‘राममय रंगकर्म’ के प्रति पूर्णतः समर्पित और सक्रिय हो गए हैं। वह निराला की लंबी कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ पर तैयार की गई नृत्य-नाटिका की देश भर में सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां दे चुके हैं। मोदी और योगी को राम-हनुमान का मिलन दिखाना उनकी नाटकीय साधना का महज एक पड़ाव है। 2019 में यानी 17वें लोकसभा चुनाव में किसी फाशिस्ट की ताजपोशी अगर पुन: होती है, तब यकीकन एक हिंदू-राष्ट्र में हम व्योमेश शुक्ल के रंगकर्म का चरमोत्कर्ष देखेंगे और यह न हुआ तब भी अफसरों-अवसरों की कोई कमी थोड़े ही है।

    इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में वह हिंदू-मानस है जो मूलतः सांप्रदायिक है और जिसे कथित प्रात: स्मरणीय हिंदी-निर्माताओं ने तैयार किया है। इसलिए ही संभवतः रामविलास शर्मा का गढ़ा पद ‘हिंदी नवजागरण’ इतना संदेहास्पद है। संसार का कोई भी नवजागरण इतना अशक्त और अपूर्ण नहीं है जितना कि यह ‘हिंदी नवजागरण’ है। इसका ही नतीजा है कि इस हाहाकारी वक्त में हम सब जगह अपने बहुत नजदीक भयानक हिंदू मानस से घिरे हुए हैं। कोई भी स्थान और माध्यम अब निरापद नहीं है। हमारी शीर्षस्थानीयताएं ईश्वर को याद कर रही हैं (देखें : नामवर सिंह पर केंद्रित एनडीटीवी इंडिया का 4 मई 2018 का प्राइम टाइम)। इस दृश्य में ‘चांद’ और ‘माधुरी’ के चयन-खंडों का प्रकाशन बहुत सारी अवधारणाओं पर पुनर्विचार का प्रस्थान-बिंदु बन सकता है। यह पुनर्विचार ही संभवतः हमारे उन वास्तविक निर्माताओं के अधूरे कार्य और उनकी वेदना के स्रोत को संगतपूर्ण निष्कर्षों तलक पहुंचा सकेगा जो समाज, संस्कृति और साहित्य की सेवा के लिए अथक श्रम करते हुए, अशेष कष्ट सहते हुए, सफलता-असफलता से बेखबर आत्मत्याग की राह पर अपरिमित धन व्यय करते हुए अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करते रहे।

    आभासी पटल (सोशल साइट्स) के बाहर ‘कुंठित मन’ की ‘निर्लज्ज अभिव्यक्तियाँ’ कितनी अमानवीय होती हैं, वह जानी-पहचानी है. अविनाश के पास ‘कूटनीति’ की भाषा नहीं है, जिसका सबसे सजग इस्तेमाल आभासी लोक-वृत्त के दायरे में किया जाता है. जिस दिन उसके पास यह आ जायेगी, वह ख़त्म हो जाएगा। यह आभासी-व्यवहार और कुछ नहीं, बल्कि हाल-चाल, दुआ-सलाम की भाषा को पाने का ही करतब है. यह भाषा आदमी को दलाल, अवसरवादी, व्यवसायी बना सकती है लेकिन रचनाकार नहीं। यह ‘सर्वधर्म-समभाव’ की सबसे उपजाऊ जमीन है। जहाँ भाषा गूगल-ट्रांसलेट हो जाती है। अविनाश से संपर्क -स्थापित हेतु  darasaldelhi@gmail.com का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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